आज एक्टर्स को काम मैनेजर्स की वजह से नहीं बल्कि एक्टर्स की वजह से मिलता है - तुषार कपूर

हाल ही में फिल्म 'वेलकम टू जंगल' में नजर आए अभिनेता तुषार कपूर ने एक इंटरव्यू के दौरान बॉलीवुड में 'मैनेजर्स' की भूमिका और उनके बदलते रवैये पर खुलकर बात की.

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तुषार कपूर ने कहा आज एक्टर्स के मैनेजर्स हावी हो गए है
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हाल ही में फिल्म 'वेलकम टू जंगल' में नजर आए अभिनेता तुषार कपूर ने एक इंटरव्यू के दौरान बॉलीवुड में 'मैनेजर्स' की भूमिका और उनके बदलते रवैये पर खुलकर बात की. फिल्म में खुद एक मैनेजर का किरदार निभाने वाले तुषार ने इंडस्ट्री के पर्दे के पीछे की सच्चाई साझा की.

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मैनेजर का असली 'मेंटल मेकअप'

जब तुषार से पूछा गया कि एक मैनेजर की प्राथमिकता क्या होती है, तो उन्होंने कहा, "हर मैनेजर, चाहे वो कितना भी सोफिस्टिकेटेड क्यों न हो जाए, उसके मन में यह ख्याल तो आता ही है कि प्रोड्यूसर खुश होना चाहिए. प्रोड्यूसर नाराज होकर वापस नहीं जाना चाहिए और मेरा एक्टर हमेशा बिजी रहना चाहिए. तो यह जनरल मतलब की एक मेंटल मेकअप जो होता है मैनेजर का, वो ही है." तुषार ने बताया कि उन्होंने फिल्म में एक 'डिसेंट' मैनेजर का रोल निभाया है, न कि ऐसा जो काम पाने के लिए किसी भी हद तक गिर जाए.

क्या मैनेजर एक्टर्स पर हावी हो गए हैं?

आजकल यह चर्चा आम है कि कई बार मैनेजर्स के दखल के कारण एक्टर्स तक अच्छी स्क्रिप्ट्स पहुंच ही नहीं पातीं. इस पर तुषार का कहना है कि बदलाव निश्चित रूप से आया है. उन्होंने बताया, "आजकल के मैनेजर्स हावी पड़ जाते हैं, लेकिन उनका रोल इतना महत्वपूर्ण नहीं होता है आज जितना कि पहले होता था. पहले तो एक्टर को काम मैनेजर की वजह से ही मिलता था. मैनेजर जाते थे एक डेट डायरी लेकर और उसे भर के लेकर आते थे. बहुत ही कमजोर से कमजोर एक्टर भी 8-9 फिल्में साइन कर लेता था क्योंकि मैनेजर चतुर होते थे. अभी मैनेजर भाव ज्यादा खाते हैं, लेकिन काम एक्टर को उसकी अपनी वजह से मिलता है." तुषार के अनुसार, आज के दौर में एक्टर की पिछली फिल्म का प्रदर्शन और दर्शकों के बीच उनका क्रेज ज्यादा मायने रखता है.

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स्क्रिप्ट और मैनेजर के बीच का तालमेल

मैनेजर द्वारा स्क्रिप्ट रिजेक्ट करने के बहाने पर बात करते हुए तुषार ने एक महत्वपूर्ण सलाह दी. उन्होंने कहा, "मैनेजर की जिम्मेदारी है कि वो उस गैप को ब्रिज करे और पर्सनली इंटरेस्ट ले कि क्या स्क्रिप्ट्स आ रही हैं. मैं खुद पढ़ लेता हूं, अगर मना करना हो तो मैनेजर को आगे रख लो. लेकिन बाकी सब आपको फॉरवर्ड हो जानी चाहिए. मना करना है तो 'डेट नहीं है'—यह बहाना होता है. एक्टर को मना करना पड़ता है, लेकिन वो मैनेजर बहाना बन जाता है. यह ठीक है, लेकिन जो चीज एक्टर तक पहुंचती ही नहीं, यह सही नहीं है."

एक पुराना किस्सा: 'बॉम्बेस्टिक' मैनेजर

इंटरव्यू के दौरान तुषार ने अपने एक पुराने मैनेजर का मजेदार किस्सा भी साझा किया. उन्होंने याद करते हुए कहा, "मेरा एक मैनेजर होता था जो सेट पर आता था तो सबको अपनी घड़ी और बॉडी दिखाता था. वह बहुत एग्रेसिव था. अगर मेरी पिक्चर चल गई तो वह कहता था, 'अब अगली पिक्चर में तो इतना पैसा लूंगा, इतना पैसा लूंगा.' वह इतना 'बॉम्बेस्टिक' था कि लोग सेट पर हंसने लगते थे. वह एक 'कैरेक्टर' बन गया था."

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क्या अब 'गो-गेटर्स' की कमी है?

अंत में, तुषार ने आधुनिक कॉर्पोरेट कल्चर और एक्टर्स की घटती 'शेल्फ लाइफ' पर चिंता जताई. उन्होंने कहा, "बहुत ज्यादा कॉर्पोरेटाइजेशन, बहुत ज्यादा कोल्डनेस और दूरी आ गई है. इसीलिए नए एक्टर्स की शेल्फ लाइफ कम होती जा रही है क्योंकि ये मैनेजर्स बहुत स्नूटी (अहंकारी) हो गए हैं. पापा के जमाने के मैनेजर्स 'गो-गेटर्स' होते थे जो हमेशा सही सलाह देते थे."

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