भारतीय सिनेमा में कई ऐसी फिल्में बनी हैं, जिन्होंने सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि समाज को भी नई दिशा देने का काम किया. ऐसी ही एक फिल्म थी ‘मंथन', जिसने अपनी कहानी से जितनी पहचान बनाई, उससे कहीं ज्यादा चर्चा इसके बनने के तरीके ने बटोरी. साल 1976 में रिलीज हुई श्याम बेनेगल निर्देशित इस फिल्म को किसी बड़े प्रोडक्शन हाउस ने नहीं, बल्कि करीब पांच लाख किसानों ने दो-दो रुपये का योगदान देकर बनाया था. उस दौर में यह अपने आप में अनोखा प्रयोग था. फिल्म ने राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हासिल की और बाद में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीता. आज भी ‘मंथन' भारतीय समानांतर सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है.
जब किसानों ने लिखी भारतीय सिनेमा की नई कहानी
‘मंथन' की कहानी गुजरात के दुग्ध सहकारी आंदोलन और श्वेत क्रांति से प्रेरित थी. फिल्म के निर्माण के लिए गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF) से जुड़े लगभग पांच लाख दुग्ध उत्पादक किसानों ने दो-दो रुपये का योगदान दिया था. यही वजह है कि इसे भारत की पहली क्राउड-फंडेड फिल्म भी कहा जाता है.
फिल्म में गिरीश कर्नाड, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी और कुलभूषण खरबंदा जैसे दिग्गज कलाकार नजर आए. रिलीज के समय गांवों में बैलगाड़ियों और ट्रकों में भरकर किसान इस फिल्म को देखने सिनेमाघरों तक पहुंचे थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह उनकी अपनी कहानी है.
45 दिन तक एक ही कपड़े पहने, मिला नेशनल अवॉर्ड
फिल्म को पूरी तरह वास्तविक बनाने के लिए निर्देशक श्याम बेनेगल ने कलाकारों से मेकअप और कॉस्ट्यूम पर खास ध्यान देने को कहा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई प्रमुख कलाकारों ने शूटिंग के दौरान पानी की कमी के कारण करीब 45 दिनों तक वही एक जैसे कपड़े पहने, ताकि उनके किरदारों की वास्तविकता बनी रहे और गांव का माहौल पर्दे पर बिल्कुल असली लगे.
फिल्म ने अपनी दमदार कहानी, शानदार अभिनय और सामाजिक संदेश के दम पर सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किया. वर्षों बाद भी ‘मंथन' भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है.
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