बॉलीवुड की सुपरस्टार रेखा को उमराव जान के नाम से जाना जाता है. 10 अक्टूबर को जन्मीं रेखा का असली नाम भानुरेखा गणेशन हैं, जिनकी पर्सनल और प्रॉफेशनल लाइफ चर्चा में रही है. उनकी जिंदगी से कई जुड़े रहस्य हैं, जिसमें यह भी एक बात है कि रेखा के पिता साउथ स्टार शिवाजी गणेशन और मां पुष्पावल्ली हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि 3 साल की उम्र से काम कर रहीं रेखा पति के निधन के बाद भी सिंदूर लगाती हैं. आइए आपको बताते हैं रेखा से जुड़ी बातें...
रेखा के पति की मौत
नाम कई मेल एक्टर्स के साथ जुड़ा. सीरियस रिलेशनशिप में भी रहीं लेकिन ऐन शादी की दहलीज पर आकर सपना टूट गया. लोगों ने इनकी परवरिश और खानदान को लेकर सवाल खड़े किए. 1990 में शादी भी की, दिल्ली के बिजनेसमैन मुकेश अग्रवाल से जो महज 8 महीनों में दर्दनाक अंजाम तक पहुंची. दिल्ली के इस कारोबारी ने डिप्रेशन में आत्महत्या कर ली. तब सास ने डायन तक कहा पर रेखा ने अपनी रेखा कभी पार नहीं की. अपने एक पुराने इंटरव्यू में तमाम इल्जाम पर चुप्पी साधने का राज भी खोला था. कहा था, मैं चुलबुली थी पर जब फिल्मी पत्रिकाएं अंट शंट छपने लगीं तो बात करना बंद कर दिया. मैं खुलकर बात करती थी लेकिन फिर 1975 से खुद को समेट लिया.
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रेखा ने बताया क्यों लगाती हैं सिंदूर
रेखा पर लिखी किताब ‘रेखा द अनटोल्ड स्टोरी' के मुताबिक मौका था राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का. रिवायतन राष्ट्रपति सबको सम्मानित करते हैं. रेखा को 1981 की कल्ट फिल्म उमराव जान के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिल रहा था. स्टेज पर पहुंची. तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीवा रेड्डी ने पूछा, ‘आप मांग में सिंदूर क्यों भरती हैं?' रेखा ने जवाब दिया था, ‘मैं जिस शहर से आती हूं, वहां मांग में सिंदूर भरना आम बात है...फैशन है!'
3 साल की उम्र से रेखा कर रही हैं काम
3 साल की थीं तब से फिल्मों में काम कर रही हैं. 1969 में पहली हिंदी फिल्म सावन भादो की. बिलकुल इंट्रेस्ट नहीं था फिर भी काम किया. टर्निंग प्वाइंट 'घर' लेकर आया. रेप विक्टिम का किरदार शिद्दत से निभाया. क्रिटिक्स ने काम को खूब सराहा और तब से बकौल रेखा उन्होंने एक्टिंग पर ध्यान देना शुरू कर दिया. खूब ख्याति हासिल की. जब तक 'खून भरी मांग' रिलीज नहीं हुई थी तब तक रेखा की फेवरेट फिल्म भी 'घर' ही थी. रेखा ने खुद पर काम किया और साल दर साल हिट पर हिट देती चली गईं. नागिन (1976), मुकद्दर का सिकंदर (1978), मिस्टर नटवरलाल (1979), खूबसूरत (1980), उमराव जान (1981), खून भरी मांग (1988) इन्हीं में से एक है.