Explainer: तीस्ता जल समझौता क्या है? बंगाल में भाजपा के जीतते ही फिर चर्चा में आया, पानी को लेकर भारत-बांग्लादेश का कई वर्षों पुराना विवाद
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के साथ ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने इस नतीजे का खुलकर स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि अब भारत-बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल बंटवारा समझौता आगे बढ़ सकता है. आइए समझें कि आखिर तिस्ता जल समझौता है क्या? क्यों ये विवाद लंबे वक्त से अटका हुआ है?
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद बांग्लादेश की सत्ताधारी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने बयान जारी कर उम्मीद जताई है कि अब भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता जल समझौता आगे बढ़ सकता है. BNP का कहना है कि पश्चिम बंगाल में बदली राजनीतिक परिस्थिति से 'नीतिगत अड़चनें' कम होंगी और जल बंटवारे पर सहमति बनने की संभावना बढ़ेगी. ऐसे में एक बार फिर यह सवाल केंद्र में है कि आखिर तीस्ता समझौता है क्या और क्यों दशकों से अटका हुआ है?
तीस्ता नदी: विवाद की धुरी
तीस्ता नदी की शुरुआत सिक्किम के हिमालयी इलाके से होती है और यह पश्चिम बंगाल से गुजरते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है. यह नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि दोनों देशों के लाखों किसानों की जीवनरेखा है. उत्तर बंगाल और बांग्लादेश के रंगपुर क्षेत्र में खेती इसी पर निर्भर है. दरअसल सूखे मौसम (दिसंबर से मई) में पानी बेहद कम हो जाता है, जिससे टकराव बढ़ता है.

असली विवाद: पानी का बंटवारा
तीस्ता विवाद का मूल सवाल है कि किसे कितना पानी मिले? बांग्लादेश लंबे समय से सूखे मौसम में ज्यादा हिस्सेदारी की मांग करता रहा है. भारत के भीतर भी पश्चिम बंगाल अपने किसानों के लिए पानी रोकने की दलील देता है.
यानी यह सिर्फ दो देशों का नहीं, बल्कि केंद्र बनाम राज्य का भी मसला बन जाता है.
यह भी पढ़ें- बंगाल में भाजपा की जीत से बांग्लादेश कैसे हुआ गदगद! तारेक रहमान की पार्टी को जगी नई उम्मीद, तीस्ता संधि पर दिया बयान
कई बार हुईं समझौते की कोशिशें
तीस्ता नदी को लेकर विवाद 1947 में भारत के विभाजन से शुरू हुआ , जब नदी के जलग्रहण क्षेत्र भारत और बांग्लादेश के बीच विभाजित हो गए. बांग्लादेश को 1971 में स्वतंत्रता मिलने के बाद यह मुद्दा फिर से सामने आया. फिर 1983 में अस्थायी सहमति बनी.
1983: अस्थायी फॉर्मूला
दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यवस्था बनाई. जिसके तहत भारत के पास लगभग 39% पानी रहेगा, बांग्लादेश के पास लगभग 36% और बाकी पानी अनिर्धारित बहेगा. लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं बन सका.
2011: लगभग तय समझौता, आखिरी वक्त पर ब्रेक
2011 में एक नया समझौता लगभग फाइनल था, जिसमें बराबर हिस्सेदारी का फॉर्मूला सामने आया. लेकिन ममता बनर्जी के विरोध के बाद इसे लागू नहीं किया जा सका.
विरोध क्यों हुआ?
राज्य सरकार का तर्क था कि इससे उत्तर बंगाल के किसानों को नुकसान होगा. बता दें कि भारत में जल संसाधन पर राज्यों की सहमति जरूरी होती है.
बंगाल में भाजपा आते ही BNP ने जारी किया बयान
बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का बयान कई मायनों में महत्वपूर्ण है. पहली बार बांग्लादेश की सत्ताधारी पार्टी ने खुले तौर पर भारत की आंतरिक राजनीतिक स्थिति को तीस्ता समझौते से जोड़ा है. BNP को लगता है कि अगर राज्य और केंद्र में राजनीतिक टकराव कम हुआ, तो समझौता आसान हो सकता है. यह संकेत भी है कि बांग्लादेश के भीतर तीस्ता अब सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि पूरी राजनीति का मुद्दा बन चुका है.
यह भी पढ़ें- ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को समझिए जो चीनी चुनौती के बीच हिंद महासागर में बनेगा भारत का नया 'कंट्रोल रूम'
अब तक यह मुद्दा मुख्य रूप से शेख हसीना सरकार उठाती रही थी, लेकिन BNP के बयान से यह साफ है कि बंगाल में सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए यह अहम कूटनीतिक एजेंडा है.
क्या हैं कूटनीतिक और रणनीतिक मायने
तीस्ता समझौता सिर्फ पानी का बंटवारा नहीं है, बल्कि भारत-बांग्लादेश रिश्तों का टेस्ट केस बन चुका है. अगर समझौता होता है, तो द्विपक्षीय रिश्तों में भरोसा और मजबूत होगा. चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच बांग्लादेश का झुकाव किस ओर होगा, इसमें भी यह मुद्दा भूमिका निभा सकता है. सीमा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे कई बड़े समझौतों पर भी इसका असर पड़ सकता है.
फिर भी क्यों अटका है मामला?
