पूनिया का 'प्लेबुक': माइक्रो मैनेजमेंट से 'रिश्तेदारी' तक, पंजाब में BJP की नई रणनीति

सतीश पूनिया अपने राजनीतिक जीवन को लेकर राजस्थान की लंबाई-चौड़ाई को रोड बसों में घूमते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही समझ लिया था कि लोगों से कनेक्ट और उनकी नजर में आपकी रिकॉल वैल्यू कितनी महत्वपूर्ण है. इसके साथ-साथ मैनेजमेंट स्किल्स भी उतनी ही जरूरी है.

पूनिया का 'प्लेबुक': माइक्रो मैनेजमेंट से 'रिश्तेदारी' तक, पंजाब में BJP की नई रणनीति
सतीश पूनिया पंजाब में बीजेपी की मजबूत करेंगे जमीन.

पंजाब चुनाव से पहले दिल्ली में भाजपा की बंद कमरे में हो रही अहम रणनीतिक बैठकों के पीछे राजस्थान का एक चेहरा है. नाम है सतीश पूनिया. लो-प्रोफाइल, बैक-रूम बॉय, अपनी मिलनसार शैली और शांत तरीके से काम करने के लिए पहचाने जाने वाले सतीश पूनिया को पार्टी ने पंजाब के अहम विधानसभा चुनाव से पहले राज्य का प्रभारी बनाया है. बंद कमरे की रणनीति बैठकों का सिलसिला अब BJP के संगठन महामंत्री बीएल संतोष के पंजाब के दो दिवसीय दौरे तक पहुंच चुका है. इसके बाद 28 अगस्त को अमृतसर में राखड़ पुणिया जौड़ मेले से पार्टी का बड़ा पब्लिक आउटरीच शुरू होगा.

चुनावी ब्लूप्रिंट तैयार करने में जुटे पूनिया

यह पहली बार है जब BJP इस ऐतिहासिक सिख धार्मिक मेले में अपना स्वतंत्र और अलग राजनीतिक मंच लगाएगी. मेले के मैदान में शिवराज सिंह चौहान और नायब सिंह सैनी लोगों को संबोधित करेंगे. दूसरी तरफ सतीश पूनिया उस माइक्रो मैनेजमेंट के काम में जुट चुके हैं, जिसके लिए उन्हें जाना जाता है. अपने उसी सिग्नेचर शांत और लो-प्रोफाइल अंदाज में पूनिया पंजाब में ग्राउंड लेवल पर चुनावी ब्लूप्रिंट तैयार करने में जुटे हैं. 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए उनका फोकस वही व्यवस्थित कैंपेन के तरीके पर है, जिसे उन्होंने हरियाणा में अपनाया था.

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सतीश पूनिया का ‘प्लेबुक': माइक्रो मैनेजमेंट से ‘रिश्तेदारी' तक, पंजाब में BJP की नई रणनीति

सतीश पूनिया
Photo Credit: FB/Satish Poonia

2024 के विधानसभा चुनाव जहां BJP के लिए सतीश पूनिया की चुनावी मैनेजमेंट भूमिका ने पार्टी को लगातार तीसरी बार सत्ता में पहुंचाने में मदद की, उनके राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुए. यहीं से पूनिया राष्ट्रीय स्तर पर BJP के संगठन के भीतर एक ऐसे नेता के तौर पर उभरे, जिसकी पहचान माइक्रो मैनेजमेंट के लिए होने लगी.

उनका तरीका सीधा है, एक विधानसभा क्षेत्र को छोटे-छोटे मैनेजबल यूनिट्स में बांटना और फिर हर यूनिट के लिए माइक्रो टारगेटे स्ट्रैटजी तैयार करना. हरियाणा में इसी अप्रोच ने BJP को एक प्रभावी बैकरूम लीडरशिप दी, जिसने पार्टी को अप्रत्याशित बहुमत और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में मदद की. अगर आप सतीश पूनिया से उनकी इस स्ट्रैटेजी के ट्रेड सीक्रेट पूछें तो वो हंसते हैं. फिर बताते हैं कि ABVP में उनकी ट्रेनिंग ने उन्हें एक संगठन के आदमी के तौर पर तैयार किया.

हरियाणा के अनुभव को किया याद

हरियाणा के अपने अनुभव को याद करते हुए सतीश पूनिया NDTV से बातचीत में बताया, "हरियाणा में BJP ने चुनाव ऑर्थोडॉक्स के तरीके से लड़ा, चुनौती थी. अग्निवीर का मुद्दा था, पहलवान-किसान का मुद्दा था. लेकिन मैंने लोकसभा चुनाव को हरियाणा को समझने और ऑब्जर्व करने के लिए इस्तेमाल किया. मैंने देखा कि लोकसभा में 5 सीटें हारने के बावजूद BJP 44 विधानसभा सेगमेंट्स में आगे थी. यानी उम्मीद थी."

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पूनिया ने कैसे बनाई हरियाणा में पैठ

पूनिया बताते हैं कि जब उन्होंने जिम्मेदारी संभाली तो एक और गैप सामने आया. उन्होंने कहा कि हमारे 20,000 बूथ थे, लेकिन सिर्फ 2,000 वाट्सएप ग्रुप थे. मैंने राजस्थान से टीम को बुलाया और हमने 14,000 वाट्स्एप बनाने का काम शुरू किया. इसके जरिए जानकारी पहुंचाई गई. बीजेपी का नरेटिव लोगों तक पहुंचाया गया और इसका व्यापक प्रभाव हुआ. वो 20,000 ग्रुप कई गुना बढ़ गए. यही ग्राउंड स्ट्रैटेजी सतीश पूनिया को एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करती है जो चुनाव के ग्राउंड गेम जैसे सटीक चुनावी लक्ष्यीकरण, बूथ की मजबूती को समझता है. 

