घर बनवाते समय कॉलम का साइज तय करना बेहद जरूरी होता है. क्योंकि यही ढांचा ऊपर की मंजिलों और स्लैब का भार जमीन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है. लेकिन हर घर के लिए एक ही साइज का कॉलम सही नहीं होता. सिविल इंजीनियर के अनुसार, कॉलम का आकार बिल्डिंग की मंजिलों की संख्या, कॉलम के बीच की दूरी, फ्लोर की ऊंचाई, मिट्टी की क्षमता और आने वाले कुल भार जैसी कई चीजों को ध्यान में रखकर तय किया जाता है. इसलिए सिर्फ देखकर या पड़ोसी के घर का साइज देखकर कॉलम तय नहीं करना चाहिए.
कितनी मंजिल का घर बन रहा है, यह जरूरी
एक्सपर्ट के अनुसार, सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि घर कितनी मंजिल का बनाया जा रहा है. G+1, G+2 या उससे ज्यादा मंजिलों की बिल्डिंग में कॉलम पर आने वाला भार अलग-अलग होता है. जैसे-जैसे मंजिलें बढ़ती हैं, स्ट्रक्चरल डिजाइन की जरूरत भी बदलती है. इसलिए कॉलम का साइज पूरे भवन के डिजाइन के आधार पर तय होना चाहिए.
कॉलम के बीच की दूरी भी करती है असर
कॉलम टू कॉलम दूरी बढ़ने पर बीम और कॉलम पर आने वाला भार भी बदल सकता है. एक्सपर्ट ने उदाहरण देते हुए बताया कि करीब 8 से 10 फीट की दूरी वाले कुछ सामान्य G+2 आवासीय मामलों में 9×9 इंच जैसे सेक्शन पर विचार किया जा सकता है. जबकि ज्यादा स्पैन होने पर बड़ा सेक्शन या विस्तृत डिजाइन जरूरी हो सकता है. हालांकि ये सिर्फ उदाहरण हैं, अंतिम साइज स्ट्रक्चरल डिजाइन से ही तय होगा.
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मिट्टी की क्षमता को नजरअंदाज न करें
कॉलम के साथ फुटिंग का डिजाइन भी मिट्टी की क्षमता पर निर्भर करता है. कमजोर मिट्टी में नींव का आकार और डिजाइन बढ़ सकता है. इसलिए निर्माण से पहले सााइट की मिट्टी और उसकी भार वहन क्षमता की जांच महत्वपूर्ण है.
फ्लोर की ऊंचाई भी है महत्वपूर्ण
घर में सामान्य फ्लोर हाइट के अलावा अगर ज्यादा ऊंचाई रखी जा रही है तो कॉलम की लंबाई बढ़ने से उसकी डिजाइन जरूरतें बदल सकती हैं. इसलिए फ्लोर की ऊंचाई को भी स्ट्रक्चरल डिजाइन में शामिल किया जाताा है.
सिर्फ तय साइज मानकर न बनाएं कॉलम
एक्सपर्ट के बताए 9×9, 9×15 या 12×18 इंच जैसे साइज को हर घर के लिए तय नियम नहीं माना जाना चाहिए. भारतीय मानकों के अनुसार, आरसीसी संरचना की डिजाइन में संबंधित कोड और साइट की परिस्थितियों को ध्यान में रखना होता है. BIS के अनुसार IS 456:2000 आरसीसी के लिए प्रमुख कोड है और इसे 2025 में भी समीक्षा किया गयाा है. इसलिए घर का नक्शा पास कराने के साथ-साथ कॉलम, बीम और फुटिंग का डिजाइन योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर से जरूर करवाएं. खासकर भूकंप वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त संरचनात्मक प्रावधानों की जरूरत हो सकती है.
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