पुराने हिंदी सिनेमा के दौर में कुछ गाने ऐसे बने, जो केवल संगीत नहीं बल्कि अपने अंदर एक पूरा किस्सा समेटे हुए हैं. कभी किसी गाने की धुन लोगों को झूमने पर मजबूर करती है, तो कभी उसके बोल चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं. ऐसा ही एक गाना है, जिसमें मोहम्मद रफी की आवाज का जादू, मजाकिया अंदाज और पर्दे के पीछे छिपी एक दिलचस्प कहानी देखने-सुनने को मिलती है. इस गीत के अलग-अलग वर्जन्स में अंतरे भी बदले नजर आते हैं. ऊपर से इसमें एक ऐसी आवाज सुनाई देती है, जिसका क्रेडिट रिकॉर्ड या फिल्म में दर्ज नहीं हुआ है. तो आखिर वह कौन सा गाना है, जिसने अपनी मस्ती से म्यूजिक लवर्स को आज तक बांधे रखा है? यह गाना है 'बड़े मियां दीवाने ऐसे ना बनो.'
रफी की आवाज और गाने का अनोखा अंदाज
यह गाना फिल्म 'शागिर्द' का है, जिसमें सायरा बानू और जॉय मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे. फिल्म में आई.एस. जौहर, अचला सचदेव, नजीर हुसैन और मदन पुरी जैसे कलाकार भी अहम भूमिकाओं में थे. गाने की सबसे बड़ी खासियत इसकी मस्ती भरी प्रस्तुति है. मोहम्मद रफी की आवाज ने गीत को ऐसा अंदाज दिया, जिसमें शरारत, हास्य और चुलबुलापन एक साथ महसूस होता है. गीत के बोल मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे, जबकि इसका संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने तैयार किया था. फिल्म के डायरेक्टर समीर गांगुली थे. उस दौर की फिल्मों में संगीत कहानी का अहम हिस्सा हुआ करता था और शागिर्द का यह गाना भी इसी रंग को आगे बढ़ाता है.
गाने में छिपी है क्रेडिट से जुड़ी दिलचस्प कहानी
इस गाने से जुड़ी सबसे दिलचस्प बात इसके अलग-अलग वर्जन को लेकर है. बताया जाता है कि इसे पहले मोहम्मद रफी के सोलो गीत के तौर पर दो अंतरों के साथ रिलीज किया गया था. लेकिन फिल्म और बाद में जारी किए गए वर्जन्स में गाने के कुल चार अंतरे सुनने को मिलते हैं. इनमें पहले तीन अंतरे मोहम्मद रफी ने गाए, जबकि आखिरी अंतरा मन्ना डे की आवाज में था. दिलचस्प बात यह है कि मन्ना डे को रिकॉर्ड या फिल्म में इस गीत के लिए क्रेडिट नहीं दिया गया था.
यही नहीं, गीत के बीच में सुनाई देने वाले कुछ डॉयलोग्स को लेकर भी रोचक जानकारी सामने आती है. ऐसा माना जाता है कि गाने में बोले गए शब्द आई.एस. जौहर की आवाज में हैं. हालांकि, उनके नाम को भी गाने के ऑफिसियल क्रेडिट में दर्ज नहीं किया गया है. यानी 'बड़े मियां दीवाने ऐसे ना बनो' सिर्फ एक पुराने दौर का मजेदार गाना नहीं, बल्कि हिंदी फिल्म संगीत की उस दुनिया की झलक भी है, जहां एक ही गाने के अलग-अलग वर्जन्स और बिना क्रेडिट वाली आवाजें आज भी जिज्ञासा पैदा करती हैं. रफी की आवाज, मन्ना डे का योगदान और आई.एस. जौहर की डॉयलोग्स ने इस गीत को अपने दौर से आगे भी यादगार बनाए रखा.
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