नीतीश कुमार: कितने मजबूत, कितने मजबूर
बिहार एक बार फिर चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, ऐसे में आइए देखते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ताकत, कमजोरियां, अवसर और खतरा क्या है और उनकी राजनीति कैसी रही है.
भारत के उत्तर में, जहाँ गंडक, कोसी और कमला— जैसी गंगा की सहायक नदियां बिहार के मैदानों में धीमे-धीमे बहती हैं, वहाँ नीतीश कुमार पिछले 20 साल से एक ऐसे राज्य को लीड कर रहे हैं, जो शांति से ज्यादा हंगामे का आदी है. साल 2005 में, जब उन्होंने लालू प्रसाद यादव के लंबे दबदबे से बिहार को निकाला था, उसके बाद से नीतीश वहां के चहेता चेहरा बने रहे, जो आखिरी तक डटा रहता है. बिहार से लाखों लोग काम की तलाश में दूसरे शहरों-और राज्यों में पलायन करते हैं. एक तरफ जहां हिंदी हार्टलैंड में हमेशा उथल-पुथल मची रही, वहीं बिहार में, अच्छे-बुरे वक्त में भी नीतीश कुमार बने रहे.
नीतीश कुमार का चेहरा
इस साल नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार आठवीं बार मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे. उनका चुनाव मैदान में उतरना एक अजूबा है. वे बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं, 20 साल सत्ता में हैं फिर भी लोग उन्हें गेम-चेंजर, किंगमेकर या सर्वाइवर कहते हैं. आज के बड़े-बड़े नेताओं की तरह जोर-शोर से सत्ता पाने वालों से अलग, नीतीश एक शांत कारीगर की तरह हैं. वे गठबंधन बनाते-बिगाड़ते हैं, दोस्ती-वफादारी को नए सिरे से तय करते हैं. वो उतना ही सत्ता में रहते हैं जितना जरूरी है, कभी स्थायी होने का लालच किए बिना.
बिहार के मौसमों की किताब में नीतीश कुमार का करियर एक लंबे मानसून की तरह दर्ज है- 2005-10 में जोरदार बारिश, 2014-15 में रुकावट और उलट-पलट और उसके बाद रुक-रुक कर बौछारें. आँकड़े, टेबल में सजे, अपनी एक अलग कहानी कहते हैं. साल 2010 में नीतीश बिहार के सबसे बड़े प्रतीक थे. जेडीयू को 115 सीटें मिली थीं, सड़कों और स्कूलों में शांत लेकिन क्रांतिकारी बदलाव, लड़कियों के लिए साइकिल और कंप्यूटर, पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण. 2015 तक, उन्होंने अकेलापन छोड़कर पुराने विरोधियों के साथ गठजोड़ किया, लेकिन धीरे-धीरे ये रिश्ता कमजोर हो गया. साल 2020 में वे पुराने गठबंधन के साथ लौटे, लेकिन सुर्खियां कुछ और बनीं, बीजेपी को 74 और जेडीयू को 43 सीटें. अब नीतीश एक अनुभवी कंडक्टर से कहीं ज्यादा हैं, न कि अकेले गाने वाला सितारा.

नीतीश कुमार की ताकत और कमजोरियां
नीतीश कुमार की ताकत, उनकी कमजोरियों, उनके लिए अवसर और उनके खतरों (SWOT) का विश्लेषण किसी बिजनेस स्कूल की कवायद नहीं, बल्कि ये सोचने का मौका है कि इतने लंबे समय तक टिके रहना भी अपने आप में एक विचारधारा हो सकती है.
