पिता को थी बेटे की चाह, जन्म के बाद छोड़ आए थे अनाथालय, 4 साल की उम्र में कमाने लगी ये बच्ची, बाद में बनीं बॉलीवुड की सबसे बड़ी स्टार

तस्वीर में दिख रही इस बच्ची ने महज 4 साल की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली थी. रिश्तों में दर्द, शोहरत की बुलंदियां और कम उम्र में मौत ने इसकी जिंदगी को किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहने दिया.

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फोटो में दिख रही ये लड़की बनी टॉप एक्ट्रेस

तस्वीर में दिख रही ये बच्ची बॉलीवुड की वो दिग्गज एक्ट्रेस हैं, जिनकी जिंदगी उतार-चढ़ाव से भरी रही. चार साल की उम्र में ही वे चाइल्ड एक्टर बन गईं और अपने परिवार का सहारा बनीं. उथल-पुथल भरी शादी और कम उम्र में मौत. इस एक्ट्रेस ने बॉलीवुड को कुछ बेहद सफल फिल्में दीं और खुद भी फैंस के दिलों में अमर हो गईं. हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड की ट्रेजेडी क्वीन, मीना कुमारी की. 'बैजू बावरा' और 'पाकीजा' जैसी फिल्मों में यादगार किरदारों से स्टारडम पाने के बावजूद, उनकी निजी जिंदगी दर्द से भरी रही. मीना कुमारी का निधन 31 मार्च 1972 को सिर्फ 38 साल की उम्र में हो गया, लेकिन उनकी एक्टिंग और शायरी आज भी जिंदा.

पिता ने जन्म के तुरंत बाद उन्हें अनाथालय में छोड़ा

1 अगस्त 1933 को बॉम्बे में जन्मीं मीना कुमारी (असली नाम महजबीन बानो) को शुरू से ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा. उनके पिता अली बख्श को बेटे की उम्मीद थी और उनके जन्म से वे शुरू में निराश हुए थे. मीना तीन बेटियों में दूसरे नंबर की थीं. उनकी बहनें खुर्शीद जूनियर और मह्लिका (मधु) थीं, जिनकी बाद में एक्टर महमूद से शादी हुई. बचपन में उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. पिता के पास डॉक्टर की फीस देने के पैसे न होने के कारण उन्हें कुछ समय के लिए अनाथालय में छोड़ दिया गया था, लेकिन जल्द ही उन्हें घर वापस ले आया गया.

चार साल की उम्र में परिवार का सहारा बनीं

मीना कुमारी की फिल्मों में दिलचस्पी नहीं थी. वह बचपन से ही पढ़ना चाहती थीं, लेकिन परिवार की हालत इतनी खराब थी कि चार साल की उम्र में ही उन्हें परिवार की मदद के लिए फिल्मों में काम करना पड़ा. उनके माता-पिता उन्हें शूटिंग के लिए फिल्म स्टूडियो ले जाने लगे.

चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर करियर की शुरुआत

डायरेक्टर विजय भट्ट ने मीना कुमारी को फिल्म 'लेदरफेस' (1939) में चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर कास्ट किया. यहीं से 'बेबी महजबीन' के नाम से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ. उन्हें पहले दिन 25 रुपये मिले थे. बहुत कम उम्र में ही वह बख्श परिवार की कमाई का मुख्य जरिया बन गईं.

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बेबी महजबीन से बेबी मीना तक

चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर मीना कुमारी ने कई फिल्मों में काम किया, जैसे अधूरी कहानी (1939), पूजा (1940), एक ही भूल (1940), नई रोशनी (1941), विजय (1942) और लाल हवेली (1944). सेट पर वह अक्सर इतनी भावुक हो जाती थीं कि रोने लगती थीं, लेकिन जैसे ही कैमरा चालू होता, उनके अंदर के दर्द की ताकत उनकी एक्टिंग में झलकने लगती थी.

इसी सच्ची संवेदनशीलता और गहराई ने उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग बनाया. फिल्म 'एक ही भूल' की शूटिंग के दौरान, डायरेक्टर विजय भट्ट ने मीना कुमारी का नाम बेबी महजबीन से बदलकर बेबी मीना कर दिया. बाद में, यही नाम मीना कुमारी के तौर पर मशहूर हुआ.

