शम्मी कपूर का जोश, बर्फ से ढके पहाड़ और मोहम्मद रफी की आवाज, हर दौर में गूंजता है 65 साल पुराने इस गीत का जादू

मोहम्मद रफी की जोशीली आवाज में सजा यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि शम्मी कपूर की पहचान बन गया था. 1961 में रिलीज हुआ यह गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे एनर्जेटिक और पसंदीदा गानों में गिना जाता है.

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शम्मी कपूर यह गाना आज भी है एवरग्रीन

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे गाने हैं, जिन्होंने सिर्फ फिल्म की सफलता में ही नहीं, बल्कि कलाकारों की पहचान बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाई. ऐसा ही एक गीत है ‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे, जो साल 1961 में रिलीज हुई फिल्म ‘जंगली' का हिस्सा था. छह दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी इस गाने का जोश और लोकप्रियता बरकरार है. जैसे ही 'Yahoo' की गूंज सुनाई देती है, लोगों के जेहन में शम्मी कपूर का बिंदास अंदाज और बर्फीली वादियों में फिल्माया गया वह यादगार दृश्य ताजा हो जाता है. यही वजह है कि यह गीत आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे आइकॉनिक गानों में गिना जाता है.

शम्मी कपूर की पहचान बन गया था 'याहू'

फिल्म ‘जंगली' में शम्मी कपूर और सायरा बानो की जोड़ी पहली बार बड़े पर्दे पर नजर आई थी. फिल्म की कहानी के साथ-साथ इसके गानों ने भी दर्शकों का दिल जीत लिया, लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रियता ‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे' को मिली. इस गाने में शम्मी कपूर की बेफिक्र बॉडी लैंग्वेज, खुलकर किया गया डांस और उनका जोशीला अंदाज दर्शकों को इतना पसंद आया कि 'याहू' उनकी पहचान बन गया. बाद के वर्षों में भी लोग शम्मी कपूर को इसी स्टाइल के लिए याद करते रहे.

मोहम्मद रफी की आवाज और शंकर-जयकिशन का शानदार संगीत

इस सदाबहार गीत को महान गायक मोहम्मद रफी ने अपनी दमदार आवाज दी थी. गाने के बोल मशहूर गीतकार शैलेन्द्र ने लिखे, जबकि इसका संगीत दिग्गज जोड़ी शंकर-जयकिशन ने तैयार किया. रफी साहब की गायकी और शंकर-जयकिशन की धुन ने इस गीत को ऐसा रंग दिया कि यह आज भी हर पीढ़ी को पसंद आता है. गाने की शुरुआत में सुनाई देने वाली 'Yahoo' की पुकार भारतीय फिल्म संगीत के सबसे यादगार सिग्नेचर मोमेंट्स में गिनी जाती है.

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आज भी हर पीढ़ी की पसंद है यह क्लासिक गीत

‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे' सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के गोल्डन एरा की पहचान बन चुका है. रेडियो से लेकर टीवी और आज के डिजिटल प्लेटफॉर्म तक, यह गीत लगातार सुना जाता है. रेट्रो म्यूजिक के शौकीनों की प्लेलिस्ट में इसकी खास जगह है. करीब 65 साल बाद भी इस गाने का जोश, इसकी धुन और शम्मी कपूर का अंदाज दर्शकों को उतना ही रोमांचित करता है, जितना रिलीज के समय किया था. यही वजह है कि यह गीत भारतीय सिनेमा के उन चुनिंदा क्लासिक्स में शामिल है, जिनका जादू समय के साथ कभी फीका नहीं पड़ा.

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