इंसान नहीं जानवर के लिए मोहम्मद रफी ने गाया था ये सुपरहिट गाना, 55 साल पहले किशोर कुमार ने किया रिजेक्ट, कहा था- इतना गंभीर नहीं हो सकता मैं

किशोर कुमार ने जिस भावुक गीत को गाने से किया था इनकार, वही मोहम्मद रफी की आवाज में बना ऐसा सदाबहार नगमा जिसे आज भी सुनकर आंखें नम हो जाती हैं.

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जिस गाने को गाने से किशोर कुमार ने कर दिया था इनकार, वह बना सबसे यादगार सॉन्ग!

बॉलीवुड में कई ऐसे गीत बने हैं जो आज भी खूब सुने जाते हैं. ऐसे ही एक गीत के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं. बॉलीवुड में जब भी पुराने गीतों की बात आती है तो किशोर कुमार का नाम सबसे पहले लिया जाता है. किशोर कुमार ने कई ऐसे गीत गाए जिन्होंने लोगों का आत्मा को छू लिया. किशोर कुमार के गीत ऐसे थे जिन्हें नजरअंदाज कर पाना किसी के लिए भी आसान नहीं था. लेकिन क्या आप जानते हैं एक ऐसा गीत भी था, जिसे किशोर कुमार ने गाने से मना कर दिया था.

'हाथी मेरे साथी' का गीत 

जी हां, हम आपको एक ऐसे गाने के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे किशोर कुमार ने गाने से मना कर दिया था और फिर उसी गाने ने फिल्म को सुपरहिट बना दिया. साल 1971 में रिलीज हुई 'हाथी मेरे साथी' उस दौर की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है. फिल्म में राजेश खन्ना और उनके हाथियों के बीच अनोखे रिश्ते को बेहद भावुक अंदाज में पर्दे पर दिखाया गया था. इस फिल्म में उनके साथ एक्ट्रेस तनुजा भी अहम भूमिका में नजर आई थीं. फिल्म का मशहूर गीत "नफरत की दुनिया को छोड़ के, प्यार की दुनिया में खुश रहना मेरे यार" आज भी लोगों को भावुक कर देता है और इसकी धुन लोगों के दिलों में आज भी बसी हुई है.

क्यों किशोर कुमार ने गाना गाने से किया था इनकार?

जब इस गीत के बोल पहली बार किशोर कुमार के सामने रखे गए तो उन्होंने इसे गाने को लेकर झिझक जाहिर की. उनका मानना था कि इस तरह का गंभीर और भावुक गीत उनकी गायकी की शैली से मेल नहीं खाता. इसलिए उन्होंने संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से कहा कि इस गाने के लिए मोहम्मद रफी ज्यादा सही रहेंगे. किशोर कुमार को लगता था कि इस गीत की भावनाओं और गहराई को रफी साहब अपनी आवाज से बेहतर ढंग से पेश कर सकते हैं.

राजेश खन्ना क्यों रह गए थे हैरान?

जब इस बारे में राजेश खन्ना को पता चला तो वह हैरान रह गए. उस समय तक उनकी फिल्मों में किशोर कुमार की आवाज उनकी पहचान बन चुकी थी और दर्शक भी इस जोड़ी को बेहद पसंद करते थे. ऐसे में किसी दूसरे गायक की आवाज का सुझाव उन्हें सहज नहीं लगा. किशोर कुमार ने उन्हें समझाया कि इस खास गीत का भाव और गंभीरता ऐसी है जिसे मोहम्मद रफी अपनी गायकी के अंदाज से ज्यादा अच्छे ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं. उनका मानना था कि इस गीत की आत्मा रफी साहब की आवाज में बेहतर तरीके से सामने आएगी.

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रफी साहब की आवाज ने गीत को बना दिया अमर

जिस गीत को लेकर किशोर कुमार शुरुआत में असहज महसूस कर रहे थे वही आगे चलकर हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक गीतों में शामिल हो गया. मोहम्मद की दिल छू लेने वाली आवाज ने इस गीत को गहराई दी. आज भी जब यह गीत सुनाई देता है तो कई लोगों की आंखें नम हो जाती हैं.

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