गाय 'वोट' देती है! मनुष्य सामाजिक प्राणी है, गाय राजनीतिक प्राणी कैसे बन गई?

भारत में सदियों से गाय का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व रहा है. 19वीं सदी में गोरक्षा आंदोलनों से लेकर आज गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग तक, यह मुद्दा लगातार भारतीय राजनीति और समाज के केंद्र में बना हुआ है.

गाय वोट देती है... सुनने में यह बात अजीब लग सकती है. क्योंकि हमने हमेशा यही सुना है कि गाय दूध देती है. फिर वोट देने की बात कहां से आ गई? इसकी वजह है भारतीय राजनीति में गाय की मौजूदगी और उसका प्रभाव.

पिछले कुछ दिनों से कई मुस्लिम नेता और धार्मिक हस्तियां गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहे हैं. ऐसे नेताओं और संगठनों की संख्या कम नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मुस्लिम नेतृत्व गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिलाने की मांग क्यों कर रहा है?

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यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि देश में लंबे समय से एक धारणा मौजूद है कि मुसलमान गोमांस खाते हैं और बकरीद पर गोवंश की कुर्बानी देते हैं. इसी बहस के बीच भारतीय राजनीति का वह पहलू सामने आता है, जहां कहा जाता है कि 'गाय वोट देती है'.

जाहिर है, गाय खुद मतदान नहीं करती. लेकिन उससे जुड़ी धार्मिक भावनाएं, सांस्कृतिक पहचान, राजनीतिक संदेश और सामाजिक ध्रुवीकरण चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं. यही वह आधार है, जिस पर यह राजनीतिक कहावत खड़ी दिखाई देती है.

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भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा हिंदू है, जिसके लिए गाय आस्था और सम्मान का प्रतीक मानी जाती है. दूसरी ओर मुसलमान देश का दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय हैं. गाय इन दोनों समुदायों के बीच एक ऐसे बिंदु पर खड़ी दिखाई देती है, जहां धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श एक-दूसरे से टकराते भी हैं और संवाद भी करते हैं. यही कारण है कि गाय भारतीय राजनीति में बार-बार लौटकर आने वाला विषय बन जाती है.

बकरीद के दिन शुभेंदु अधिकारी की गोपूजा क्यों चर्चा में रही?

बकरीद के दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तस्वीरें चर्चा में रहीं, जिनमें वे इस्कॉन मंदिर में आयोजित गोपूजा कार्यक्रम में शामिल दिखाई दिए. यह आयोजन ऐसे समय में हुआ जब राज्य सरकार ने पशु वध संबंधी कानूनों को सख्ती से लागू करने की बात कही थी. इस निर्णय को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती भी दी गई.

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा था कि गाय की कुर्बानी ईद-उल-अजहा की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और इसे इस्लाम का अपरिहार्य हिस्सा नहीं माना जा सकता. इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर गोवंश, कुर्बानी और राजनीति पर बहस को तेज कर दिया.

बकरीद से पहले गोवंश की कुर्बानी पर विवाद क्यों बढ़ा?

बकरीद से पहले पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और उत्तर भारत के कई राज्यों में गोवंश की कुर्बानी और तस्करी को लेकर चर्चाएं तेज रहीं. कई हिंदू संगठनों ने प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की. विभिन्न राज्यों ने भी अवैध पशु वध और तस्करी पर कार्रवाई की चेतावनी जारी की.

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा समेत कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस विषय पर बयान दिए. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और अन्य राज्यों में भी प्रशासनिक स्तर पर निगरानी बढ़ाई गई.

बकरीद पर मुस्लिम नेतृत्व का 'सरप्राइज'

इसी बीच देश के कई प्रमुख मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग रख दी. उनके अनुसार इससे हर वर्ष बकरीद के दौरान होने वाले विवादों को समाप्त करने में मदद मिल सकती है. इस मांग का समर्थन करने वालों में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़े सैय्यद सरवर चिश्ती और ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख डॉ. उमर अहमद इलियासी जैसे नाम शामिल बताए गए.

