कैसे आग के गोले पर बैठे हुए हैं दिल्ली के कुछ पॉपुलर मार्केट, कैसे की जाती है नियमों की अनदेखी

दिल्ली में आग लगने की घटनाएं अब आम होती जा रही है. इनमें अब तक हजारों लोगों की जान जा चुकी है. साल 2019 से तीन जून 2026 तक इन घटनाओं में 543 लोगों की मौत हो चुकी है. दिल्ली के कुछ बजारों और वहां आग से निपटने की तैयारी के बारे में बता रही हैं शताब्दी चौधरी.

कैफे, रंग-बिरंगी दुकानें और स्टाइलिश बुटीक वाली अनगिनत तंग गलियां, जिन पर हल्की पीली रोशनी और नियॉन लाइट वाले पब की चमक है. ये सब एक-दूसरे के ऊपर जेंगा ब्लॉक की तरह सजे हुए हैं. इमारतें और गलियों के ऊपर तारों का जाल लटका हुआ है. इन गलियों में खाने-पीने की जगहों से लाइव म्यूजिक और फेरीवालों की तेज आवाजें आती रहती हैं. ये गलियां खचाखच भरी रहती हैं. यह नजारा आप हौज खास विलेज, हुमायूंपुर या मजनू का टीला में देख सकते हैं. ये इलाके दिल्ली के कुछ मशहूर कमर्शियल हब में शामिल हैं. लेकिन अगर यहां आग लग जाए, तो हालात कैसे होंगे, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है.

ऐसे इलाकों में आग लगने की घटनाएं हो चुकी है. ऐसी घटनाओं की गिनती भी मुश्किल है. इन हॉटस्पॉट के बारूद के ढेर में बदलने की सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

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मजनू का टीला में लगी आग

24 अक्टूबर, 2025 को NDTV की प्राप्ति उपाध्याय और उनके तीन दोस्त मजनू का टीला में अपनी निजी कामयाबियों, दो नई नौकरियां, एक प्रमोशन और पीएचडी के कामकाज का अच्छे से चलने का जश्न मना रहे थे. लेकिन एक सिलेंडर ब्लास्ट की वजह से उसमें रुकावट आई.

हम मशहूर AMA कैफे गए, जो सीट मिलने के लिए अधिक देर तक इंतजार करने के लिए बदनाम है. काफी देर तक इंतजार करने के बाद हमें टेबल मिली. हमने माचा पिया. हमने अच्छा खाना खाया. हम अपनी शाम को वैसे ही खत्म कर रहे थे जैसे अच्छी शामें खत्म होनी चाहिए, कैफे की बालकनी में ग्रुप फोटो खिंचवाकर. तभी हमें धमाके की आवाज सुनाई दी. मुझे तुरंत पता चल गया कि कुछ गड़बड़ है. हम चारों बालकनी के किनारे की तरफ देखने के लिए बढ़े, इससे पहले कि हम एक-दूसरे से एक शब्द भी कह पाते, दो दरवाजे छोड़कर, एक सिलेंडर फट गया था. आग लगभग गली के उस पार लगे हेम्प के कपड़ों के स्टॉल तक पहुंच गई थी. मैं जहां खड़ी थी, वहां से उसकी तपिश को महसूस कर सकती थी. गली में लोग चीखते-चिल्लाते हुए भाग रहे थे. पांच मिनट से भी कम समय में, सब खत्म हो गया. न कोई फायर ब्रिगेड, न किसी का कोई नाटकीय दखल. जो लोग कुछ देर पहले तक चीख-चिल्ला रहे थे, वे अब हंस रहे थे. राहत की हंसी. ठीक वैसी ही हंसी जो तब आती है जब हॉरर फिल्म का भूत किसी और को चुन लेता है. हम वापस अंदर गए, बिल चुकाया और चले गए. किसी ने ज्यादा कुछ नहीं कहा. हम सबने बस मान लिया कि सब ठीक है. मैं थोड़ी देर के लिए उस दुकान पर रुकी. दीवारों पर लगी कालिख इस बात का सबूत थी कि वहां कुछ हुआ था. बाहर, नियॉन साइनबोर्ड अभी भी गुलाबी और नीले रंग की रोशनी बिखेर रहे थे. लैफिंग के स्टॉल अभी भी लगे हुए थे. गली फिर लोगों की भीड़ से भर गई थी. ठीक वैसी ही भीड़ जो अभी कुछ देर पहले भाग रही थी. यहां छोटी-मोटी आग बुझाना एक आम बात है. जब तक कि कोई बड़ा हादसा न हो जाए.

