Mahashivaratri 2026: भगवान शिव का हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्व है. उन्हें देवों के देव कहा गया है. ऐसा कहा जाता है कि भारत में अनंत काल से महादेव की पूजा की जाती रही है. यही वजह है कि उत्तर से दक्षिण तक, भगवान शिव जी के मंदिर ही मंदिर हैं. पर क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव का सबसे ऊंचा शिव मंदिर कौन सा है और यह कहां स्थित है? आज जानें इसी मंदिर के बारे में.
तुंगनाथ मंदिर
यह मंदिर है उत्तराखंड का तुंगनाथ मंदिर. तुंगनाथ मंदिर को शिव जी के पंच केदार में से एक माना जाता है. पंच केदार यानी उत्तराखंड में मौजूद 5 प्राचीन शिव मंदिर. तुंगनाथ मंदिर 3,680 मीटर (12,073 फीट) की ऊंचाई पर चन्द्रनाथ पर्वत पर, उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है.
कैसे पहुंच सकते हैं तुंगनाथ मंदिर
तुंगनाथ का शाब्दिक अर्थ होता है 'पहाड़ों के भगवान'. तुंगनाथ मंदिर में दर्शन के लिए जाना है तो पहले सोनप्रयाग पहुंचना होता है. इसके बाद गुप्तकाशी, उखीमठ, चोपटा होते हुए तुंगनाथ मंदिर पहुंचा जा सकता है. उखीमठ से आगे चोपटा गांव है. उसके बाद यहां से तुंगनाथ पहाड़ी पर चढ़कर तुंगनाथ मंदिर तक पहुंचा जा सकता है.
तुंगनाथ मंदिर का इतिहास
यह मंदिर महाभारत काल जितना पुराना बताया जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर की नींव अर्जुन ने रखी थी. उस समय पांडवों ने महाभारत युद्ध के बाद भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यह मंदिर बनाया था. चूंकि महाभारत युद्ध में पांडवों ने भाइयों व गुरुओं का वध किया था, इसलिए इस पाप से मुक्त होने के लिए वे ऋषि व्यास के पास पहुंचे थे. तब व्यास जी ने उन्हें कहा कि भगवान शिव की उपासना करें. तभी सभी पापों से मुक्त हो सकते हैं.
तब पांडव हिमालय जा पहुंचे और भगवान शिव को तलाशने लगे. तब भगवान शिव उन्हें भैंस के रूप में मिले पर तुरंत ही भूमिगत हो गए. बाद में उनके शरीर (भैंस) के अंग पांच अलग-अलग जगहों पर प्रकट हुए.जहां-जहां ये अंग प्रकट हुए, पांडवों ने वहां शिव मंदिर बनवाए. इन्हें ही ‘पंच केदार' कहा जाता है. ‘पंच केदार' के हर मंदिर को भगवान शिव के शरीर के एक भाग के साथ पहचाना जाता है. तुंगनाथ इन्हीं ‘पंच केदार' में से तीसरा केदार माना गया है. यहां भगवान शिव के हाथ मिले थे. ‘पंच केदार' में तुंगनाथ मंदिर, केदारनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर शामिल हैं.
सर्दियों में बंद रहता है मंदिर
सर्दियों में अत्यधिक बर्फबारी के कारण यह मंदिर बंद हो जाता है. इस समय देवता की प्रतीकात्मक मूर्ति और पुजारी मुक्कुमठ चले जाते हैं. यह जगह मुख्य मंदिर से से 19 किलोमीटर दूर है. अप्रैल से नवंबर माह के बीच श्रद्धालु मुख्य मंदिर में दर्शन कर सकते हैं.