नीतीश की सबसे बड़ी ताकत यह है कि लोग उन्हें एक इंजीनियर से बने नेता के रूप में देखते हैं, जो बिहार में सुशासन वापस लाया. साल 2005 में जब उन्होंने सत्ता संभाली तो बिहार जंगल राज का पर्याय था, जहां कानून-व्यवस्था नाम की चीज नहीं थी. नीतीश ने शुरुआती सालों में हालात बदले, सड़कें ऐसी बनीं जिन पर गाड़ियां चल सकें, स्ट्रीट लाइटें जो सचमुच जलें, स्कूलों में टीचर ऐसे हुए जो पढ़ाने आएं और पुलिस जो गश्त करे. निराशा में डूबे बिहार के लिए यह किसी क्रांति से कम नहीं था.
तेजस्वी से अधिक नीतीश को पसंद करती हैं महिलाएं
हाल ही में हुए इंकइंसाइट ओपिनियन पोल के मुताबिक, 60.4 फीसदी महिलाएं नीतीश कुमार की अगुवाई वाले एनडीए को वोट देना चाहती हैं, वहीं केवल 28.4 फीसदी महिलाएं हीं तेजस्वी यादव के महागठबंधन को वोट दे सकती हैं. करीब 45 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे नीतीश को बिहार का मुख्यमंत्री चाहती हैं, जबकि 31 फीसदी ने तेजस्वी को चुना. ऐसे में नीतीश कुमार के पास अपने नजदीकी प्रतिद्वंद्वी पर 32 फीसदी का बड़ा लैंगिक बढ़त है. नीतीश के शांत और सादे अंदाज में कई महिलाएं न सिर्फ एक नेता, बल्कि सशक्तिकरण और बराबरी की उनकी यात्रा में एक साथी देखती हैं, जब वे वोट डालती हैं, तो ये सिर्फ लोकतंत्र का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि बिहार की उभरती कहानी में अपनी भूमिका को मजबूत करना भी है.

नीतीश कुमार की जीवटता भी उनकी खासियत है, जो भारतीय राजनीति में कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि ताकत है. नीतीश ने बार-बार साथी बदले—कभी बीजेपी के साथ गए, फिर अलग हुए, वापस लौटे, फिर आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन में शामिल हुए और फिर वापस पलट गए. हर बार उन्होंने अपने फैसले को जरूरत बताया, न कि धोखा. उनके आलोचक, खासकर आरजेडी के लालू प्रसाद, उन्हें 'पलटू राम' कहते हैं. जहां लोग जोर-शोर से अपनी विचारधारा की बात करते हैं, वहां नीतीश एक व्यावहारिक और बीच का रास्ता चुनने वाले नेता के तौर पर चमके. उनका असली मंत्र हमेशा 'सुशासन' रहा, न कि कोई खास विचारधारा और इसीलिए वे बिना टूटे बार-बार दिशा बदल पाए. इसके अलावा, उनकी शख्सियत भी खास है, वे ज्यादा शोर-शराबा नहीं करते, आमतौर पर बिना चमक-दमक के, लेकिन लोगों को लगता है कि वे गंभीर, सादगी पसंद और भ्रष्टाचार से दूर हैं. नीतीश ने कभी बड़े-बड़े भाषण देने की कोशिश नहीं की, वे चुपचाप काम करने वाले प्रशासक बने. एक ऐसे राज्य के लिए, जो शोर और दिखावे से थक चुका था, उनकी यह सादगी और शांति लोगों को भरोसा देती थी.
नीतीश कुमार का बार-बार पलटना
लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की अपनी कीमत होती है, जो बात पहले व्यावहारिक लगती थी, अब अवसरवाद जैसी दिखती है. बीजेपी से आरजेडी, फिर वापस बीजेपी और शायद कल को कहीं और. ये बार-बार का पलटना उन्हें एक बड़े नेता से ज्यादा पटना की राजनीतिक हवा में लहराते झंडे जैसा बना देता है. अगर ताकत जीवटता है, तो कमजोरी उस जीवटता का तरीका है. आज नीतीश को एक ऐसा नेता माना जाता है, जो अकेले जीत नहीं सकता और टिके रहने के लिए गठबंधनों पर निर्भर है.
