Explainer: यूजीसी के नए नियम से क्यों गुस्साए सवर्ण, क्या है पूरा विवाद- ग्राउंड रिपोर्ट

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  • प्रकाशित: जनवरी 27, 2026

केंद्र सरकार उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से “Promotion of Equity in Higher Education” नाम का एक नया रेग्युलेशन लेकर आई है. इसके तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में यदि एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों के साथ किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव होता है, तो उसकी जांच के लिए एक विशेष समिति बनाई जाएगी. छात्र इस समिति के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे. लेकिन इस प्रावधान का कुछ सवर्ण संगठनों ने खुलकर विरोध शुरू कर दिया है. इसी विरोध को देखते हुए आज यूजीसी (University Grants Commission) मुख्यालय के बाहर सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम किए गए हैं.

यूजीसी मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन

यूजीसी मुख्यालय के बाहर आज सुबह से ही सवर्ण सेना नामक संगठन के कुछ सदस्य जमा होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि नए रेग्युलेशन से कैंपस में जातीय तनाव और बढ़ सकता है. सामान्य (General) वर्ग के छात्रों के लिए भेदभाव की शिकायत दर्ज कराने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है. ओबीसी वर्ग को रेग्युलेशन में शामिल करने से शिकायतों की संख्या अनियंत्रित ढंग से बढ़ सकती है, जिससे “समानता” नहीं बल्कि “असमानता” बढ़ेगी. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि शिकायत व्यवस्था एकपक्षीय होने का खतरा है और इससे विश्वविद्यालयों में संतुलन बिगड़ सकता है.

आंकड़े क्या बताते हैं?

अगर शिकायतों के पंजीकरण के आंकड़ों को देखें, तो ये साफ होता है कि कैंपस में जातिगत भेदभाव की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं- 2017–18 में ऐसी शिकायतों की संख्या लगभग 173 थी.  2023–24 में यह बढ़कर 350 से अधिक हो गई. यह रुझान दिखाता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातीय भेदभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं, और सरकार इस समस्या को संस्थागत स्तर पर संबोधित करने के लिए कदम उठा रही है.

सरकार की सफाई और आगे की रणनीति

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, रेग्युलेशन में कुछ नए प्रावधान जोड़े जाने पर विचार किया जा रहा है, ताकि सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों की चिंताओं को भी संबोधित किया जा सके। सरकार का मानना है कि किसी भी समुदाय के छात्रों में व्यापक असंतोष पैदा होना राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तर पर समस्या उत्पन्न कर सकता है. इसलिए रेग्युलेशन को संतुलित और पारदर्शी बनाए रखने के लिए संशोधन की तैयारी की जा रही है. फिलहाल सरकार सभी पक्षों को आश्वस्त करने की कोशिश कर रही है, जबकि छात्र संगठन और सामाजिक समूह आगे के कदम का इंतज़ार कर रहे हैं.