चॉल में गुजारे अंतिम दिन, खाने के पैसे तक नहीं थे पास, 103वीं वर्षगांठ पर 'टुनटुन' को जैकी श्राफ ने किया याद!

बॉलीवुड की पहली महिला कॉमेडियन उमा देवी खत्री उर्फ 'टुनटुन' 24 नवंबर, 2003 में इस दुनिया को अलविदा कहा. लोगों को हंसाने वाली टुनटुन अपने गुरबत के दिनों में मुंबई के एक चाल में रह रही थी... आज उनकी 103वीं वर्ष गांठ है.

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हिंदी सिनेमा की पहली कॉमेडियन टुनटुन
Uma devi khatri aka Tuntun 103rd birth Anniversary

Uma Devi Khatri Aka Tuntun: 50 के दशक की अभिनेत्री उमा देवी खत्री उर्फ 'टुनटुन का आज 103वां जन्म वर्षगांठ है. 150 से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुकी टुनटुन को यह नेम ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार ने दिया था. साल 2003 में दुनिया को अलविदा कह चुकी टुनटुन करीब 5 दशक तक लोगों के होठों पर अपनी अदायगी से मुस्कान बिखेरती रहीं, लेकिन जीवन का अंतिम पड़ाव उनका बहुत ही गरीबी में गुजारा.

जीवन के अंतिम पड़ाव में एक चाल में जिंदगी बिताने को मजबूर हुईं उमा देवी खत्री उर्फ टुनटुन के पास खाने के पैसे तक नहीं हुआ करते थे. 80 वर्ष की उम्र में दुनिया से विदा कहने वाली टुनटुन को उनके 103वें जन्मदिन पर आज अभिनेता जैकी श्राप ने याद किया. सोशल मीडिया पर टुनटुन की एक तस्वीर को शेयर करते हुए जैकी श्राप ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, 'उमा देवी खत्री (टुनटुन जी) हमेशा हमारे दिलों में रहेंगी.' 

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मुंबई प्लेबैक सिंगर बनने आई थीं टुनटुन

करियर के अंतिम दिनों में गरीबी में दिन गुजारने वाली कॉमेडियन टुनटुन ने एक प्लेबैक सिंगर के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी. उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से मुंबई प्लेबैक सिंगर बनने पहुंची टुनटुन को संगीतकार नौशाद ने हिंदी सिनेमा में प्लेबैक सिंगिग का मौका दिया. टुनटुन के गले से निकला वो मशहूर गाना आज भी जुबान पर चढ़ जाता है. गाना था 'अफसाना लिख रही हूं दिल-ए-बेकरार का' यह गाना तब चार्टबस्टर हो गया था. दिलचस्प बात यह है कि इस गाने को गाने का मौका देने के लिए टुनटुन को नौशाद को धमकी तक देनी पड़ी थी, जिसके बाद उन्हें यह गाना मिला था. साल 1947 में रिलीज हुई फिल्म 'दर्द' में पिरोए इस गाने ने टुनटुन को खूब शोहरत दिलाई.

इसलिए सिंगिग छोड़ कॉमेडियन बन गई

फिल्मों में प्लेबैक सिंगिग का मौका देने वाले संगीतकार नौशाद की सलाह पर टुनटुन ने सिंगिग छोड़ फिल्मों में कॉमेडियन बनी. यहां भी टुनटुन ने नौशाद के सामने एक शर्त रख दी. टुनटुन ने नौशाद से कहा कि, 'अगर दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला, तो वो फिल्मों में एक्टिग के बारे में सोचेंगी'.कहते हैं बढ़ती काया और प्लेबैक सिंगिग में घटते मौकों ने टुनटुन को रुपहले पर्दे तक पहुंचाया. साल 1950 में संगीतकार नौशाद के रसूख पर टुनटुन ने फिल्म 'बाबूल' से सिनेमा में डेब्यू किया. शर्त के मुताबिक उनके को-एक्टर दिलीप कुमार थे. मजे की बात यह है कि डेब्यू फिल्म में ही उमा देवी खत्री को टुनटुन की उपाधि मिली. यह उपाधि दिलीप कुमार ने उनकी चुलबुली हरकतों और काया को देखकर दिया था. 

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150 से अधिक फिल्मों से लोगों के चेहरे पर बिखेरा मुस्कान
Photo Credit: Screengrab

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पहली बार महिला कॉमेडियन को काम मिला

फिल्म 'बाबूल' से फिल्मी पर्दे डेब्यू करते ही टुनटुन की चल पड़ी. कई दशकों तक टुनटुन महिला कॉमेडियन के रूप में काम किया और अपने अभिनय से सबको चौंकाती रहीं. यह पहला मौका था जब भारतीय सिनेमा में किसी महिला कॉमेडियन को काम मिला था. टुनटुन से पहले तक सिर्फ पुरुष ही कॉमेडियन हुआ करते थे. पुरुष को ध्यान में रखकर ही हास्य वाले किरदार गढ़ जाते थे. टुनटुन ने न केवल इस परंपरा को तोड़ा, बल्कि एक कॉमेडियन के रूप में खुद को साबित किया. बतौर कॉमेडिन उन्होंने 150 से अधिक फिल्मों में काम किया. इनमें 'मिस्टर एंड मिसेज 55', 'प्यासा', 'मुजरिम', 'कोहिनूर', 'हाफ टिकट', 'दिल अपना और प्रीत पराई', 'आया सावन झूम के' और 'आंखें' प्रमुख हैं.

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'कसम धंधे की' थी टुनटुन की आखिरी फिल्म

जबर्दस्त कॉमिक टाइमिंग और एक्टिंग से दर्शकों को अपना मुरीद बनाने वाली टुनटुन ने करीब 50 सालों तक दर्शकों का मनोरंजन किया और अपने सहज हास्य से उन्हें गुदगुदाती रहीं. वह समय भी आया जब बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ्य के चलते टुनटुन फिल्मों से दूर हो गईं. एक इंटरव्यू में टुनटुन ने बताया कि इंडस्ट्री को अपना सब कुछ देने के बाद उनके पास खाने तक के लिए पैसे नहीं बचे. मुंबई के एक चॉल में अंतिम दिन गुजारते हुए साल 2003 में दुनिया को अलविदा कहने वाली टुनटुन की आखिरी फिल्म 'कसम धंधे की' थी, जो साल 1990 में रिलीज हुई थीं. टुनटुन अपने पीछे 4 चार संतानों को छोड़ गईं थी. दो बेटे और दो बेटी. टुनटुन की शादी एक सरकारी अधिकारी से हुई थी, जिन्हें वो मोहन कहकर पुकारती थी. 

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