सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के निलंबन के बाद से यूपी का माहौल गर्माया हुआ है. अलंकार अग्निहोत्री यूजीसी के नए बिल और शंकराचार्य के साथ हुए बर्ताव के खिलाफ नाराजगी जता चुके हैं. विरोध जताने के लिए एक पोस्टर भी लेकर खड़े रहे. ऐसा करने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. अब इसके जवाब में यूपी के जीएसटी डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने भी इस्तीफा दिया है, उन्होंने कहा कि ये इस्तीफा सीएम योगी के समर्थन में दिया गया है. पहले इस्तीफा देने वाले IAS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री को यूपी सरकार ने निलंबित भी कर दिया है. ऐसे में सवाल है कि आखिर किसी सिविल सर्वेंट को निलंबित कैसे किया जा सकता है.
असल में सिविल सर्वेंट सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि संविधान के तहत मिली जिम्मेदारी निभाते हैं. उनसे उम्मीद की जाती है कि वो पर्सनल थॉट्स और सार्वजनिक आचरण के बीच बैलेंस बनाए रखें. इसलिए जब भी कोई अधिकारी सार्वजनिक मंचों, सोशल मीडिया या विरोध प्रदर्शनों में खुलकर अपनी राय रखते हैं. तब सवाल उठता है कि क्या ये नियमों के दायरे में है?
सिविल सेवा के कौन से प्रोटोकॉल के तहत निलंबन होता है?
सिविल सर्वेंट को निलंबित करने का अधिकार सरकार के पास होता है. लेकिन ये मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता.
आमतौर पर निलंबन तब किया जाता है जब
• अधिकारी पर गंभीर अनुशासनहीनता का आरोप हो
• जांच के दौरान पद पर बने रहने से निष्पक्ष जांच प्रभावित हो सकती हो
• सरकारी नियमों का खुला उल्लंघन हुआ हो
निलंबन का मतलब ये नहीं कि अधिकारी दोषी साबित हो गया है. ये एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था होती है. ताकि जांच शांतिपूर्वक और निष्पक्ष तरीके से हो सके.
सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन और सरकारी नीतियों के खुले विरोध पर क्या कहते हैं नियम?
अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों से हमेशा ही पॉलिटिकल न्यूट्रलिटी की उम्मीद की जाती है.
नियमों के अनुसार सिविल सर्वेंट -
• किसी राजनीतिक आंदोलन या विरोध प्रदर्शन में भाग नहीं ले सकते
• सरकार की नीतियों का खुले रूप में या सार्वजनिक रूप से विरोध नहीं कर सकते
• सोशल मीडिया, स्पीच या लेखों के जरिए सरकार की आलोचना से बचना होता है
अगर किसी अधिकारी को किसी नीति से आपत्ति है या असहमति है. तो उसे जताने के लिए इंटरनल और आधिकारिक चैनल मौजूद होते हैं. उसके लिए वो सड़क या सार्वजनिक मंच का सहारा नहीं ले सकते.
आचार संहिता के किन नियमों का पालन सबसे जरूरी है?
सिविल सर्वेंट्स के लिए कुछ बेसिक रूल्स तय हैं. जिसके तहत उन्हें आचरण करना होता है.
• गरिमा और मर्यादा बनाए रखना
• पर्सनल विचारों को ऑफिशियल भूमिका से अलग रखना
• मीडिया और सोशल मीडिया पर बोलते हुए संयम बरतना
• सरकारी गोपनीय जानकारी साझा न करना
सरल शब्दों मे समझें तो ड्यूटी के दौरान ही नहीं बल्कि उन्हें पर्सनल लाइफ में भी ऐसा बिहेव करना होता है. जिससे सरकारी पद और ड्यूटी की निष्पक्षता पर सवाल न उठे.
अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम, 1968 क्या कहते हैं?
• Rule 3: ईमानदारी, निष्ठा और अनुशासन
• Rule 5: राजनीतिक गतिविधियों से दूरी
• Rule 7: मीडिया से बिना अनुमति संवाद पर रोक
• Rule 9: सरकार की आलोचना से परहेज
ये नियम सिविल सेवा की निष्पक्षता और जनता के भरोसे की रक्षा करते हैं. इसके तहत सस्पेंशन भी किसी सजा से ज्यादा एक प्रशासनिक कदम होता है. जो तय प्रोटोकॉल के तहत लिया जाता है. अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम, 1968 इसी संतुलन को बनाए रखने की रीढ़ माना जाता है.
सिविल सेवकों की जॉब सिक्योरिटी
अक्सर माना जाता है कि सिविल सेवकों की नौकरी पूरी तरह सुरक्षित होती है. लेकिन इसमें कुछ शर्तें भी लागू होती हैं. जो उनकी जवाबदेही भी तय करती हैं और उनके जॉब को सिक्योर भी रखती हैं.
जॉब सिक्योरिटी के लिए नियम -
• बिना जांच के बर्खास्तगी नहीं
• अनुच्छेद 311 के तहत सुनवाई का अधिकार
• निलंबन के दौरान भी जीवन निर्वाह भत्ता
जवाबदेही के लिए नियम -
• नियम तोड़ने पर कार्रवाई तय
• आचरण नियम सभी पर समान रूप से लागू
यानी सिस्टम सिविल सर्वेंट को जॉब सिक्योरिटी भी देता है. लेकिन डिसिप्लीन फॉलो करने की शर्तों के साथ. जिसके न होने पर कार्रवाई से भी गुजरना पड़ सकता है.
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