दिलचस्प बात यह है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग लंबे समय से विभिन्न हिंदू संगठनों और संतों द्वारा भी उठाई जाती रही है. उनका तर्क रहा है कि इससे भारतीय संस्कृति और परंपरा को संस्थागत सम्मान मिलेगा.

VHP ने इस मांग को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

विश्व हिंदू परिषद और अन्य हिंदू संगठनों ने मुस्लिम नेताओं की मांग का स्वागत करने के बजाय गोरक्षा और गोवंश संरक्षण पर अधिक जोर दिया. संगठन के कई नेताओं ने कहा कि गाय उनके लिए केवल पशु नहीं, बल्कि माता के समान है.

हालांकि सवाल यह भी उठता है कि यदि राष्ट्रीय पशु का दर्जा गोरक्षा को और मजबूत बना सकता है, तो इस मांग को लेकर व्यापक राजनीतिक सहमति क्यों नहीं बन पाती? इसके पीछे राजनीतिक, संवैधानिक और कानूनी कारणों की चर्चा भी होती रही है.

गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा क्यों नहीं मिला?

आजादी के बाद कई बार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठी, लेकिन इसे कभी स्वीकार नहीं किया गया. इसके विपरीत गोवध, गोतस्करी, गोमांस, गोरक्षा और मॉब लिंचिंग जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बने रहे. 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि देश को गोसेवकों और तथाकथित गोरक्षकों के बीच अंतर समझना होगा.

काऊ कडलिंग बनाम काऊ पॉलिटिक्स

दुनिया के कई देशों में 'काऊ कडलिंग' यानी गाय को गले लगाने को तनाव कम करने वाली थेरेपी के रूप में प्रचारित किया जाता है. इसके लिए शुल्क भी लिया जाता है. लेकिन भारत में गाय का संदर्भ केवल पशु प्रेम तक सीमित नहीं है. यहां गाय के साथ राजनीति, धर्म, संस्कृति, पहचान और अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है. गोरक्षा, गोसेवा, गोशालाएं, गोतस्करी, गोमांस और गोपूजा जैसे मुद्दे लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने रहते हैं. यही वजह है कि चुनावी राजनीति में गाय की प्रतीकात्मक शक्ति लगातार बनी हुई है.

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गाय के राजनीतिक महत्व का इतिहास

भारतीय सभ्यता में गाय का महत्व अत्यंत प्राचीन है. वैदिक काल में गाय केवल पशुधन नहीं थी, बल्कि आर्थिक संपन्नता का प्रतीक भी मानी जाती थी. कई इतिहासकारों का मानना है कि उस दौर में गाय विनिमय के माध्यम के रूप में भी उपयोग की जाती थी.

भारतीय भाषाओं और परंपराओं में भी गाय की छाप दिखाई देती है. दुहिता, गोपाल, गोविंद, गोपी, गोष्ठ, गोकुल, गोत्र और गोमती जैसे अनेक शब्द गाय से जुड़े सांस्कृतिक संदर्भों की याद दिलाते हैं. समय के साथ कृषि आधारित समाज विकसित हुआ और गाय तथा गोवंश ग्रामीण जीवन की रीढ़ बन गए. दूध, खेती और पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था ने गाय को सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बना दिया.

मध्यकाल में गाय कैसे बनी राजनीतिक प्रतीक?

इतिहासकारों के अनुसार मध्यकाल में विभिन्न धार्मिक परंपराओं और खानपान संबंधी भिन्नताओं के कारण गाय एक संवेदनशील विषय के रूप में उभरी. कई शासकों ने स्थानीय धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए पशु वध संबंधी नीतियां अपनाईं. अकबर, जहांगीर, शिवाजी और अन्य ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से जुड़े कई प्रसंग इस संदर्भ में उद्धृत किए जाते हैं. हालांकि अलग-अलग इतिहासकार इन घटनाओं की व्याख्या अलग-अलग तरीके से करते हैं.

