फिल्मी दुनिया में कई जोड़ियां आईं और गईं, लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो इतिहास बन जाते हैं. सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी भी ऐसी ही थी. 70 का दशक आज भी बॉलीवुड का गोल्डन एरा माना जाता है और इस दौर को सुनहरा बनाने में इस जोड़ी का बड़ा योगदान रहा. इन्होंने सिर्फ हिट फिल्में ही नहीं दीं. बल्कि ऐसे किरदार गढ़े जो आज भी याद किए जाते हैं. इस जोड़ी ने जितना सुनहरा वक्त बिताया उतना ही स्याह रहा इस जोड़ी का टूट जाना. चलिए जानते हैं कि कैसे उनकी शुरुआत हुई और कैसे ये साथ टूट गया.
कैसे हुई सलीम-जावेद की शुरुआत
सलीम खान और जावेद अख्तर की मुलाकात फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हुए हुई. कहा जाता है कि लेखक एस.एम. सागर ने दोनों को साथ काम करने का मौका दिया. शुरुआत में इत्तेफाक से दोनों ने कुछ प्रोजेक्ट साथ किए. उनकी सोच समझ इतनी मिलती थी कि उन्होंने स्थायी रूप से साथ काम करने का फैसला कर लिया.
असल पहचान उन्हें तब मिली जब राजेश खन्ना ने उनसे एक कमजोर कहानी को सुधारने की गुजारिश की. उस कहानी से बनी फिल्म हाथी मेरे साथी जबरदस्त हिट रही. इसके बाद जंजीर ने अमिताभ बच्चन की इमेज बदल दी और फिर दीवार, शोले, डॉन जैसी फिल्मों ने इतिहास रच दिया. इन फिल्मों ने अमिताभ को सुपरस्टार बनाया और सलीम-जावेद को इंडस्ट्री का सबसे भरोसेमंद लेखक.
आखिर क्यों टूटी इतनी सफल जोड़ी?
कहते हैं हर रिश्ते की एक परीक्षा होती है. 80 के दशक में दोनों ने एक ऐसी कहानी लिखी जिसमें हीरो अदृश्य हो जाता है और उसकी आवाज बैकग्राउंड में चलती है. वो चाहते थे कि अमिताभ बच्चन ये रोल करें, लेकिन अमिताभ ने मना कर दिया. अमिताभ का मानना था कि दर्शक उन्हें स्क्रीन पर देखना पसंद करते हैं. सिर्फ आवाज सुनना नहीं. अमिताभ के इनकार के बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए. जावेद अख्तर ने फैसला किया कि वो आगे अमिताभ के साथ काम नहीं करेंगे. जबकि सलीम खान इस बात से सहमत नहीं थे. यही मनमुटाव धीरे धीरे दूरी में बदल गया और जोड़ी टूट गई.