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13 साल की उम्र में बनीं हीरोइन

2 मई 1946 को रिलीज हुई फिल्म 'बच्चों का खेल' से वह 13 साल की उम्र में हीरोइन बनीं और 'बेबी मीना' से 'मीना कुमारी' बन गईं. मीना कुमारी ने 'बैजू बावरा' (1952) से अपनी पहचान बनाई. उनके किरदार 'गौरी' ने लोगों के दिलों को छू लिया और फिल्म 100 हफ्तों तक चली. इसके लिए उन्हें पहला फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड मिला. इसके बाद 'दायरा' और 'परिणीता' जैसी फिल्मों ने उनकी एक्टिंग की काबिलियत को और साबित किया. 'परिणीता' में उन्होंने एक भारतीय महिला के रोजमर्रा के संघर्षों को बहुत अच्छे से दिखाया.

इस फिल्म से मिला 'ट्रेजेडी क्वीन' का खिताब

1954-56 के बीच, मीना कुमारी ने सामाजिक और ऐतिहासिक कहानियों पर आधारित फिल्मों में काम किया, जिनमें 'चांदनी चौक', 'एक ही रास्ता', 'अदल-ए-जहांगीर', 'हलाकू' और 'आजाद' जैसी मशहूर फिल्में शामिल थीं. दिलीप कुमार के साथ उनकी फिल्म 'आजाद' दर्शकों के बीच बहुत लोकप्रिय हुई.

1957 की फिल्म 'शारदा' ने मीना कुमारी को 'ट्रेजेडी क्वीन' बना दिया. उन्हें अपनी हिम्मत और एक्टिंग के लिए पहला 'बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवॉर्ड' मिला. इसके बाद 'सहारा', 'यहूदी', 'फरिश्ता', 'चिराग कहां रोशनी कहां' जैसी फिल्मों ने उन्हें लगातार सफलता दिलाई. 'साहिब बीबी और गुलाम' (1962) में उनकी परफॉर्मेंस के लिए उन्हें चार फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले और यह फिल्म ऑस्कर के लिए भारत की एंट्री बनी.

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कमाल अमरोही से शादी

21 मई 1951 को महाबलेश्वर के पास मीना कुमारी का सड़क हादसा हो गया. इस वजह से उनका बायां हाथ घायल हो गया और वह दो महीने तक ससून अस्पताल में भर्ती रहीं. हादसे के ठीक अगले दिन, कमाल अमरोही मीना का हाल-चाल जानने के लिए आए. इसी दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ गईं. 14 फरवरी 1952 को, 19 साल की मीना कुमारी ने परिवार और दोस्तों की मौजूदगी में 34 साल के कमाल अमरोही से शादी कर ली.

शादी के बाद कमाल की शर्तें

कमाल ने मीना को अपनी फिल्मी करियर जारी रखने की इजाजत तो दी, लेकिन कई शर्तें रखीं. मीना कुमारी शुरू में तो मान गईं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इन शर्तों को मानना ​​बंद कर दिया. उनकी शादी में मारपीट और दुर्व्यवहार की बातें सामने आईं, जिसकी पुष्टि कई स्रोतों से हुई, जिसमें लेखक विनोद मेहता की रिसर्च भी शामिल है.

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अकेलापन और बीमारी बनी मौत की वजह

कमाल से अलग होने के बाद, मीना कुमारी को अक्सर अकेलेपन, डिप्रेशन और दर्द का सामना करना पड़ा. कई लोगों का मानना ​​है कि इसी अकेलेपन ने उन्हें शराब की ओर धकेल दिया, जिससे उनकी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा. समय के साथ उनकी सेहत काफी बिगड़ गई. जब उनकी आखिरी फिल्म 'पाकीजा' आखिरकार 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई, जिसे उनके पति कमाल अमरोही ने डायरेक्ट किया था. इस फिल्म को पूरा होने में 14 साल लगे. वह इसका नतीजा देखने के लिए जिंदा नहीं रहीं. 28 मार्च 1972 को वह बीमार पड़ गईं और 31 मार्च 1972 को सिर्फ 38 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

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