मीना कुमारी की फिल्मी जिंदगी की सबसे यादगार फिल्मों में शुमार ‘पाकीजा' सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उनके जीवन का बेहद भावुक अध्याय भी थी. इस फिल्म का गाना ‘चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था' आज भी लता मंगेशकर की आवाज में सुनते ही एक अलग दुनिया में ले जाता है. गीतकार कैफी आजमी के शब्दों और गुलाम मोहम्मद की धुन ने इसे अमर बना दिया. खास बात यह है कि ‘पाकीजा' बनने में करीब 16 साल लगे और जब फिल्म आखिरकार 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई, उसके कुछ ही हफ्तों बाद 31 मार्च को मीना कुमारी का निधन हो गया. फिल्म की शूटिंग के आखिरी दौर में उनकी सेहत इतनी खराब थी कि कई दृश्यों में बॉडी डबल की मदद लेनी पड़ी.
1956 में शुरू हुई थी ‘पाकीजा' की कहानी
कमाल अमरोही ने ‘पाकीजा' की कल्पना 1950 के दशक में की थी और फिल्म की शूटिंग 1956 में शुरू हुई. उस वक्त मीना कुमारी अपने करियर के शिखर पर थीं. अमरोही ने यह फिल्म अपनी पत्नी को समर्पित करने के इरादे से बनाई थी. फिल्म का निर्माण बेहद धीमी गति से आगे बढ़ा, क्योंकि अमरोही हर दृश्य को लेकर बेहद परफेक्शनिस्ट थे. इसी बीच 1964 में मीना कुमारी और कमाल अमरोही के रिश्ते में दरार आई और फिल्म का काम रुक गया. कई साल तक यह प्रोजेक्ट अधूरा पड़ा रहा.
1969 में ‘पाकीजा' की शूटिंग दोबारा शुरू हुई. तब तक मीना कुमारी की सेहत काफी बिगड़ चुकी थी. वह लिवर सिरोसिस से जूझ रही थीं और लंबे समय तक शूटिंग करना उनके लिए मुश्किल था. फिल्म को पूरा करने के लिए कई जगह शूटिंग तकनीकों और बॉडी डबल का सहारा लिया गया. खास तौर पर डांस सीक्वेंस में पद्मा खन्ना ने उनका बॉडी डबल बनकर काम किया. ‘तीर-ए-नजर' जैसे डांस सीक्वेंस में घूंघट, लॉन्ग शॉट और कैमरा एंगल की मदद से इस बदलाव को पर्दे पर छिपाया गया.
ऐसे बना ‘चलते-चलते' का अमर गीत
‘चलते-चलते यूं ही कोई मिल गया था' को गुलाम मोहम्मद ने संगीत दिया और इसके बोल कैफी आजमी ने लिखे. इसे लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी. इस गाने की खासियत इसकी सादगी और दर्द है. लता की आवाज ने इस दर्द को ऐसा भाव दिया कि गाना फिल्म की कहानी से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहा.
रिलीज के कुछ ही हफ्तों बाद चली गईं मीना कुमारी
‘पाकीजा' का प्रीमियर 4 फरवरी 1972 को मुंबई के मराठा मंदिर में हुआ. फिल्म को शुरुआत में आलोचकों से बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली, लेकिन दर्शकों के बीच इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई. इसके कुछ ही हफ्तों बाद 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी का निधन हो गया. उनकी मौत के बाद फिल्म के प्रति दर्शकों की भावनाएं और गहरी हो गईं और ‘पाकीजा' उस साल की सबसे बड़ी कामयाब फिल्मों में शामिल हो गई.
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