आदिवासी की पहचान, दक्षिण राजस्थान की सियासत, UCC बिल से आया नया मोड़

राजस्थान सरकार 20 अगस्त से शुरू हो रहे मानसून सत्र में UCC बिल पेश करेगी. सरकार ने आदिवासियों को इसके दायरे से बाहर रखने की बात कही है, लेकिन भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने इसे आदिवासी पहचान में विभाजन की कोशिश बताते हुए विरोध जताया है.

आदिवासी की पहचान, दक्षिण राजस्थान की सियासत, UCC बिल से आया नया मोड़
दक्षिण राजस्थान की सियासत में UCC बिल से आया नया मोड़

राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र 20 अगस्त से शुरू होने जा रहा है और इसी सत्र में सरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC बिल पेश करने की तैयारी में है. सरकार का कहना है कि UCC के जरिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दूसरे सिविल मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था लाई जाएगी. लेकिन आदिवासी समुदाय को इसके दायरे से बाहर रखने के प्रस्ताव के बावजूद दक्षिण राजस्थान में इस बिल को लेकर विवाद खत्म होता नहीं दिख रहा. आदिवासी संगठनों और भारत आदिवासी पार्टी का तर्क है कि आदिवासी समाज की अपनी पारंपरिक और सामुदायिक व्यवस्थाएं हैं, जिन्हें किसी एक समान कानून के दायरे में नहीं देखा जा सकता. इसी बहस के बीच सवाल सिर्फ UCC का नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान और दक्षिण राजस्थान की बदलती सियासत का भी है. 

आदिवासी का क्या तर्क है?

यूसीसी बिल को लेकर आदिवासी समाज का तर्क है कि आदिवासी समुदाय में रीति-रिवाज अलग होते हैं, खासकर विवाह और विवाह-विच्छेद (तलाक) को लेकर. ऐसे में उन्हें UCC से बाहर रखना चाहिए. UCC के तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दूसरे व्यक्तिगत कानूनों को एक समान करने की तैयारी है. हालांकि सरकार की ओर से आदिवासी समुदाय को प्रस्तावित कानून से बाहर रखने की बात कही गई है.  

Advertisement - Scroll to continue
Latest and Breaking News on NDTV

उदयपुर से लोकसभा सांसद मन्ना लाल रावत का कहना है कि जन जातियों को UCC से बाहर रखा जाएगा. जनजाति विराट हिन्दू समाज का एक अंग है और अंग होने के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हैं, लेकिन उनके कस्टमरी प्रक्टिस बहुत महत्वपूर्ण हैं. संविधान का अनुच्छेद 13 कस्टमरी प्रक्टिस को मानता है, तो इससे UCC में भी देनी चाहिए.

मुद्दे 3 हैं, एक तो विवाह संबंधी विषय है. विवाह विछेद (तलाक) सम्बन्धी विषय और उत्तराधिकार के विषय. आपसी डिस्प्यूट्स के निराकरण के विषय और कस्टमरी प्रक्टिस के कारण बाहर रखने का विषय आया है. 

आदिवासी को लेकर सरकार का क्या कहना?

सरकार भी आदिवासी समुदाय की अलग सामाजिक और पारंपरिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उन्हें UCC से बाहर रखने की बात कह रही है. सरकार का तर्क है कि UCC का मकसद अलग-अलग समुदायों के लिए सिविल कानूनों को ज्यादा पारदर्शी और व्यवस्थित बनाना है. राजस्थान के संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल के मुताबिक, राजस्थान यूनिफार्म सिविल कोड बिल भारतीय संविधान के अनुरूप महत्वपूर्ण निर्णय है. इसमें महत्वपूर्ण है विवाह, तलाक़, उत्तराधिकार, मेंटेनेंस और लिव इन से जुड़े क़ानूनों को एक सामान पारदर्शी और व्यवस्थित बनना है, लेकिन आदिवासी भाइयों को इससे बाहर रखा जायेगा. 

