मैथ्स में AI अच्छा या बुरा? ऑनलाइन पोस्ट वायरल होने के बाद सबसे बेहतरीन गणितज्ञों का आया जवाब
AI से कोई प्रूफ तैयार करने में भले ही कुछ घंटे लगें, लेकिन नए नतीजों को इंसानी ज्ञान का हिस्सा बनने में सालों लग सकते हैं. इस लिहाज से, बड़ा खतरा यह नहीं है कि AI गणितज्ञों की जगह ले लेगा, बल्कि यह है कि यूनिवर्सिटीज इंसानी मेहनत को सपोर्ट करना बंद कर देंगी.
अलग-अलग लोगों के लिए गणित का मतलब अलग-अलग हो सकता है. बच्चों के लिए यह आसान जोड़-घटाव हो सकता है, तो हेज फंड मैनेजरों के लिए जटिल मॉडल. गणितज्ञों के लिए, यह नई चीजें खोजने का काम है. कई लोग सालों तक गणित से जुड़ी नई सच्चाइयां या सूत्र ढूंढने में लगे रहते हैं. मगर अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इस खोज-बीन का कुछ हिस्सा अपने हाथ में ले रहा है और 'जैकोबियन कंजक्चर' (Jacobian conjecture) जैसी पुरानी समस्याओं को सुलझाने में मदद कर रहा है.
इस क्षेत्र के बड़े-बड़े जानकार इस बात को लेकर उलझन में हैं कि यह आखिरकार अच्छा है या बुरा. इसका नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या गणितज्ञ AI से निपटने के लिए तेजी से नए नियम या मानक बना पाते हैं या नहीं. इस दिशा में हो रही अच्छी प्रगति को देखते हुए, यह क्षेत्र ज्ञान पर आधारित दूसरे तरह के कामों के लिए एक बेहतरीन मॉडल तैयार कर सकता है.
पीएचडी स्टूडेंट ने उठाए सवाल
हाल ही में एक ऑनलाइन पोस्ट वायरल हुई. इसे प्योर मैथमेटिक्स (शुद्ध गणित) के पीएचडी स्टूडेंट किरविन हैम्पशायर ने लिखा था. उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात से "स्पिरिचुअल क्राइसिस" (आध्यात्मिक संकट) महसूस हो रहा है कि AI उनके काम के सबसे अहम हिस्से को छीन सकता है. उन्होंने चेतावनी दी कि जहां बॉट्स नए प्रूफ (प्रमाण) खोज रहे हैं, वहीं गणितज्ञ सिर्फ़ दर्शक बनकर रह गए हैं.
कैम्ब्रिज के रिटायर्ड गणितज्ञ कीथ कार्न का कहना है कि उनका फ़ील्ड AI से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है, क्योंकि यह टेक्नोलॉजी कई संभावित कनेक्शनों को आपस में जोड़कर देख सकती है. वे कहते हैं, "एक कंप्यूटर यह देख सकता है कि 20 अलग-अलग गणितज्ञों ने किसी समस्या को किस नज़रिए से देखा है, और इस तरह उसे उन 20 लोगों पर बढ़त मिल जाती है."
दुनिया के सबसे मशहूर गणितज्ञों में से एक और फील्ड्स मेडल जीतने वाले टेरेंस ताओ का कहना है कि AI गणित को "प्रूफ की कमी" वाली स्थिति से "प्रूफ की भरमार" वाली स्थिति में बदल सकता है. इससे गणितज्ञ भी लेखकों, कलाकारों और एनालिस्ट्स जैसी ही मुश्किल स्थिति में आ सकते हैं. दुनिया में AI से बनी ऐसी चीजों की बाढ़ आ रही है जिन्हें वे आम तौर पर बनाते हैं, जिससे उनके काम की अहमियत कम होने का खतरा पैदा हो गया है.
पेशेवर गणितज्ञ हर साल बहुत सारे रिसर्च पेपर पब्लिश करते हैं, जिनमें अक्सर नए प्रूफ या स्टेप-बाय-स्टेप तर्क होते हैं जो बताते हैं कि कोई गणितीय नियम कैसे सही है. लेकिन सबसे अहम खोजें इससे कहीं ज्यादा करती हैं; वे सोचने के बिल्कुल नए तरीके खोलती हैं और दूसरे गणितज्ञों व इस्तेमाल के नए तरीकों के लिए रास्ता बनाती हैं.
मैथ्स में जवाब से ज्यादा चिंतन महत्वपूर्ण
यूक्लिड के यह साबित करने के हजारों साल बाद कि अभाज्य संख्याएं (prime numbers) अनगिनत हैं, नंबर थ्योरी उन क्रिप्टोग्राफी सिस्टम के लिए बहुत जरूरी हो गई है जिन पर आज की ज्यादातर डिजिटल इकॉनमी टिकी है. 1980 के दशक के आखिर में बेल्जियम की गणितज्ञ इंग्रिड डौबेचीज़ ने 'वेवलेट्स' (wavelets) नाम के छोटे ऑसिलेशन पर जो काम शुरू किया, उसने मॉडर्न इमेज कम्प्रेशन और स्मार्टफ़ोन में फ़ोटो स्टोर करने के तरीकों का आधार तैयार करने में मदद की.