सत्ता में लंबे समय तक रहने की थकान भी नीतीश पर साफ नजर आती है. नीतीश के शुरुआती सालों (2005-2010) की ताजगी अब फीकी पड़ चुकी है. हां, सड़कें बेहतर हुई हैं, लेकिन नौकरियां अब भी दिल्ली, पंजाब और मुंबई की ओर जा रही हैं. बिहार की प्रति व्यक्ति आय देश के ज्यादातर राज्यों से पीछे है. नीतीश की शराबबंदी नीति, जिसे पहले नैतिक सुधार के तौर पर खूब सराहा गया और महिलाओं में बहुत लोकप्रिय थी, अब काले बाजार, पुलिस की ज्यादती और रोज के पाखंड से जूझ रही है. उनकी निजी शांत और अलग-थलग रहने की शैली, जो पहले जातिगत राजनीति के उलझनों में एक ताकत थी, अब अलगाव और युवा मतदाताओं से जुड़ने में कमजोरी दिखती है, जो संयम नहीं, बल्कि जोश चाहते हैं. नीतीश 2000 के दशक के नेता हैं, जो अब भी 2020 के दशक में कमान संभालने की कोशिश कर रहे हैं.

नीतीश कुमार का बीच का रास्ता
नीतीश के लिए अवसर उनकी पुरानी सोच में है: बीच का रास्ता. आज भारत में, जहां हिंदू राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय लोकप्रियता के बीच बंटवारा बढ़ रहा है, नीतीश अब भी संतुलन की जगह बनाए हुए हैं. वे सावधानी से जाति जनगणना, महिलाओं के लिए आरक्षण और सामाजिक न्याय की बात करते हैं. और जरूरत पड़ने पर हिंदुवादी ताकतों के लिए भी स्वीकार्य रहते हैं. अगर 2025 के बिहार चुनाव में बीजेपी और आरजेडी के बीच कड़ा मुकाबला हुआ, तो नीतीश फिर से वह शख्स हो सकते हैं, जिसके इर्द-गिर्द गठबंधन बनते हैं. उनके पास पुरानी यादों का भी मौका है. बिहार के कई लोगों के लिए, नीतीश वही नेता हैं जिन्होंने 1990 के दशक के बुरे दौर के बाद शासन में सम्मान वापस लाया. अगर वे इस कहानी को फिर से जगा सकें, लोगों को याद दिलाएं कि उन्होंने क्या किया तो वे इस शोर-शराबे वाले राजनीतिक झगड़े में जिम्मेदार बड़े की तरह अपनी जगह बरकरार रख सकते हैं. जैसा कि दुसाध जाति के एक गरीब रिक्शा चालक महेश ने मुझे हाल की बिहार यात्रा पर गर्व से बताया था, ''विकास ही नीतीशजी की पहचान है."
राष्ट्रीय स्तर पर, इंडिया गठबंधन एक ऐसे चेहरे की तलाश में है, जो सबको मंजूर हो. नीतीश की नरम, बीच का रास्ता चुनने वाली और सबके लिए स्वीकार्य छवि अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुई है. वे कभी नरेंद्र मोदी जैसे नहीं हो सकते, लेकिन चुपके से मोदी के उलट हो सकते हैं- सादा, जमीन से जुड़ा और शांत.
नीतीश के सामने खतरा क्या है
आज नीतीश के सामने कई खतरे हैं. सबसे बड़ा दुश्मन है समय- 20 साल बाद, उनका अच्छा शासन भी पुराना गाना लगने लगा है. तेजस्वी यादव के पास जवानी का जोश है, बीजेपी के पास संगठन की ताकत और नीतीश बीच में फँसे हैं न तो हावी होने की ताकत, न ही पूरी तरह नजरअंदाज करने लायक. उनके बार-बार गठबंधन बदलने से न सिर्फ सहयोगी, बल्कि वोटर भी दूर हो सकते हैं, जो अब समझ नहीं पाते हैं कि नीतीश किसके लिए खड़े हैं. जितना वे इधर-उधर जाते हैं, उतना ही कम आगे बढ़ते दिखते हैं. आज की राजनीति में, जहां करिश्मा, सोशल मीडिया और बड़े-बड़े रैलियों का बोलबाला है, नीतीश का शांत और पुराना अंदाज थोड़ा बेमेल लगता है.