मजनू का टीला के कैफे पर कार्रवाई

इस घटना के कुछ महीनों बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने अधिकारियों को मजनू का टीला में कई कैफे, बार और रेस्तरां के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया, जो कथित तौर पर बिना मंजूर बिल्डिंग प्लान और फायर सेफ्टी उपाय के चल रहे थे. यह आदेश उसी समय आया, जब गोवा के एक नाइटक्लब में आग लगने से 25 लोगों की मौत हो गई थी. गोवा में हुई त्रासदी का कारण एक ही एंट्री-एग्जिट पॉइंट, संकरी गली से रास्ता और फायर क्लीयरेंस का न होना था. ये समस्याएं सिर्फ गोवा की नहीं हैं. दिल्ली में भी कई व्यावसायिक इमारतों की यही स्थिति है. ज्यादातर में कई मंजिलों के बीच एक ही संकरी सीढ़ी होती है. ये सभी किसी संभावित त्रासदी का कारण बन सकते हैं.

दिल्ली ने ऐसी कई त्रासदियां देखी हैं.

आठ दिसंबर, 2019: अनाज मंडी

अनाज मंडी के रिहायशी इलाके में जूतों और स्कूल बैग की एक अवैध फैक्ट्री में आग लगने से 43 लोगों की मौत हो गई थी. इस हादसे में 56 लोग घायल हुए थे. बिल्डिंग के पास फायर लाइसेंस नहीं था और एंट्री के रास्ते पर लोहे की ग्रिल लगी हुई थी. बचाव कर्मियों को अंदर जाने के लिए गैस कटर की जरूरत पड़ी. मरने वालों में अधिकतर अंदर सो रहे मजदूर थे.

23 दिसंबर, 2019: किराड़ी

कपड़े के एक गोदाम में आग लगने से नौ लोगों की मौत. आग का कारण शॉर्ट सर्किट था. बाहर निकलने का सही रास्ता न होने की वजह से हादसा बड़ा हो गया.

13 मई, 2022: मुंडका

मुंडका मेट्रो स्टेशन के पास एक चार मंजिला कमर्शियल बिल्डिंग में आग लगने से 27 लोगों की मौत. कारण: शॉर्ट सर्किट, फायर एग्जिट न होना, फायर एक्सटिंग्विशर न होना. अधिकारियों को आग बुझाने में नौ घंटे लगे.

15 फरवरी, 2024: अलीपुर

एक पेंट फ़ैक्ट्री में केमिकल धमाके के बाद 11 लोगों की मौत हो गई. इस बड़े हादसे की वजहें थीं: बाहर निकलने का सही रास्ता न होना और आग का पास के नशा मुक्ति केंद्र तक फैल जाना.

और फिर वह हादसा हुआ, जिसने सुरक्षा ऑडिट की मांग को फिर से तेज कर दिया.

3 जून, 2026: हौज रानी, ​​मालवीय नगर

एक 'बेड एंड ब्रेकफ़ास्ट'(बीएनबी) में आग लगने से 23 लोगों की मौत हो गई.बीएनबी को केवल छह कमरों का लाइसेंस मिला था, लेकिन वहां 25 कमरे बने हुए थे. रहने के लिए बेसमेंट का भी इस्तेमाल हो रहा था. अंदर-बाहर जाने का सिर्फ  एक ही रास्ता था. मरने वालों में कई विदेशी नागरिक भी शामिल थे. शुरुआती जांच में आग से सुरक्षा के कई नियमों के उल्लंघन और इमारत की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी कमियों का पता चला.

दिल्ली में आग से कितने लोगों की मौत हुई है

दिल्ली में 2019 से अब तक आग की घटनाओं में 543 लोगों की जान जा चुकी है. दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, अगर 2016 से देखें तो यह संख्या 800 से ज्यादा हो जाती है. अकेले 2026 की पहली छमाही में आग लगने की घटनाओं में 65 लोगों की मौत की खबर है.

हौज़ रानी की घटना के बाद अधिकारियों ने पूरे शहर में होटलों, लॉज, नर्सिंग होम, कोचिंग सेंटर, रेस्तरां और दूसरे कमर्शियल प्रतिष्ठानों के खिलाफ़ सख़्ती से नियम लागू करने का अभियान शुरू किया. अधिकारियों ने कहा कि सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वाली जगहों को बंद किया जा सकता है, सील किया जा सकता है और उनके खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.