तीस्ता समझौता तीन बड़ी बाधाओं में फंसा है-
1. केंद्र बनाम राज्य
भारत में राज्यों की सहमति के बिना ऐसा समझौता लागू करना मुश्किल है.
2. पानी की सीमित उपलब्धता
सूखे मौसम में नदी का जलस्तर काफी गिर जाता है.
3. राजनीतिक जोखिम
किसानों के मुद्दे पर कोई भी सरकार समझौता करने से हिचकती है.
अब आगे क्या?
BNP के बयान ने एक बार फिर उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन जमीन पर हकीकत अभी भी जटिल है. अगर पश्चिम बंगाल और केंद्र के बीच तालमेल बनता है, तभी यह समझौता आगे बढ़ सकता है. अब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार होने से चीजें सरल होने की उम्मीद है.
लेकिन यह तो साफ है कि कोई भी सरकार किसी भी सहमति तक पहुंचने से पहले सोच विचार करेगी. क्योंकि तीस्ता जल समझौता अब सिर्फ एक नदी का विवाद नहीं रहा. यह राजनीति, कूटनीति और चुनावी समीकरणों का संगम बन चुका है. ऐसे में नया सवाल यह है कि बंगाल में बीजेपी की जीत और ऐसे में BNP की उम्मीद क्या इस बार दशकों के गतिरोध को तोड़ पाएगी.
-
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछे गए सवाल से तय हो गई थी भारत की आजादी की तारीख, जापान से क्या था कनेक्शन?
माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तारीख 15 अगस्त इसलिए चुनी क्योंकि यह जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ थी, जो उनके सैन्य करियर की बड़ी उपलब्धि थी.
-
आदिवासी की पहचान, दक्षिण राजस्थान की सियासत, UCC बिल से आया नया मोड़
राजस्थान सरकार 20 अगस्त से शुरू हो रहे मानसून सत्र में UCC बिल पेश करेगी. सरकार ने आदिवासियों को इसके दायरे से बाहर रखने की बात कही है, लेकिन भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने इसे आदिवासी पहचान में विभाजन की कोशिश बताते हुए विरोध जताया है.
-
देश आजाद होने वाला था... उन आखिरी 48 घंटों में महात्मा गांधी ने क्या लिखा, क्या कहा?
जब हिंदुस्तान स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा था तो दूसरी तरफ गांधी लोगों को शांति, संयम और इंसानियत का संदेश दे रहे थे.
-
80th Independence Day: आजादी की पूर्व संध्या पर भारत और पाकिस्तान में क्या हो रहा था?
आजादी की पूर्व संध्या पर दिल्ली और कराची में जश्न का माहौल तो था लेकिन बंटवारे के गम ने इसे थोड़ा फीका कर दिया था. आजादी से पहले ही दोनों देशों में हत्याएं और हिंसा के दौर जारी था.
-
दो घूंट पानी के लिए रोज जान पर खेलते बच्चे, नोएडा में गरीबों की दर्दनाक तस्वीर
नोएडा सेक्टर-78 के पास झुग्गी बस्ती में रहने वाले सैकड़ों लोग पिछले कई महीनों से एक लीक हो रही पाइपलाइन से नाले के अंदर उतरकर पानी भरने को मजबूर हैं. पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट.
-
मॉनसून सत्र का लेखा-जोखा- सबकी जीत हुई, संसद की हार हुई
पिछले कुछ दशकों के रुझान बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक ढांचे के सबसे ऊपरी हिस्से, यानी संसद को कमजोर करने की साजिश में चुपचाप शामिल हो गई हैं. उन्होंने जवाबदेह लोकतंत्र के इस मंदिर को दरकिनार करना सीख लिया है और दूसरे तरीकों से चुनाव जीत रही हैं.
-
सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान... कागजी शेर साबित होगा 'इस्लामी नाटो'! फिर भी भारत को कर लेनी चाहिए ये तैयारी
मक्का समझौते में पाकिस्तान सिर्फ पैसे के चक्कर में शामिल हुआ है. उसकी हालत फिल्म 'दिल धड़कने दो' के उस पंजाबी बिजनेसमैन जैसी है, जो कंगाली की कगार पर होकर भी एक महंगी क्रूज यात्रा पर जाता है. ताकि कोई अमीर आदमी उसकी डूबती कंपनी में पैसा लगा दे.
-
Explained: पायलटों के ड्रग टेस्ट को लेकर क्या है नियम, कब रद्द होता है लाइसेंस?
चार साल पहले DGCA ने विमानन क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ड्रग टेस्ट से जुड़े कुछ नियम बनाए थे.
-
पाकिस्तान के झांसे में कैसे आ गया था बलूचिस्तान, एक आजाद रियासत ने मार ली अपने पैरों पर कुल्हाड़ी?
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बलूचिस्तान चार प्रमुख रियासतों कलात, खारान, लसबेला और मकरान में बंटा हुआ था. अंग्रेजों ने 1876 की ऐतिहासिक संधि के तहत कलात की स्वतंत्र और संप्रभु स्थिति को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया था.
-
पंजाब में BJP-अकाली का साथ आना क्या AAP, कांग्रेस के लिए बन सकता है चुनौती? आंकड़ों में समझें
पंजाब की राजनीति में बीजेपी और अकाली दल की दोस्ती का इतिहास काफी पुराना है. 1990 के दशक की शुरुआत में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़े, लेकिन 1996 में अकाली दल के मोगा डिक्लेरेशन के बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक नजदीकी बढ़ी.