दूरदर्शन का वो शो, जिसकी लोकप्रियता देख छापनी पड़ी थी किताब, सभी दिग्गजों ने थामी थी बुधई की कमान, जगजीत सिंह की आवाज ने किया अमर

पंकज कपूर ने इस किरदार को ऐसा जिया, जैसे वो कभी उससे अलग थे ही नहीं. उनकी अदायगी और एक्सप्रेशन्स ने दर्शकों के दिलों को छू लिया और ये शो एक ऐतिहासिक शो बन गया.  

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नीम का पेड़ में बंधुआ मजदूर बने थे पंकज कपूर

टीवी पर ऐसे कई धारावाहिक आए, जिन्होंने लोगों का दिल जीता और घर-घर में मशहूर हुए. लेकिन आज हम जिस शो की बात कर रहे हैं, जिसने लोगों के रूह को छुआ और कहानी को इस कदर जीवंत किया कि हर किसी को ये आंखों देखी लगने लगी. कहानी के साथ ही इस शो के कलाकारों ने भी इसे खास बनाया. खासकर इस शो में बुधई का किरदार निभाने वाले लीड एक्टर पंकज कपूर ने. पंकज कपूर ने इस किरदार को ऐसा जिया, जैसे वो कभी उससे अलग थे ही नहीं. उनकी अदायगी और एक्सप्रेशन्स ने दर्शकों के दिलों को छू लिया और ये शो एक ऐतिहासिक शो बन गया.  

कौन सा है वो शो?

हम बात कर रहे हैं 1991 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुए शो नीम का पेड़ की. इस शो का स्क्रीनप्ले उर्दू और हिंदी के जाने-माने कवि-शायद डॉ. राही मासूम रजा ने लिखा था. शो का टाइटल सॉन्‍ग 'मुंह की बात सुने हर कोई...' जगजीत सिंह ने गाया था. इसे गुरबीर सिंह ग्रेवाल ने डायरेक्ट किया था और नवमान मलिक इसके प्रोड्यूसर थे. शो के टाइटल ट्रैक को दिग्गज शायर, कवि और गीतकार निदा फाजली ने लिखे थे. इतने सारे दिग्गज शायद पहली बार किसी शो के लिए एक साथ आए थे.

'नीम का पेड़' शो की कहानी

'नीम का पेड़' की कहानी एक बंधुआ मजदूर और उसके जमींदार के इर्द-गिर्द घूमती है. यह कहानी आजादी से पहले के भारत से शुरू होकर, स्‍वतंत्र भारत में समाप्‍त होती है. बुधई राम उत्तर प्रदेश के एक गांव में अपने जमींदार, जामिन मियां के लिए ईमानदारी से काम करता है. बुधई अनपढ़ और गरीब हैं, लेकिन उनका एक बड़ा सपना है कि वे अपने बेटे, सुखी राम को पढ़ा-लिखा सके.

परिवार की हालत खराब हो जाती है, जमींदारों को विरोधी रिश्तेदारों की राजनीतिक चालों के कारण जेल जाना पड़ता है, और आम मजदूर पुरानी व्यवस्था के तहत परेशान होते हैं. भारत के आजाद होने के बाद, लोकतांत्रिक व्यवस्था से सत्ता बदलती है, और बुधई के बेटे सुखी राम बड़े होकर सांसद (MP) बनता है.

सीरियल पर छपी किताब

'नीम का पेड़' शो इतना बड़ा हिट रहा कि घर-घर में अपनी पहचान बना ली. हैरानी की बात ये है कि किताबों और उपन्यासों पर टीवी शोज बनते रहे हैं, लेकिन ये एक ऐसा शो रहा, जिसके सुपरहिट होने के बाद इस नाम की किताब छपी. इस किताब ने भी साहित्‍य की दुनिया में अपना एक अलग मुकाम बनाया. 58 एपिसोड के इस सीरियल को विलायत जाफरी ने अपनी कहानी में बखूबी समेटा.

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