हालांकि, अगर आज रात दिल्ली में आग से सुरक्षा के सभी नियम लागू कर दिए जाएं, तो शहर के सबसे लोकप्रिय कमर्शियल इलाके बंद हो जाएंगे.

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दिल्ली के सबसे चहल-पहल वाले कई कमर्शियल इलाके ऐसी जगहों पर बने हैं, जिन्हें कभी इतनी ज्यादा भीड़-भाड़ संभालने के लिए डिजाइन नहीं किया गया था, जैसे कि शहरी गांव (हौज खास विलेज, हुमायूंपुर, शाहपुर जाट और सैदुलजाब), कोचिंग हब (मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर) और रिहायशी इमारतों में चल रहे मिक्स-यूज़ मार्केट.  इनमें से अधिकतर इलाके 'लाल डोरा' के दायरे में आते हैं.

क्या होता है लाल डोरा

'लाल डोरा' नाम औपनिवेशिक दौर की एक प्रथा से आया है. इसमें जमीन का रेवेन्यू विभाग रिहायशी इलाकों (आबादी) को खेती वाली जमीन से अलग करने के लिए लाल धागे का इस्तेमाल करता था. इस निशान की वजह से आबादी वाले इलाके म्युनिसिपल अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र और शहरी विकास योजनाओं से बाहर हो गए. ये इलाके अब दिल्ली के शहरी गांव हैं.

दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी के पूर्व चीफ टाउन प्लानर एके जैन ने बताया कि दिल्ली स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर और DUAC की कई स्टडीज से पता चलता है कि जमरूदपुर, मोहम्मदपुर, शाहपुर जाट, कोटला मुबारकपुर, हौज रानी,​ हौज खास, जिया सराय, कालू सराय, कटवारिया सराय और यूसुफ सराय जैसे गांवों में पिछले 30 सालों में इमारतों की संख्या 300-600 से बढ़कर 10,000-15,000 हो गई है. इनमें सात मंजिल तक की इमारतें शामिल हैं. उन्होंने कहा,''इनकी वजह से सेवाओं और नागरिक सुविधाओं पर इतना ज्यादा दबाव पड़ा है कि वे कभी भी चरमरा सकती हैं."

नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के दिल्ली चैप्टर हेड,संदीप आनंद गोयल ने कहा कि जैसे-जैसे दिल्ली का विस्तार हुआ, हौज खास विलेज, शाहपुर जाट और लाल डोरा वाले दूसरे इलाकों में धीरे-धीरे कमर्शियलाइजेशन हुआ.वो कहते हैं, '' ये इलाके रातों-रात नहीं बने. जैसे-जैसे बिजनेस के मौकों की मांग बढ़ी और अधिकृत कमर्शियल जगहें कम पड़ गईं, वैसे-वैसे ये इलाके विकसित होते गए.'' उन्होंने माना कि तेजी से हो रहे इस कमर्शियलाइजेशन के बारे में सरकार, प्लानिंग अथॉरिटी और एडमिनिस्ट्रेटर अच्छी तरह जानते हैं.

तंग जगहों पर क्यों आते हैं लोग

इसका एक उदाहरण हुमायूंपुर है. यह नॉर्थ-ईस्ट के खानों के लिए दिल्ली में शायद सबसे लोकप्रिय इलाका है. नॉर्थ-ईस्ट से आए लोगों के लिए हॉस्टल का भी गढ़ है. यहां पास-पास बनी इमारतें हैं, जिनमें सीढ़ियां साझा हैं, रेस्टोरेंट के ऊपर पेइंग गेस्ट (पीजी) के लिए रहने की जगह है, किचन और एयर कंडीशनिंग की वजह से बिजली का भारी लोड है. यहां की गलियां बहुत संकरी हैं.

हौज रानी में लगी आग के कुछ दिनों बाद, म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली (एमसीडी) ने हुमायूंपुर में 20 से ज्यादा जगहों पर सीलिंग के नोटिस चिपका दिए. जब ​​उपाध्याय ने शनिवार, 27 जून को बाजार का दौरा किया, तो हालात काफी हद तक सामान्य हो चुके थे. उन्होंने लोगों से पूछा कि सुरक्षा जोखिमों के बावजूद वे यहां क्यों आते रहते हैं.

नॉर्थ-ईस्ट भारत की रहने वाली प्रिया दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही हैं. उन्होंने कहा,''मैं यहां खाने की वजह से वापस आती हूं. घर से इतनी दूर होने के बावजूद, मुझे इस जगह पर घर जैसा एहसास होता है.'' 

