शर्मिला टैगोर के पति ने एक हादसे में खो दी थी अपनी एक आंख, कांच के टुकड़े ने किया बर्बाद लेकिन हारे नहीं पटौदी

सैफ अली खान ने हाल में एक प्रोग्राम में बात करते हुए पिता के बारे में कई बातें शेयर कीं. उनके बारे में ये चीजें बताती हैं कि वे अपने इरादों और लगन के कितने पक्के इंसान थे.

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मंसूर अली खान पटौदी ने 2011 में दुनिया को अलविदा कहा
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नई दिल्ली:

सैफ अली खान ने हाल ही में कोलकाता में 'टाइगर पटौदी मेमोरियल लेक्चर 2026' के दौरान अपने पिता, मंसूर अली खान पटौदी - जिन्हें 'टाइगर पटौदी' के नाम से जाना जाता है - को याद किया. उन्होंने उस समय के बारे में बात की जब इस महान क्रिकेटर ने अपनी एक आंख खो दी थी और इसे खेल के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों और सबसे शानदार वापसी में से एक बताया. सैफ अली खान ने कहा, "मेरे पिता ने अपनी आंख ठीक उस समय खो दी थी जब वे अपने करियर में परिपक्व हो रहे थे. मैं इस पर ज्यादा बात नहीं करना चाहता क्योंकि मैं उनके क्रिकेट के कई पहलुओं पर घंटों बोल सकता हूं, लेकिन उन्होंने अपनी आंख तब खोई थी जब वे कुछ सचमुच बहुत बड़ा हासिल करने की कगार पर थे. यह खेल के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है और सबसे शानदार वापसी में से भी एक."

आंख की रोशनी खत्म होने पर भी खेलने से रुके नहीं पटौदी

सैफ ने आगे बताया कि उनके पिता को शुरू में पता ही नहीं चला था कि उन्होंने अपनी एक आंख खो दी है. उन्हें लगा था कि यह 'कंधे की कोई चोट' है. सैफ ने कहा, "डॉक्टरों ने ऑपरेशन किया और कहा कि आपकी आंख में कांच का एक टुकड़ा फंस गया है. आपकी 99% रोशनी चली जाएगी. एक समय डॉक्टरों ने कहा कि अगर आप कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं तो आपकी 90% रोशनी वापस आ जाएगी, लेकिन इसके साथ तालमेल बैठाने में काफी समय लगेगा. इसलिए वे यूनिवर्सिटी से वापस आ गए, वे दिल्ली में थे और उन्हें इंग्लैंड से आई किसी मेहमान टीम के खिलाफ मैच खेलने के लिए बुलाया गया." 

उन्होंने बता कि पटौदी ने लेंस पहना और उन्हें सब ठीक लगा, बस एक मुश्किल ये थी कि उन्हें दो गेंदें दिखाई दे रही थीं जो एक-दूसरे से कुछ इंच की दूरी पर थीं. सैफ ने कहा,  "लंच से पहले उन्होंने 35 रन बनाए. फिर उन्होंने अपना लेंस उतार दिया, अपनी आंख को टोपी से ढक लिया और फिर 70 रन बनाए और उन्हें भारत के लिए खेलने के लिए चुन लिया गया".  सैफ ने बताया कि उन्हें अपने खेल का तरीका बदलना पड़ा. उन्होंने कभी भी इस बात को अपनी कोई 'कमजोरी' नहीं माना, न ही कभी इसे कोई 'मुसीबत' कहा. बस इसे एक ऐसी चीज माना जिसके साथ तालमेल बैठाना है, एक हकीकत. जो बात उन्हें सबसे अलग बनाती थी वो थी उनका 'धैर्य'".

ज्यादा बोलना पसंद नहीं करते थे पटौदी

सैफ ने याद करते हुए बताया कि टाइगर पटौदी घर पर अपने क्रिकेट से जुड़ी अचीवमेंट्स के बारे में बहुत कम बात करते थे. वे कम बोलने वाले इंसान थे, लेकिन अपनी अचीवमेंट्स को लेकर पूरी तरह से कॉम्फिडेंट थे. सैफ ने कहा,  "घर पर वह अपनी अचीवमेंट्स के बारे में शायद ही कभी बात करते थे. वह किसी भी चीज के बारे में शायद ही कभी बात करते थे. डिनर और लोगों के साथ होने वाली मुलाकातों में मेरी मां अक्सर परेशान हो जाती थीं, जब उनसे कम जानकारी रखने वाले लोग अपनी राय दे रहे होते थे. वह कहते थे कि मुझसे किसी ने पूछा ही नहीं, लेकिन वह बोलते भी नहीं थे, क्योंकि उनसे किसी ने पूछा ही नहीं था. यह एक बिल्कुल ही अलग तरह का सेल्फ कॉन्फिडेंस था."

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टाइगर पटौदी का सितंबर 2011 में नई दिल्ली में निधन हो गया. वहीं अगर सैफ अली खान के वर्कफ्रंट पर बात करें तो वह कर्तव्य को लेकर चर्चा में हैं. ये फिल्म नेटफ्लिक्स पर देखने के लिए अवेलेबल है.

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