Satish Poonia

सतीश पूनिया
Photo Credit: IANS

पंजाब में क्या हैं चुनौतियां?

लेकिन पंजाब का सिनेरियो बिल्कुल अलग है, खुद सतीश पूनिया भी इसे मानते हैं. उनके मुताबिक पंजाब बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि पार्टी राज्य में लगभग हमेशा गंठबंधन में रही है और वह भी जूनियर पार्टनर के तौर पर. पूनिया कहते हैं कि पंजाब एक बड़ी चुनौती है. पंजाब में हम लगभग हमेशा गठबंधन में रहे हैं और वह भी जूनियर पार्टनर के तौर पर. राज्य में पार्टी नेटवर्क को मज़बूत करने की ज़रूरत है और बीजेपी को अपनी उस छवि को बदलना होगा, जिसके तहत उसे मुख्य रूप से शहरी पार्टी माना जाता है और जिसकी ग्रामीण इलाकों में पैठ बहुत कम है.

हालांकि उनका कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर बढ़ा है और अब पार्टी इसी बढ़त पर काम करेगी. अगर सतीश पूनिया के काम करने के तरीके को समझें तो पंजाब में भी उनका सिग्नेचर स्टाइल कुछ ऐसा ही रहने वाला है-

  • विधानसभा क्षेत्रों को छोटी-छोटी इकाइयों में बांटना
  • लोगों के सीधे संपर्क में रहने वाले कार्यकर्ता तैयार करना.
  • डिजिटल कम्यूनिकेशन के जरिए रीयल टाइम फीडबैक लेना.

राजस्थान से खास तौर पर पड़ोसी जिलों गंगानगर और हनुमानगढ़ से टीमें भी एक्टिव की जा रही हैं. यहां एक और फैक्टर काम करेगा. वह है रिश्तेदारी. पंजाब और राजस्थान की सीमा के दोनों तरफ परिवार और सामाजिक रिश्तों का एक नेटवर्क है. पूनिया की कोशिश इन रिश्तों को राजनीति जुड़ाव में इस्तेमाल करने की भी होगी. क्योंकि सतीश पूनिया सिर्फ एक माइक्रो मैनेजमेंट वाले ही आदमी नहीं हैं. अगर उन्हें किसी एक चीज के लिए जाना जाता है तो वो है उनका पर्सनल कनेक्ट. यह व्यक्तिगत जुड़ाव या पूनिया की भाषा में रिश्तेदारी, उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर में विकसित की है.

कोरोना के दौरान वह पत्रकारों को फोन करके उनका और उनके परिवार का हालचाल पूछते थे. यहां तक कि अगर किसी से बहुत करीबी रिश्ता नहीं भी हो, तो भी पहला प्रयास खुद करके संपर्क बनाने और एक “रिश्ता” कायम करने की उनकी आदत रही है. कहा जाता है कि उनके पास लोगों के बर्थडे का एक कैलेंडर तक रहता है, जिसके जरिए वह अलग-अलग सोशल ग्रुप के लोगों को बर्थडे विश करते हैं. पत्रकार हों, वकील हों, शिक्षक हों या समाज के दूसरे वर्ग- सतीश पूनिया की अपनी एक रिश्तेदारी है. इस रिश्तेदारी ने उन्हें सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत भी मदद की है.

सतीश पूनिया की एक और बड़ी खूबी है, जो राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत कम देखने को मिलती है. वे कभी अपनी निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का दिखावा नहीं करते. राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष रहते हुए उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विशाल राजनीतिक प्रभाव और आभा मंडल के साथ भी काम करना पड़ा. 

सतीश पूनिया का ‘प्लेबुक': माइक्रो मैनेजमेंट से ‘रिश्तेदारी' तक, पंजाब में BJP की नई रणनीति

सतीश पूनिया
Photo Credit: IANS- File Photo

क्या दोनों के बीच व्यक्तित्व का टकराव (पर्सनैलिटी क्लैश) था?

इस सवाल पर पूनिया कहते हैं, "मैंने हमेशा ध्यान रखा कि मैं पार्टी के लिए काम कर रहा हूं. मैंने हमेशा कोशिश की कि परस्पर सम्मान का माहौल बने. मैंने राजस्थान में पार्टी अध्यक्ष रहते हुए सार्वजनिक तौर पर कहा था कि जिस दिन मैं अपने मुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री के तौर पर तिलक लगा पाऊं, उस दिन मुझे खुशी होगी."

वसुंधरा राजे के साथ पुराना राजनीतिक टकराव अब अतीत की बात है. राजस्थान बीजेपी से बाहर किए जाने और विधानसभा चुनाव हारने के बाद सतीश पूनिया की वापसी अब पूरी होती दिख रही है. वे अब राज्यसभा सदस्य हैं, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं और उन्हें एक ऐसे राज्य का प्रभारी बनाया गया है जहां पार्टी के सामने संभवतः अब तक की सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौतियां हैं- पंजाब.

लेकिन सतीश पूनिया के लिए पंजाब केवल एक संगठनात्मक दायित्व भर नहीं है. यह इस बात की कड़ी परीक्षा है कि क्या उनका शांत, योजनाबद्ध, बारीकियों पर ध्यान देने वाला और जमीनी स्तर का सूक्ष्म प्रबंधन (माइक्रो-मैनेजमेंट) भाजपा को पंजाब में एक छोटे गठबंधन सहयोगी की भूमिका से बाहर निकालकर एक ऐसी जमीनी ताकत में तब्दील कर सकता है, जिसकी जमीन पर वास्तविक पकड़ हो और जो पार्टी को चुनावी जीत की दहलीज तक पहुंचा सके.

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