Indian Army Officer Academic Course: सेना में अफसर बनने के लिए हर साल लाखों स्टूडेंट्स NDA और CDS जैसे एग्जाम में शामिल होते हैं. सेलेक्शन के बाद उन्हें खास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है और 3 साल तक की पढ़ाई करनी होती है. हालांकि, अब नियम बदल दिया गया है. ग्रेजुएट जवानों के लिए 3 साल की पढ़ाई की जरूरत खत्म कर दी गई है. नए नियम से कम समय में कमांड और ऑपरेशनल ट्रेनिंग देकर जवानों को तेजी से अफसर बनाना है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सेना में अफसर बनने से पहले तीन साल तक क्या और क्यों पढ़ाया जाता है. इसमें क्या-क्या सिखाया जाता है. ये कोर्स कहां होता है, इसकी परीक्षा कैसे होती है, ट्रेनिंग का पार्ट कितना होता है और नए नियम क्या हैं. इस आर्टिकल में आइए जानते हैं एक-एक डिटेल्स.
सेना में अफसर बनने को लेकर नया नियम क्या है
हाल ही में सेना ने एक बड़ा बदलाव किया है, जिसका सीधा फायदा उन जवानों को मिलेगा जो पहले से फोर्स में हैं. पहले आर्मी कैडेट कॉलेज (ACC) एंट्री के जरिए ऑफिसर बनने में करीब 4 साल लगते थे. तीन साल पढ़ाई और एक साल ट्रेनिंग में समय जाता था. अब नए नियम के तहत जो जवान पहले से ग्रेजुएट हैं, उन्हें 3 साल की पढ़ाई नहीं करनी होगी. वे सीधे ट्रेनिंग फेज में जाएंगे और करीब 1.5 साल में ऑफिसर बन सकते हैं.
3 साल की पढ़ाई कहां होती है?
अगर आप 12वीं के बाद ऑफिसर बनना चाहते हैं, तो आपको पुणे के खड़कवासला के नेशनल डिफेंस अकादमी (NDA) जाना होता है. ये एक खास जगह है, जहां आर्मी, नेवी और एयरफोर्स तीनों के कैडेट्स साथ में ट्रेनिंग लेते हैं. यहां का माहौल किसी सामान्य कॉलेज जैसा नहीं होता है. सुबह जल्दी उठना, फिक्स टाइम पर हर काम करना और दिनभर सख्त रूटीन फॉलो करना, मतलब यहां की लाइफ पूरी तरह डिसिप्लिन वाली है.
3 साल तक क्या पढ़ाया जाता है?
1. अकादमिक डिग्री
कैडेट्स को उनकी स्ट्रीम के आधार पर साइंस (B.Sc.), आर्ट्स (B.A.) या कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कराई जाती है. 3 साल सफल होने पर उन्हें JNU (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) की डिग्री मिलती है.
मिलिट्री हिस्ट्री और स्ट्रैटेजी
कैडेट्स को दुनियाभर के ऐतिहासिक युद्धों, महान सेनापतियों की चालों और भारत की सुरक्षा चुनौतियों के बारे में गहराई से पढ़ाया जाता है, ताकि किसी भी कंडीशन के लिए वे पूरी तरह तैयार हो सकें और तेजी से सही फैसले ले सकें.
विदेशी भाषाएं, साइंस और टेक्नोलॉजी
एक ऑफिसर को ग्लोबल एक्सपोजर देने के लिए अक्सर विदेशी भाषाओं की बेसिक नॉलेज भी दी जाती है. आधुनिक हथियार प्रणाली, रडार और कम्युनिकेशन डिवाइसेस को समझने के लिए उन्हें एडवांस फिजिक्स और मैथ्स का व्यावहारिक इस्तेमाल सिखाया जाता है.
परीक्षा कैसे होती है
यहां का एग्जाम सिस्टम किसी सामान्य कॉलेज जैसी नहीं होती है. यहां का मूल्यांकन बहुत सख्त होता है. पूरे 3 साल की पढ़ाई को 6 सेमेस्टर में बांटा गया है. हर सेमेस्टर के अंत में वैसी ही लिखित परीक्षाएं होती हैं जैसी यूनिवर्सिटीज में होती हैं और इन्हें पास करना अनिवार्य है. यहां कैडेट का रिपोर्ट कार्ड सिर्फ अंकों पर नहीं बनता, बल्कि उसके अनुशासन, समय की पाबंदी, टीम वर्क और 'ऑफिसर लाइक क्वालिटी' (OLQ) के आधार पर उसे लगातार ग्रेड दिए जाते हैं. किताबी ज्ञान को जमीन पर परखने के लिए 'मैप रीडिंग' और 'सैंड मॉडल' प्रैक्टिस कराए जाते हैं, जहां कैडेट्स को काल्पनिक युद्ध स्थितियों में फैसले लेने होते हैं.
ट्रेनिंग का पार्ट कितना होता है
NDA के 3 साल में पढ़ाई और ट्रेनिंग साथ-साथ चलती है. यानी हर दिन का बड़ा हिस्सा ट्रेनिंग का ही होता है. इन तीन सालों में बौद्धिक और शारीरिक विकास के बीच बैलेंस बनाया जाता है. इसमें पढ़ाई और ग्राउंड ट्रेनिंग का अनुपात लगभग 60:40 का रहता है. सुबह की शुरुआत कड़क अनुशासन वाली ड्रिल और फिजिकल एक्सरसाइज से होती है, जिसके बाद कैडेट्स अपनी क्लासरूम में जाते हैं.
दोपहर के बाद का समय खेल-कूद, घुड़सवारी, स्विमिंग और अन्य साहसिक गतिविधियों के लिए सुरक्षित रहता है. इन तीन सालों को 'बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग' कहा जाता है. असली कमीशन ट्रेनिंग इसके बाद शुरू होती है, जब वे देहरादून IMA में अपना आखिरी साल बिताते हैं. यहां 1 साल मिलिट्री फोकस्ड ट्रेनिंग दी जाती है. असली जंग जैसे हालातों में कैडेट्स को तैयार किया जाता है. आखिर में पासिंग आउट परेड होती है, जहां कैडेट्स को आधिकारिक तौर पर आर्मी ऑफिसर बनाया जाता है.