कश्मीर में सिनेमा को वापस जगह दिलाने की तैयारी ?

हिंदी सिनेमा की कहानी में कश्मीर कभी सिर्फ एक लोकेशन नहीं था, बल्कि एक पहचान था. फिल्म तब तक अधूरी मानी जाती थी, जब तक उसका एक गाना कश्मीर की वादियों में न फिल्माया जाए.

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कश्मीर में सिनेमा को वापस जगह दिलाने की तैयारी ?
नई दिल्ली:

हिंदी सिनेमा की कहानी में कश्मीर कभी सिर्फ एक लोकेशन नहीं था, बल्कि एक पहचान था. फिल्म तब तक अधूरी मानी जाती थी, जब तक उसका एक गाना कश्मीर की वादियों में न फिल्माया जाए. समय के साथ हालात बदले और सिनेमा का यह पसंदीदा ठिकाना धीरे-धीरे कैमरे से दूर होता चला गया. अब एक बार फिर सिनेमा की नजर कश्मीर की ओर लौट रही है, इस बार नए दौर और नई जरूरतों के साथ.

आज की फिल्म इंडस्ट्री सिर्फ खूबसूरत जगहों की तलाश में नहीं है. अब सवाल है, काम कितना आसान होगा, खर्च कितना बचेगा और तकनीकी सपोर्ट कितना मिलेगा. शूटिंग से ज्यादा अहम हो चुका है एडिटिंग, वीएफएक्स और पोस्ट-प्रोडक्शन. ऐसे में कश्मीर को दोबारा फिल्ममेकर्स के नक्शे पर लाने के लिए सोच भी बदलनी जरूरी थी.

इसी सोच के साथ जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर और सिनेमा के पुराने रिश्ते को फिर से जोड़ने की पहल की है. मुंबई में एनएफडीसी परिसर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजी के दौरे के दौरान उन्होंने साफ कहा कि एक वक्त था जब कश्मीर के बिना फिल्म पूरी नहीं मानी जाती थी, लेकिन हालात ऐसे बने कि वहां फिल्म बनाना मुश्किल हो गया.

मुख्यमंत्री के मुताबिक अब परिस्थितियां सुधर रही हैं और सरकार चाहती है कि सिनेमा फिर से कश्मीर की ओर लौटे. उनका कहना है कि आज फिल्म बनाना पहले जैसा नहीं रहा. जो काम पहले बड़े सेट और लंबी शूटिंग से होता था, वह अब कंप्यूटर और तकनीक की मदद से संभव है. ऐसे में अगर कश्मीर को फिर से फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ना है, तो वहां लोकल टैलेंट और पोस्ट-प्रोडक्शन की मजबूत व्यवस्था खड़ी करनी होगी.

यही वजह है कि आईआईसीटी और एनएफडीसी जैसे संस्थानों के साथ मिलकर कश्मीर के युवाओं को एडिटिंग, साउंड, लाइटिंग, वीएफएक्स और पोस्ट-प्रोडक्शन जैसे कामों में ट्रेनिंग देने की बात चल रही है. इससे फिल्ममेकर्स को स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित लोग मिलेंगे और शूटिंग का खर्च भी कम होगा.

सिनेमा के लिहाज़ से यह कदम इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे कश्मीर सिर्फ शूटिंग लोकेशन बनकर नहीं रहेगा, बल्कि फिल्म बनाने की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनेगा. साथ ही कश्मीर की कहानियां वहां के लोग ही कह सकेंगे—जिसे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी बेहद जरूरी मानते हैं.

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उनका साफ कहना है कि जब अपनी कहानियां अपने लोग कहते हैं, तो सिनेमा ज़्यादा सच्चा और असरदार बनता है. सरकार की कोशिश है कि कश्मीर के युवाओं को सिनेमा और नई तकनीक से जोड़ा जाए, ताकि वहां रोज़गार के नए मौके बनें और फिल्म इंडस्ट्री को भी एक नया मजबूत केंद्र मिले.

आज जब सिनेमा तेजी से तकनीक के साथ आगे बढ़ रहा है, कश्मीर के पास मौका है कि वह एक बार फिर फिल्मी नक्शे पर उभरे—इस बार सिर्फ खूबसूरत वादियों के लिए नहीं, बल्कि हुनर, तकनीक और अपनी कहानियों के लिए.

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