मिलेनियल्स को सता रहा रिप्लेस होने का खतरा, जानें क्या है डिस्पोजेबल वर्कर सिंड्रोम

एआई और ऑटोमेशन के बढ़ते इस्तेमाल ने कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स, खासकर मिलेनियल्स, के बीच जॉब सिक्योरिटी को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है. सर्वे बताते हैं कि कई कर्मचारी खुद को रिप्लेसेबल महसूस कर रहे हैं.

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डिस्पोजेबल वर्कर सिंड्रोम क्या होता है

आज के कॉर्पोरेट दौर में सबसे बड़ा सवाल ये नहीं है कि आपकी सैलरी कितनी है, बल्कि ये है कि आपकी जरूरत कितने समय तक बनी रहेगी. खासतौर से एआई के आने के बाद ये न सिर्फ एक सवाल है. बल्कि एक डर भी बन गया है. ऑफिस में एआई और ऑटोमेशन की बढ़ती एंट्री ने कई प्रोफेशनल्स को सोचने पर मजबूर कर दिया है. जो काम कभी टीमों की मेहनत से होते थे. वो अब सॉफ्टवेयर और एल्गोरिद्म करने लगे हैं. ऐसे माहौल में कई लोग खुद से पूछ रहे हैं कि क्या उनकी जॉब सिक्योर है या वो भी कभी रिप्लेसेबल बन सकते हैं. लगातार बढ़ती जॉब इनसिक्योरिटी और भविष्य को लेकर चिंता की वजह से अब कई लोग डिस्पोजेबल वर्कर सिंड्रोम का शिकार हो रहे हैं. आखिर क्या है ये सिंड्रोम और क्यों बढ़ रही है जॉब इनसिक्योरिटी चलिए जानते हैं.

डिस्पोजेबल वर्कर सिंड्रोम क्या है?

डिस्पोजेबल वर्कर सिंड्रोम उस सोच को कहा जाता है, जिसमें एंप्लॉई को लगने लगता है कि उसकी नौकरी ज्यादा स्टेबल नहीं है और वो कभी भी बदला जा सकता है. उसे महसूस होता है कि उसकी जगह नई टेक्नोलॉजी, एआई या नई स्किल्स वाला कोई दूसरा व्यक्ति ले सकता है. ऐसे में वो खुद को कंपनी के लिए जरूरी नहीं, बल्कि आसानी से रिप्लेस होने वाला समझने लगता है. यही सोच धीरे-धीरे नौकरी को लेकर डर, असुरक्षा और मानसिक दबाव को बढ़ा देती है, जिसका असर उसके कॉन्फिडेंस और वर्क परफॉर्मेंस पर भी पड़ने लगता है.

एआई: मददगार भी, डर भी

ग्रेट प्लेस टू वर्क इंडिया के सर्वे के मुताबिक करीब 49% मिलेनियल्स को लगता है कि अगले 3 से 5 साल में एआई उनकी नौकरी पर असर डाल सकता है. दिलचस्प बात ये है कि ये डर सिर्फ जूनियर कर्मचारियों तक सीमित नहीं है. सीनियर लोग भी खुद को इनसिक्योर महसूस कर रहे हैं. खासतौर से जहां कंपनियां एआई ला रही हैं लेकिन सही ट्रेनिंग और उस पर क्लियरिटी नहीं दे रही हैं. वहां ये डर और भी ज्यादा बढ़ रहा है.

मिलेनियल्स क्यों ज्यादा चिंतित हैं?

30 से 45 साल के प्रोफेशनल्स करियर के ऐसे दौर में हैं जहां उन पर लोन, परिवार और भविष्य की जिम्मेदारियां हैं. उन्होंने पहले भी आर्थिक मंदी और छंटनी देखी है. अब एआई के आने से उन्हें लगता है कि उनकी भूमिका बदल सकती है. उन्हें मेहनत से नहीं, बल्कि वर्कप्लेस पर जरूरी न रहने के अहसास से डर लगता है.

प्रमोशन भी नहीं दे रहा सुकून

पहले प्रमोशन का मतलब था ज्यादा सिक्योरिटी. अब कई लोगों को लगता है कि ऊंचे पद पर जाकर भी एआई उनके काम का हिस्सा संभाल सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर मशीन वही काम बेहतर कर दे तो इंसान की भूमिका क्या रहेगी?

सॉल्यूशन क्या है?

जहां लीडर खुलकर बात करते हैं, ट्रेनिंग देते हैं और एआई को सपोर्ट की तरह पेश करते हैं, उन संस्थानों में वर्कर्स ज्यादा कॉन्फिडेंस के साथ काम कर रहे हैं. सच ये है कि आज का दौर एक ही भूमिका में टिके रहने का नहीं, बल्कि बदलती भूमिकाओं के साथ खुद को ढालने का है. इसलिए जरूरी है कि आप नई तकनीक से लैस रहें. ताकि किसी भी प्रोफाइल में काम करना आपके लिए आसान हो.

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