ओटीटी की धुरंधर बनी ये सीरीज, संजय मिश्रा, टीनू आनंद, दिव्या दत्ता ने दिखाया दम, रणवीर की फिल्म छोड़ लोग भागे इसके पीछे

दिव्या दत्ता की यह सीरीज एक ऐसे मुद्दे को सामने लाती है, जिस पर अक्सर घरों के अंदर ही पर्दा डाल दिया जाता है. कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे रिश्तों की हकीकत कुछ और ही होती है.

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ओटीटी पर आई वेब सीरीज चिरैया सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसी बहस बनकर सामने आई है, जिसने दर्शकों को दो हिस्सों में बांट दिया है. एक तरफ इसे जरूरी और साहसी कहानी बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे लेकर असहज और चिढ़े हुए नजर आ रहे हैं. दिव्या दत्ता की यह सीरीज एक ऐसे मुद्दे को सामने लाती है, जिस पर अक्सर घरों के अंदर ही पर्दा डाल दिया जाता है. कहानी एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे रिश्तों की हकीकत कुछ और ही होती है.

सेंसिटिव मुद्दा और बंटी हुई राय 

सीरीज का फोकस मैरिटल रेप और रिश्तों में कंसेंट जैसे सेंसिटिव मुद्दों पर है. यही वजह है कि यह दर्शकों को असहज करती है और सोचने पर मजबूर करती है. कई लोग इसे जरूरी आईना बता रहे हैं, वहीं कुछ लोग इस पर सवाल भी उठा रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस सीरीज के कुछ सीन सोशल मीडिया पर मीम्स का हिस्सा बन गए हैं. कुछ यूजर्स इसे हल्के में लेते नजर आए, जबकि कई लोगों ने इस पर तीखे कमेंट्स किए. यह भी दिखाता है कि समाज में ऐसे मुद्दों को लेकर सोच अभी भी कितनी बंटी हुई है.

कहानी में ये कमियां भी आईं सामने

सीरीज अपने अहम मुद्दे के बावजूद कुछ जगहों पर कमजोर भी पड़ती नजर आती है. सबसे बड़ी कमी इसकी कहानी कहने के तरीके में दिखती है, जो कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा समझाने वाली लगती है और नैचुरल फ्लो टूट जाता है. इसके अलावा कहानी की रफ्तार भी एक जैसी नहीं रहती, कुछ हिस्से बेवजह खिंचे हुए लगते हैं, जिससे असर थोड़ा कम हो जाता है. सीरीज की आलोचना इस प्वाइंट पर भी हो रही है कि पुरुष किरदारों को एक ही नजरिए से दिखाया गया है, जिससे कहानी थोड़ा एकतरफा लगती है. वहीं इतना गंभीर मुद्दा होने के बावजूद कई जगह इसे गहराई से दिखाने की बजाय बस छूकर आगे बढ़ जाने का एहसास होता है.

परिवार और परंपरा के नाम पर छिपी सच्चाई

हालांकि, सीरीज सिर्फ मुद्दा उठाने तक सीमित नहीं है. इसमें ये भी दिखाया गया है कि कैसे सालों से चली आ रही सोच और पारिवारिक ढांचा कई बार गलत चीजों को भी सामान्य बना देता है. कहानी में दिखाया गया है कि किस तरह महिलाएं खुद भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती हैं, जिसे बदलने की जरूरत है. चिरैया की कहानी भले ही हर किसी को पसंद न आए, लेकिन यह उन सवालों को जरूर सामने लाती है, जिनसे अक्सर लोग बचते हैं. शायद यही वजह है कि यह सीरीज सिर्फ देखी नहीं जा रही, बल्कि इस पर बहस भी हो रही है.

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