71 साल पुरानी सुपरहिट फिल्म को बनाने के लिए डायरेक्टर ने गिरवी रखी जीवन बीमा पॉलिसी, दोस्तों से उधार लिए थे पैसे 

Satyajit Ray : 'पाथेर पांचाली' बनाने के लिए प्रोड्यूसर्स के पास सत्यजीत रे नोटबुक लेकर जाते थे, जिसमें फिल्म के दृश्यों के स्केच बने थे. यहां तक कि फिल्म को प्रोड्यूस करने के लिए उन्होंने जीवन बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी थी. 

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दोस्तों से इस डायरेक्टर को फिल्म बनाने के लिए लेना पड़ा था उधार
नई दिल्ली:

भारतीय सिनेमा जगत के चमकते सितारे का नाम है सत्यजीत रे... हालांकि, इस चमक के पीछे संघर्ष भी कम नहीं रहा. उनकी पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' आज भी विश्व सिनेमा में एक मील का पत्थर मानी जाती है लेकिन इस क्लासिक फिल्म को बनाने के पीछे सत्यजीत रे को आर्थिक संघर्ष करना पड़ा था. प्रोड्यूसर्स को मनाने के लिए वे अपने साथ एक नोटबुक लेकर जाते थे, जिसमें फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्यों के खूबसूरत रेखाचित्र बने होते थे. जब कोई प्रोड्यूसर तैयार नहीं हुआ तो निराश होकर उन्होंने अपनी जीवन बीमा पॉलिसी तक गिरवी रख दी.

13 साल तक सत्यजीत रे ने की नौकरी

सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कोलकाता के एक सांस्कृतिक परिवार में हुआ था. बचपन से ही उन्हें फिल्मों, वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक और पेंटिंग का शौक था. मां के कहने पर वे 1940 में शांतिनिकेतन गए और चित्रकला सीखी. 1942 में वे घर लौट आए और 1943 में डीजे कीमर नामक विज्ञापन एजेंसी में जूनियर विजुअलाइजर के रूप में काम शुरू किया. वहां उन्होंने 13 साल तक नौकरी की.

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जीवन बीमा पॉलिसी रखी गिरवी

इसी दौरान सत्यजीत रे ने शौकिया तौर पर पटकथाएं लिखना शुरू किया. लंदन दौरे के दौरान उन्होंने विट्टोरियो दे सिका की फिल्म 'बाइसिकल थीफ' देखी, जिसने उन पर गहरा असर डाला. उन्होंने फैसला कर लिया कि वे यथार्थवादी फिल्म बनाएंगे. उन्होंने विभूति भूषण बंदोपाध्याय की प्रसिद्ध किताब 'पाथेर पांचाली' के अधिकार खरीद लिए. फिल्म बनाने के लिए फाइनेंसर की तलाश में सत्यजीत रे दो साल तक भटकते रहे. प्रोड्यूसर्स को समझाने के लिए वे अपनी नोटबुक दिखाते, जिसमें फिल्म के दृश्यों के स्केच बने थे, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ. आखिरकार उन्होंने अपनी जीवन बीमा पॉलिसी गिरवी रख दी. कुछ पैसे मित्रों और रिश्तेदारों से उधार लिए. 

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बॉक्स ऑफिस पर सफल रही सत्यजीत रे की पाथेर पंचाली

27 अक्टूबर 1952 को रविवार की छुट्टी के दिन उन्होंने फिल्म का पहला दृश्य शूट किया. यह दृश्य था जिसमें अपू और दुर्गा काश के खेत में भागते हुए रेलगाड़ी देखने जाते हैं. फिल्म की शूटिंग कई बार रुक गई, क्योंकि पैसे खत्म हो जाते थे. अपू की भूमिका के लिए सत्यजीत रे ने अखबारों में विज्ञापन दिया. सैकड़ों बच्चों ने ऑडिशन दिया, लेकिन आखिरकार दक्षिण कोलकाता में बिजोया नाम के लड़के को देखकर उन्होंने तय कर लिया कि यही उनका अपू है. बहुत मुश्किलों के बाद 'पाथेर पांचाली' 26 अगस्त 1955 को कोलकाता में रिलीज हुई. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और 1956 में कान्स फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल जूरी अवॉर्ड (बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट) जीता.

1981 तक बनाई हर फिल्म

इस सफलता ने सत्यजीत रे को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई. 'पाथेर पांचाली', 'अपराजितो' और 'अपुर संसार' को अपू त्रयी के नाम से जाना जाता है. इन फिल्मों में सत्यजीत रे ने गरीबी, भूख, सामाजिक अन्याय और नारी की पीड़ा जैसे मुद्दों को यथार्थवादी तरीके से दिखाया. उनकी फिल्मों में मुंबई के व्यावसायिक सिनेमा की चमक-दमक नहीं थी, बल्कि आम भारतीय जीवन की सच्ची तस्वीर थी. सत्यजीत रे ने 1981 तक लगभग हर साल एक फिल्म बनाई. उनकी प्रमुख फिल्मों में 'परश पाथर', 'देवी', 'चारुलता', 'महानगर', 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'घरे बाइरे' शामिल है. 1992 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए ऑस्कर पुरस्कार और भारत रत्न से सम्मानित किया गया. सत्यजीत रे का सिनेमा सरोकारों का सिनेमा था. 

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(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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