Advertisement - Scroll to continue

पर दक्षिण राजस्थान में आदिवासी पहचान की राजनीति करने वाली भारत आदिवासी पार्टी इस व्यवस्था पर सवाल उठा रही है. BAP का आरोप है कि आदिवासी समुदाय को UCC से बाहर रखने के बावजूद सरकार आदिवासियों के भीतर ही एक अंतर पैदा कर रही है. पार्टी का दावा है कि जो आदिवासी खुद को हिंदू के रूप में दर्ज कराते हैं, उन्हें UCC से बाहर रखा जाएगा, जबकि जिन आदिवासियों की धार्मिक पहचान प्रकृति पूजा, पूर्वज पूजा या आदि धर्म के रूप में दर्ज है, वे इसके दायरे में आ सकते हैं. 

राजस्थान में विवाद पैदा किया जा रहा- राजकुमार रोत

बांसवाड़ा से सांसद राजकुमार रोत का कहना है, "राजस्थान में विवाद पैदा किया जा रहा है. राजनीतिक वोटों का ध्रुवीकरण किया जा रहा है. जो आदिवासी समुदाय राजस्थान में अपने रिकॉर्ड में हिन्दू मानता है, उसको UCC से बाहर रखा जायेगा, लेकिन जो अपनी प्राकृतिक पूजा पद्धति को मानते हैं और अपने पूर्वजों को पूजते हैं. रिकॉर्ड में आदिधर्म रखा है तो उसे UCC में रखा जाएगा. आदिवासी समुदाय भोला भला है. हम चाहते हैं कि आदिवासी समुदाय पुरखाई व्यवस्था को बरकरा रखे."

राजकुमार रोत

राजकुमार रोत

बीजेपी सरकार पर निशाना साधते हुए राजकुमार रोत ने कहा कि ये आदिवासी समुदाय में 2 फाड़ करने का काम कर रहे हैं. ये अपने आप को वनवासी कहते हैं. लेकिन हम अपनी पुरखाई व्यवस्था को बरक़रार रखना चाहते हैं. हमारा जो आदि धरम है, उससे मान्यता देनी चाहिए. ये UCC का नया ट्रेंड है. बीएपी सांसद के मुताबिक, आदिवासी समुदाय के अधिकार ख़त्म किए जा रहे हैं. हम कहते हैं, आदिवासी का कोई धर्म नहीं है. उनकी अपनी पूजा पद्धति है. 

आदिवासी समाज की पहचान का आधार क्या?

यानी UCC पर विवाद अब सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं है कि आदिवासियों को कानून से बाहर रखा जाए या नहीं. सवाल यह भी है कि आदिवासी समाज की पहचान तय करने का आधार क्या होगा- धर्म, सरकारी रिकॉर्ड या उनकी पारंपरिक पूजा-पद्धति और सामाजिक व्यवस्था? और यही सवाल दक्षिण राजस्थान की राजनीति के लिए अहम हो जाता है. दक्षिण राजस्थान में यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां आदिवासी पहचान की राजनीति पिछले कुछ चुनावों में मजबूत हुई है. 2023 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में भारत आदिवासी पार्टी ने तीन सीटें जीतीं. 

इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में BAP के राजकुमार रोत ने बांसवाड़ा सीट पर BJP के महेंद्रजीत सिंह मालवीय को करीब 2 लाख 47 हजार वोटों के अंतर से हराया. इस जीत ने यह संकेत दिया कि दक्षिण राजस्थान में आदिवासी वोट अब सिर्फ BJP या कांग्रेस के बीच बंटने वाला वोट नहीं रह गया है. BAP एक अलग आदिवासी राजनीतिक पहचान और अलग राजनीतिक एजेंडा पेश कर रही है और यही वजह है कि दक्षिण राजस्थान में उसकी बढ़ती पकड़ BJP और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती बन रही है. ऐसे में BJP और कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि इस उभरती हुई आदिवासी सियासत को अपने साथ जोड़ने की भी है.

यह भी पढे़ं-

राजस्थान: मानसून सत्र में UCC बिल लाने की तैयारी में सरकार, लिव-इन रिलेशनशिप, तलाक, संपत्ति... और क्या बदलेगा

राजस्थान में बड़े नेताओं के गृह क्षेत्र की निकाय पर किस वर्ग को मौका? भजनलाल, गहलोत, डोटासरा के यहां कौन सी सीट