80th Independence Day: आजादी की पूर्व संध्या पर भारत और पाकिस्तान में क्या हो रहा था?
आजादी की पूर्व संध्या पर दिल्ली और कराची में जश्न का माहौल तो था लेकिन बंटवारे के गम ने इसे थोड़ा फीका कर दिया था. आजादी से पहले ही दोनों देशों में हत्याएं और हिंसा के दौर जारी था.
14 अगस्त 1947 की दोपहर लॉर्ड माउंटबेटन दिल्ली में नहीं, कराची में थे. वजह सीधी थी वायसराय एक ही दिन दोनों नए मुल्कों के सत्ता हस्तांतरण समारोह में मौजूद नहीं रह सकते थे, इसलिए पाकिस्तान का जश्न भारत से एक दिन पहले रख दिया गया. यही वजह है कि पाकिस्तान आज भी अपना स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को मनाता है, भारत 15 को.
लेकिन आजादी की पूर्व संध्या पर भारत और पाकिस्तान में क्या हो रहा था? जिन्ना क्या कर रहे थे, नेहरू कहां थे और महात्मा गांधी दिल्ली से दूर क्यों थे?
कराची में माउंटबेटन और जिन्ना क्या कर रहे थे?
वायसराय माउंटबेटन एक ही वक्त पर दिल्ली और कराची, दोनों जगह मौजूद नहीं रह सकते थे. इसलिए पाकिस्तान का सत्ता हस्तांतरण समारोह 14 अगस्त की दोपहर कराची में रखा गया.
भारतीय अमेरिकी लेखक निसिद हजारी ने अपनी किताब 'मिडनाइट्स फ्यूरीज'उस दिन का विस्तृत वर्णन किया है. निसिद हजारी ने लिखा कि उस सुबह सिंध विधानसभा भवन के बाहर हजारों लोग जमा थे. जिन्ना और माउंटबेटन एक खुली बग्घी में सवार होकर वहां पहुंचे.
वहीं लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लापिएर अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लिखते हैं कि सुरक्षा एजेंसियों को जिन्ना की हत्या की साजिश की गुप्त सूचना पहले ही मिल चुकी थी. पूरे रास्ते माउंटबेटन और जिन्ना तनाव में रहे. जब बग्घी सकुशल विधानसभा पहुंची, तो जिन्ना ने राहत की सांस लेते हुए माउंटबेटन से कहा, "अल्लाह का शुक्र है, मैं आपको जिंदा वापस ले आया."
वहां माउंटबेटन ने सम्राट जॉर्ज छठे का संदेश पढ़ा और पाकिस्तान को संप्रभु राष्ट्र घोषित किया. इसके बाद जिन्ना ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की नींव रखने का की बात भी कही.

निसिद हजारी की किताब 'मिडनाइट्स फ्यूरीज'
दिल्ली में क्या था माहौल?
दिल्ली के संविधान सभा भवन के बाहर लाखों लोग 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे. यास्मीन खान अपनी किताब 'द ग्रेट पार्टिशन' में लिखती हैं कि सड़कें रोशनी से जगमगा रही थीं, लेकिन पर्दे के पीछे प्रशासनिक तनाव उतना ही गहरा था.
रात 11 बजे शुरू हुए सत्र में सुचेता कृपलानी ने 'वंदे मातरम' गाया. इसके बाद नेहरू ने अपना वह भाषण दिया जिसे इतिहास 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' के नाम से जाना जाता है. उन्होंने कहा, "जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा."
आधी रात बजते ही असेंबली हॉल में शंखध्वनि गूंजी. मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपनी आत्मकथा 'इंडिया विन्स फ्रीडम' में लिखा कि दिल्ली के लिए यह पल सालों के बलिदान का फल था, लेकिन नेताओं के मन में पंजाब और बंगाल के जलने का गम भी उतना ही जिंदा था.

मौलाना अबुल कलाम आजाद की किताब में इंडिया विन्स फ्रीडम
Photo Credit: Orient BlackSwan
कलकत्ता में गांधी जी क्या कर रहे थे?
जिस वक्त दिल्ली और कराची जश्न मना रहे थे, महात्मा गांधी कलकत्ता के दंगा-प्रभावित बेलियाघाटा में 'हैदरी मंजिल' में ठहरे हुए थे.
महात्मा गांधी की सचिव रहे प्यारेलाल ने अपनी किताब 'महात्मा गांधी: द लास्ट फेज' में इस दिन का ब्यौरा दिया. उन्होंने लिखा, "गांधी ने पूरा दिन उपवास रखा, प्रार्थना की, सूत काता. जब कुछ युवा नेहरू का संदेश लेकर पहुंचे कि देश आजाद हो रहा है, आशीर्वाद दें, तो गांधी ने कहा, "जब देश में चारों तरफ दंगे हो रहे हों, बहन-बेटियों की इज्जत लूटी जा रही हो, तब मैं किस बात का जश्न मनाऊं?"
माउंटबेटन ने बाद में उन्हें 'वन मैन बाउंड्री फोर्स' कहा था. उन्होंने कहा था कि पंजाब में पचास हजार सशस्त्र सैनिक जो हिंसा नहीं रोक पाए, कलकत्ता में वह अकेले फकीर से रुक गई.

गांधीजी सांप्रदायिक हिंसा को शांत करने के लिए कोलकाता के हैदरी मंजिल में रुके थे.
Photo Credit: Mahatma Gandhi Org
पंजाब में अनिश्चचता में जी रहे थे लोग
पंजाब में यूं तो लोगों के मन में आजाद हो जाने की खुशी थी. लेकिन मन में कई डर थे और भारत और पाकिस्तान की सरहद को लेकर अनिश्चचता की स्थिति थी.
सर सिरिल रेडक्लिफ ने सीमा-रेखा 12 अगस्त तक तय कर ली थी, लेकिन माउंटबेटन ने जानबूझकर उसे 17 अगस्त तक सार्वजनिक नहीं किया.
महात्मा गांधी की हत्या के बाद नाथूराम को सजा सुनाने वाले जज जी.डी. खोसला ने भारत के विभाजन और उसकी त्रासदी पर लिखी किताब 'स्टर्न रेकनिंग' में लिखते हैं कि 14-15 अगस्त की रात लाहौर, अमृतसर, रावलपिंडी और गुजरांवाला में लाखों लोगों को यह पता ही नहीं था कि वो किस मुल्क के नागरिक बन चुके हैं.
उस रात लाहौर का शाह आलमी बाजार आग में जल रहा था, अमृतसर स्टेशन पर विस्थापितों से भरी ट्रेनें उतर रही थीं.

बंटवारे के दौरान शरणार्थियों से भरी एक ट्रेन
Photo Credit: Archives of India
जानी मानी लेखक उर्वशी बुटालिया अपनी किताब 'द अदर साइड ऑफ साइलेंस' में लिखती हैं कि उस रात महिलाओं और बच्चों के लिए आजादी से बड़ी लड़ाई सिर्फ जिंदा बचे रहने की थी.
एक तरफ दिल्ली और कराची में नए झंडे फहर रहे थे, दूसरी तरफ लाखों लोग अपने पुरखों की जमीन छोड़कर अनजान रास्तों पर पैदल निकल पड़े थे. आजादी की वह रात जिसने एक साथ एक नया सवेरा भी दिया और लेकिन एक पुराना ताना-बाना भी हमेशा के लिए तोड़ दिया.
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