कुंभ और महाकुंभ सिर्फ आस्था का संगम नहीं हैं, बल्कि हिंदी सिनेमा के लिए भी ये हमेशा से एक दमदार सिनेमैटिक लोकेशन रहे हैं. लाखों की भीड़, गंगा का किनारा, बिछड़ते लोग और किस्मत का खेल, इन सबने फिल्मों को भावनात्मक गहराई दी. दिलचस्प बात ये है कि कुंभ मेले का एक जैसा सीन चार अलग-अलग फिल्मों में दिखाया गया, लेकिन हर बार उसका असर अलग रहा. कहीं यही सीन कहानी की ताकत बन गया तो कहीं वही सीन फिल्म को डुबो गया. दो फिल्मों ने इसी सीन के दम पर ब्लॉकबस्टर का तमगा पाया, जबकि दो फिल्में दर्शकों को जोड़ नहीं पाईं और फ्लॉप साबित हुईं. यही वजह है कि इस एक सीन को बॉलीवुड के सबसे दिलचस्प टर्निंग पॉइंट्स में गिना जाता है.
तकदीर
साल 1943 में महबूब खान के निर्देशन में बनी तकदीर उस दौर की चर्चित फिल्म थी. नरगिस और मोतीलाल जैसे सितारों से सजी इस फिल्म की कहानी कुंभ मेले के इर्द-गिर्द बुनी गई. मेले की भीड़ में बच्चों का बिछड़ना और फिर बड़े होकर मिलना दर्शकों को भावुक कर गया. कुंभ का सीन फिल्म की कहानी की जान बन गया और यही वजह रही कि तकदीर हिट साबित हुई.
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अधिकार
1954 में आई फिल्म अधिकार में कुंभ मेले को कहानी का अहम मोड़ बनाया गया. फिल्म में उपा किरण और किशोर कुमार नजर आए. यहां मेला सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि किरदार के अंदर चल रहे संघर्ष का प्रतीक बना. हालांकि कहानी मजबूत थी, लेकिन दर्शकों से फिल्म को वैसा रिस्पॉन्स नहीं मिला और ये एवरेज रह गई.
कुंभ की कसम
1991 में रिलीज हुई कुंभ की कसम से काफी उम्मीदें थीं. फिल्म में कुंभ मेले को बड़े स्केल पर दिखाया गया और आस्था के साथ एक्शन जोड़ा गया. लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और पकड़ की कमी के चलते दर्शक फिल्म से जुड़ नहीं पाए. नतीजा ये रहा कि कुंभ जैसा भव्य सीन भी फिल्म को बचा नहीं सका और ये बुरी तरह फ्लॉप हो गई.
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धर्मात्मा
1975 में आई धर्मात्मा में कुंभ मेला सिर्फ एक सीन नहीं, बल्कि पूरी भावना बनकर उभरा. फिरोज खान और हेमा मालिनी का बिछड़ने वाला सीन आज भी याद किया जाता है. मेले की भीड़, किस्मत और आस्था का मेल फिल्म को खास बना गया. यही वजह रही कि धर्मात्मा ब्लॉकबस्टर साबित हुई.