वहीं दिल्ली में रहने वाली 23 साल की एक छात्रा के लिए, आग से ज्यादा महिलाओं की सुरक्षा की चिंता अहम है. उसने कहा, ''जब मैं किसी जगह जाती हूं, तो मुझे महिलाओं की बुनियादी सुरक्षा की चिंता होती है, वहां किस तरह के लोग होंगे और क्या वह जगह सुरक्षित लगेगी न कि इस बात की कि वहां आग लग सकती है.'' उसने रुककर कहा,''जिस तेजी से आग लगने की घटनाएं हो रही हैं, यह बात सबसे पहले दिमाग में आनी चाहिए. लेकिन फिर तो जाने के लिए कोई जगह ही नहीं बचेगी."

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Photo Credit: Prapti Upadhayay

शिवम (बदला हुआ नाम) 24 साल के हैं और एमबीए कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि रेस्टोरेंट चुनते समय वह आग से सुरक्षा के बारे में नहीं सोचते. अगर मुझे कोई जगह पसंद आती है, तो मैं वहां जरूर जाऊंगा. सच कहूं तो, मैं आग से ज्यादा भूकंप के बारे में सोचता हूं.''

इन तीनों युवाओं ने कहा कि अगर सरकार नियमों का पालन न करने वाली सभी जगहों को बंद कर दे, तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी.शिवम ने कहा, "किसी के कारोबार से ज्यादा इंसानी जिंदगी अहम है.''

क्या नियमों का पालन कर पाना मुमकिन है 

फायर डिपार्टमेंट के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) राजिंदर अटवाल ने कहा कि विभाग आग से सुरक्षा की जांच के लिए 'लाल डोरा' और दूसरे इलाकों के बीच कोई फर्क नहीं करता. फिर उन्होंने वे शर्तें बताईं जिनके तहत फायर एनओसी जारी नहीं किया जा सकता. उन्होंने बताया, ''अगर किसी जगह तक जाने के लिए 6 मीटर चौड़ी सड़क नहीं है, तो विभाग उसे अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी नहीं करता. भले ही वह बाकी सभी जरूरी शर्तों को पूरा करता हो." 

दिल्ली के शहरी गांवों की तंग गलियों में बनी ज्यादातर इमारतें इस नियम पर खरी नहीं उतरेंगी. उनमें से ज्यादातर छह मीटर चौड़ी नहीं हैं. अगर उनके किनारे बनी इमारतों को तोड़ा न जाए, तो उन्हें छह मीटर चौड़ा नहीं किया जा सकता. अटवाल ने कहा,''बहुमंजिला इमारतों में केवल एक सीढ़ी नहीं होनी चाहिए. अगर ऐसी इमारतों में दो सीढ़ियां नहीं हैं, तो फायर डिपार्टमेंट उन्हें एनओसी नहीं देता.''

एमसीडी के एक अधिकारी से जब यह पूछा कि शहरी गांवों में कितने कमर्शियल संस्थान बिना कंप्लीशन सर्टिफिकेट के चल रहे हैं तो उन्होंने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया,''ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.''

दलालों का बढ़ता दायरा

जब नियमों का पालन करना बनावट के लिहाज से ही नामुमकिन हो, तो एक समानांतर सिस्टम काम करने लगता है.
दक्षिण दिल्ली के एक रेस्टोरेंट मालिक ने, जिन्होंने अपना नाम न बताने का अनुरोध करते हुए कहा, ''ऐसे लाइजन ऑफिसर होते हैं जो फीस लेकर आपके सभी लाइसेंस का काम संभालते हैं. यह फीस रेस्टोरेंट में किए गए निवेश का एक से तीन फीसदी तक हो सकती है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितनी अच्छी तरह मोल-भाव करते हैं. यह कभी केवल एक लाइसेंस का मामला नहीं होता. हर डिपार्टमेंट का अपना प्रॉसेस और अपने लोग होते हैं. लाइजन ऑफिसर अपने कॉन्टैक्ट्स से बात करते हैं, जो किसी और के कॉन्टैक्ट्स से बात करते हैं. यहां 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' जैसी कोई चीज नहीं है. बस कमीशन की एक चेन होती है और आप उसके आखिर में होते हैं."