एक और खतरा है कि नीतीश को सिर्फ एक पुल की तरह याद किया जाए, जिसने बिहार को डूबने से बचाया, लेकिन उसे तरक्की की ऊंचाइयों तक नहीं ले जा सका. पिछले दो दशक में बिहार का जीएसडीपी कई बार दोहरे अंकों में बढ़ा, लेकिन फिर भी, बाकी राज्यों की तुलना में, ज्यादातर आर्थिक मानकों पर बिहार सबसे नीचे है. 2,000 साल से ज्यादा के गौरवशाली इतिहास वाला यह सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य, जिसमें मौर्य, गुप्त और सम्राट अशोक जैसे नाम शामिल हैं, नीतीश सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद समय के एक ठहरे हुए चक्र में फंसा लगता है, जिसे अर्थशास्त्री निम्न संतुलन का घातक जाल कहते हैं.

क्षेत्रीय ताकतों के बीच में नीतीश
2025 में नीतीश कुमार को देखना ऐसा है, जैसे बड़े-बड़े बादशाहों के दौर में एक जुझारू योद्धा को देखना. मोदी दिल्ली पर राज करते हैं, ममता पड़ोसी बंगाल पर काबिज हैं, योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय ताकत की तरह उभरे हैं और बाकी क्षेत्रीय नेता अपने-अपने इलाकों में दहाड़ रहे हैं. लेकिन नीतीश एक शांत और अकेले योद्धा की तरह हैं, जो अपने गठबंधनों को उसी सावधानी से बनाते हैं जैसे कभी पुल बनाया करते थे. उनकी ताकत है उनकी सादगी, कमजोरी है जोश की कमी. उनका मौका है बीच का रास्ता और खतरा है समय.
और अंत में, SWOT विश्लेषण एक सिंगल पहेली में सिमट जाता है- नीतीश जरूरी भी हैं और अनदेखे भी. केंद्र में भी और किनारे भी, हमेशा मौजूद भी हैं, फिर भी मंच पर पूरी तरह कब्जा नहीं कर पाते हैं. शायद यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उनके टिकने की ताकत का राज है. अपने राज्य से बहने वाली गंगा की तरह, नीतीश चमकने की कोशिश नहीं करते, वे बस चलते रहना चाहते हैं. बिहार में, यह चलते रहना ही अपने आप में एक क्रांति है.
ये भी पढ़ें: पीएम मोदी को 111वीं गाली, फिर पड़ेगी विपक्ष पर भारी?
-
'मुझे पीटा और कहा- इसके अंदर से सारी क्रांति निकालो', छात्रसंघ बहाली के लिए अनशन के बीच जामिया ने बनाई कमेटी
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 12 अक्टूबर से स्टूडेंट यूनियन बहाली के लिए हंगर स्ट्राइक चल रही है. छात्र जासिम ख़ां ने प्रॉक्टर टीम पर लात मारने और घसीटने का आरोप लगाया. प्रशासन ने कई छात्रों के ख़िलाफ़ एक्शन भी लिया है.
-
Opinion: भारत को बार बार इतने हल्के में क्यों ले रहा है अमेरिका, 'ब्रेकअप' आसान होगा या नहीं?
क्या अमेरिका में लोकल टैलेंट पूरी तरह से भारतीय टैलेंट की जगह ले सकता है? US भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर बनाने में सबसे आगे क्यों है.