ज्यादातर गणित का मकसद कोई फ़ाइनल इस्तेमाल खोजना नहीं होता, बल्कि यह ब्रह्मांड के छिपे हुए पैटर्न को समझने की इंसानी जिज्ञासा से प्रेरित एक खोज होती है. जैसे कि 'फर्मेट्स लास्ट थ्योरम' (Fermat's Last Theorem)—सदियों पुरानी एक पहेली जिसे मुख्य रूप से बौद्धिक चुनौती के तौर पर हल करने की कोशिश की गई. हो सकता है कि किसी गणितज्ञ की मौत के दशकों बाद 'प्योर मैथ' (pure math) का असल दुनिया में कोई इस्तेमाल मिल जाए, लेकिन ऐसा होना जरूरी नहीं है.
फिर भी, इस क्षेत्र में लंबे समय से "पब्लिश ऑर पेरिश" (यानी रिसर्च पेपर छापो या खत्म हो जाओ) का कल्चर रहा है. इसमें रिसर्च पेपर एक तरह की करेंसी की तरह काम करते हैं, जिनसे दूसरे एकेडमिक्स के बीच आपकी विश्वसनीयता बनती है, जबकि इसका असली मकसद सामूहिक समझ को बढ़ाना होता है — एक ऐसी अमूर्त चीज जिसकी कीमत आंकना लगभग असंभव है. क्योटो यूनिवर्सिटी में गणित के रिसर्चर बेंजामिन कोलास कहते हैं कि वह सामूहिक ज्ञान ही असली प्रोडक्ट था, जबकि पब्लिश हुए थ्योरम और प्रूफ तो बस "बची-खुची चीजें" (residue) थीं. वे कहते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने बस इस सिस्टम की असलियत सामने ला दी है; अब खतरा यह है कि जैसे-जैसे सॉफ्टवेयर ज्यादा गणितीय ज्ञान पैदा करेगा, इंसान उसे उतना ही कम समझ पाएंगे.
एआई से कैसे पार पाया जाए
AI से कोई प्रूफ तैयार करने में भले ही कुछ घंटे लगें, लेकिन नए नतीजों को इंसानी ज्ञान का हिस्सा बनने में सालों लग सकते हैं. इस लिहाज से, बड़ा खतरा यह नहीं है कि AI गणितज्ञों की जगह ले लेगा, बल्कि यह है कि यूनिवर्सिटीज़ उस धीमी, इंसानी मेहनत को सपोर्ट करना बंद कर देंगी जो उन सच्चाइयों को समझने में मदद करती है.
लिखने-पढ़ने जैसे क्षेत्रों में भी कुछ ऐसी ही उलझन है; AI तो ढेर सारा कंटेंट बना सकता है, लेकिन यह तय करने का हुनर कि असल में क्या कहना जरूरी है, कम होता जा रहा है. कोई लॉ फर्म AI की मदद से बहुत सारे कानूनी दस्तावेज और कॉन्ट्रैक्ट तैयार कर सकती है, लेकिन यह तय करने का फैसला कि किन तर्कों पर आगे बढ़ना है, इंसानों के लिए ज्यादा जरूरी हो जाता है और इसकी अहमियत को आंकना मुश्किल हो जाता है.
एक और मुश्किल बात यह है कि संस्थाएं हमेशा से लोगों को उन कामों के आधार पर पैसे देती रही हैं जिन्हें AI अब सस्ता बना रहा है – जैसे एकेडमिक्स में पब्लिकेशन की संख्या या वकालत में बिल किए जा सकने वाले घंटे और दस्तावेज. गणित के इस 'स्पिरिचुअल संकट' (बुनियादी सोच के संकट) का एक अच्छा पहलू यह हो सकता है कि इससे इंसानों को यह एहसास हो कि वे अब तक वैल्यू को गलत तरीके से मापते रहे हैं.
आप समझ-बूझ, पसंद या ऐसे स्मार्ट सवालों को कैसे इनाम देंगे जिनसे खोज के नए रास्ते खुलते हों? गणित के मामले में, इसका मतलब हो सकता है कि सिर्फ़ ढेर सारे पेपर पब्लिश करने के बजाय, पढ़ाने, दूसरों के नतीजों को समझाने या शेयर्ड डेटाबेस और गणितीय लाइब्रेरी जैसे टूल बनाने को ज्यादा क्रेडिट और फ़ंडिंग दी जाए, ताकि दूसरे गणितज्ञ भी आगे बढ़ सकें.
इससे उस चीज को भी बढ़ावा मिलेगा जो गणितज्ञों को इस क्षेत्र में बनाए रखती है. कोलास मुझसे कहते हैं, "मुझे सबसे ज्यादा प्रक्रिया ही पसंद है, जो लगातार नए सिरे से शुरू होती रहती है. किसी चीज को न समझने से उसे समझने तक का सफर. सब कुछ उस एक हिस्से की ओर इशारा करता है जो अभी भी अंधेरे में है, और फिर वह बिल्कुल साफ और आसान तरीके से सामने आ जाता है." जैसे-जैसे मशीनें ज्यादा से ज्यादा बेहतरीन नतीजे देने लगी हैं, इंसानों को इस बात को ज्यादा अहमियत देनी चाहिए कि असल में कौन से सवाल पूछने लायक हैं.
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