यह कहानी केवल दिल्ली की नहीं है. मुंबई के पश्चिमी इलाकों में चार आउटलेट चलाने वाले एक पूर्व रेस्टोरेंट मालिक ने, जिनका काम करोना महामारी के दौरान बंद हो गया था, एक ऐसे सिस्टम के बारे में बताया जो खराब कामकाज के मामले में बिल्कुल वैसा ही था. भारत में कानून मौजूदा हालात को ध्यान में रखकर नहीं बनाए जाते. अक्सर उन्हें ऐसे अधिकारी बनाते हैं जिन्हें आग से सुरक्षा के बारे में बहुत कम या कोई जानकारी नहीं होती. उन्होंने कहा कि जहां नियमों का पालन करना असल में मुमकिन नहीं होता, वहां कागजी कार्रवाई पूरी करने के लिए दिखावा किया जाता है, जैसे दीवार पर केवल दरवाजे का ढांचा लगा देना, उसकी फोटो खींचना और उसे आग से निकलने के रास्ते (फायर एग्जिट) के सबूत के तौर पर फाइल में लगा देना. आग की घटना में जब लोगों की जान जाती है, तो अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं कि दरवाजा तो था, लेकिन रेस्टोरेंट मालिक ने किसी वजह से उसे बंद कर दिया या वहां दीवार बना दी.

दक्षिण दिल्ली के एक रेस्टोरेंट मालिक का मामला अलग है. उनका दावा है कि उनकी बिल्डिंग सभी नियमों का पालन करती है , दो मंजिलें, दो सीढ़ियां और जरूरी बीस के मुकाबले तीस अग्निशमन यंत्र. लेकिन उन्होंने एक ऐसी समस्या की ओर इशारा किया जिसे रेस्टोरेंट मालिक ठीक नहीं कर सकते. हौज खास जैसे इलाकों में सड़कें संकरी हैं. हर जगह अतिक्रमण है, और इसे ठीक करना रेस्टोरेंट मालिक की जिम्मेदारी नहीं है.

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क्या इस समस्या का कोई समाधान है?

दिल्ली विकास प्राधिकरण के राजनीतिक विंग के सदस्य राजीव बब्बर ने जोर देते हुए कहा, ''उम्मीद है कि 'मास्टर प्लान दिल्ली 2041' शहरी गांवों, बुनियादी ढांचे और भविष्य के विकास से जुड़ी कई चुनौतियों का समाधान करेगा.'' उन्होंने कहा, ''जब कमर्शियल हब और शहरी गांवों की बात आती है, जहां विकास तेजी से बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों और कमर्शियल मांग की वजह से हुआ है, तो सुरक्षा नियमों को लागू करने पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है. दिल्ली में 23 एजेंसियां काम कर रही हैं और सभी प्रवर्तन एजेंसियों को मिलकर काम करने की जरूरत है. ऐसी घटनाओं को रोकने और सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए बेहतर तालमेल बहुत जरूरी है.''

एके जैन का कहना था कि इसका समाधान शहरी गांवों को ऐसी जगहों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए जिनके लिए सजा दी जाए, बल्कि उन्हें ऐसी बस्तियों के तौर पर देखना है जिन्हें बेहतर बनाया जा सके. इसके लिए वहीं पर सुधार, सहकारी पुनर्विकास, प्लॉट को मिलाना और समुदाय की भागीदारी से धीरे-धीरे सड़कों को चौड़ा करना जैसे उपाय किए जा सकते हैं. उन्होंने कहा,'' यह केवल घरों के बारे में नहीं है, बल्कि शहरी ढांचे के भीतर सम्मान, यादों और पहचान को बनाने के बारे में भी है.'' 

लेकिन यह एक तात्कालिक सच्चाई का दीर्घकालिक समाधान है. आग लगने की हर घटना के बाद वही चक्र दोहराया जाता है- जांच की घोषणा, नियमों को सख्ती से लागू करने के वादे, कुछेक प्रतिष्ठानों पर सीलिंग के नोटिस और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है. आग लगने के बाद जांच का हर वादा यह जानते हुए किया जाता है कि नियमों को पूरी तरह लागू करने से वे इलाके बंद हो जाएंगे जो दिल्ली की शहर के तौर पर पहचान हैं.

इस बीच, दिल्ली के व्यस्त इलाकों में से एक में, लोग सूरज ढलने के काफी देर बाद भी संकरी सीढ़ियों से होकर ऊपर जा रहे हैं.

(इशिका वर्मा और रवीश रंजन ने भी इस रिपोर्ट में सहयोग किया.)

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