-
12 दिन से भूख हड़ताल पर JNU छात्र; जेंडर न्यूट्रल वॉशरूम, ट्रांसजेंडर्स के लिए हॉस्टल सहित NTA से दूरी भी है डिमांड लिस्ट में
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छात्रों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल जारी है. 3 अक्टूबर से JNUSU प्रेसिडेंट अदिति मिश्रा सहित 17 स्टूडेंट्स 'साबरमती टी पॉइंट' पर कई मांगों के साथ प्रोटेस्ट कर रहे हैं.
-
रनवे भी नहीं, कामचलाऊ प्लेन... जब वायुसेना ने कश्मीर बचाने के लिए हथियारों से नहीं, जिगर से लड़ा था युद्ध
8 अक्टूबर 1932 को भारतीय वायुसेना का गठन हुआ था. आज 94 साल हो गए हैं. ऐसे में जानते हैं वायुसेना के उस ऑपरेशन के बारे में जिसने कश्मीर को बचाया.
-
40 साल पहले जिस जुनून को दुनिया ने कहा 'पागलपन', आज उसी पर फ्रांसिस हैल्जेन को मिला फिजिक्स का नोबेल
फिजिक्स का नोबेल 2026 प्रोफेसर फ्रांसिस हैल्जेन को ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो की खोज और आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री की स्थापना में अहम योगदान के लिए मिला है. इस खोज ने ब्रह्मांड को समझने का नया रास्ता खोला है.
-
AMU में भी 'जंतर-मंतर', 17 दिन से भूख हड़ताल पर क्यों बैठे हैं यासिर, जबरन हटाने की कोशिश पर रात भर हंगामा
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 21 सितंबर से छात्रों का प्रदर्शन 17वें दिन भी जारी है. उर्दू विभाग के यासिर फहद अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं और 18 छात्रों पर FIR दर्ज हुई है.
-
जब पाकिस्तान में घुसा भारतीय खुफिया जेट, स्पीड ऐसी कि कुछ कर न सकी पाक वायुसेना- पायलट ने पहली बार सुनाई कहानी
भारतीय वायु सेना के मिग 25 की कहानी जिसने पाकिस्तान और चीन की सीमा में घुसकर वहां से तय की गई जगहों की तस्वीरें लेकर आया था. लेकिन पड़ोसी देश उसका बाल भी बांका नहीं कर पाए थे.
-
बिखरा मलबा, अधूरी टूटी बिल्डिंग, छात्र गायब और दुकानदारों का धंधा चौपट... हादसे के एक महीने बाद ऐसा है सत्य निकेतन - ग्राउंड रिपोर्ट
दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला PG इमारत गिरने से हुई 7 मौतों के एक महीने बाद भी मौके पर मलबा पड़ा है, आधी टूटी इमारत से खतरा बरकरार है और 50 फीसदी छात्र इलाका छोड़ चुके हैं.
-
KVS-NVS शिक्षक भर्ती: जाति प्रमाण पत्र पर लगी शर्तों से अधर में लटका सैकड़ों का भविष्य, अभ्यर्थियों ने सुनाई दर्द भरी दास्तां
नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों के 15 हजार पदों की शिक्षक भर्ती में OBC-NCL सर्टिफिकेट के लिए जारी की गई शर्त से हजारों अभ्यर्थियों के सामने चुनौती खड़ी हो गई है.
-
अगर चुनाव फिक्स हैं तो कांग्रेस बहिष्कार क्यों नहीं करती? राहुल के 'ध्यान भटकाने' वाले जवाब में कितना लॉजिक
चुनाव बॉयकॉट की जबरदस्त मांग 'कॉकरोच जनता पार्टी' की तरफ से आई है. लेकिन क्या बॉयकॉट से कोई फायदा होता है? रिसर्च, उदाहरण और एक्सपर्ट्स का एनालिसिस हमें इस बारे में क्या बताते हैं, आइए जानते हैं.