1857 से गोरक्षा आंदोलनों तक

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1857 के विद्रोह में एनफील्ड कारतूसों पर लगी कथित गाय और सुअर की चर्बी ने व्यापक असंतोष पैदा किया था. इसके बाद 19वीं सदी के उत्तरार्ध में गोरक्षा आंदोलन अधिक संगठित रूप में सामने आए.

1860 के दशक में नामधारी आंदोलन, 1872 का कूका आंदोलन, 1880 के दशक में आर्य समाज की पहल और गौरक्षिणी सभाओं की स्थापना ने गोरक्षा को बड़े सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया.

1893-94 के सांप्रदायिक दंगों में भी गाय और कुर्बानी का मुद्दा प्रमुख कारणों में गिना गया.

गांधी, नेहरू, आंबेडकर और सावरकर की अलग-अलग दृष्टि

महात्मा गांधी ने गौसेवा को महत्व दिया और गोरक्षा को सामाजिक सद्भाव के साथ जोड़कर देखा. जवाहरलाल नेहरू गोवध पर राष्ट्रीय स्तर के प्रतिबंध के पक्ष में नहीं थे और इसे राज्यों का विषय मानते थे.

डॉ. भीमराव आंबेडकर, विनायक दामोदर सावरकर और अन्य विचारकों ने भी गाय तथा गोरक्षा के प्रश्न को अपने-अपने वैचारिक दृष्टिकोण से देखा. इसी कारण यह विषय केवल धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक और वैचारिक बहस का हिस्सा भी बन गया.

आजाद भारत में गोरक्षा की राजनीति

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संविधान सभा में गोवध प्रतिबंध और गोरक्षा पर लंबी बहस हुई थी. अंततः संविधान के अनुच्छेद 48 में राज्यों को दुधारू और कृषि उपयोगी पशुओं के संरक्षण और संवर्धन का निर्देश दिया गया.

1966 में संसद के बाहर पूर्ण गोवध प्रतिबंध की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ. बाद के दशकों में विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों ने इस मुद्दे को अलग-अलग रूपों में उठाया.

1971 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस का चुनाव चिन्ह 'गाय और बछड़ा' था. वहीं 2014 के बाद भाजपा ने गोतस्करी, अवैध बूचड़खानों और 'पिंक रिवोल्यूशन' जैसे मुद्दों को प्रमुख राजनीतिक विषय बनाया.

काऊ बेल्ट और चुनावी गणित

उत्तर भारत का विशाल हिंदी भाषी क्षेत्र अक्सर 'काऊ बेल्ट' के नाम से जाना जाता है. राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में मतदाता और लोकसभा सीटें हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गाय से जुड़े मुद्दे इस क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. इसलिए चुनावों के दौरान यह विषय बार-बार चर्चा में आता है.

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गाय की मौत पर जिंदा एक बड़ी अर्थव्यवस्था

गाय केवल धार्मिक या राजनीतिक विषय नहीं है. उससे जुड़ी एक बड़ी आर्थिक श्रृंखला भी मौजूद है. चमड़ा उद्योग, डेयरी उद्योग, जैविक खाद, औद्योगिक उत्पाद, औषधियां और कई अन्य क्षेत्रों में पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था की भूमिका है.

दूसरी ओर आवारा गोवंश, गोशालाओं का प्रबंधन, किसानों की समस्याएं और पशु संरक्षण की चुनौतियां भी वास्तविक मुद्दे हैं, जिन पर अक्सर कम चर्चा होती है.

आखिर क्यों कहा जाता है कि गाय वोट देती है?

गाय मतदान नहीं करती, लेकिन उससे जुड़ी भावनाएं, पहचान, धार्मिक मान्यताएं और राजनीतिक संदेश मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं. यही कारण है कि भारतीय राजनीति में गाय एक ऐसे प्रतीक के रूप में मौजूद है, जो धर्म, संस्कृति, इतिहास, अर्थव्यवस्था और चुनाव, सभी को एक साथ जोड़ देता है.

शायद यही वजह है कि भारतीय राजनीति में यह कहावत बार-बार सुनाई देती है- गाय दूध भी देती है, बहस भी पैदा करती है और राजनीति में वोट भी दिलाती है.