आज जब किसी फिल्म का पोस्टर रिलीज होता है, तो वह कुछ ही सेकंड में मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने लगता है. लेकिन 1970 के दशक में कहानी बिल्कुल अलग थी. उस दौर में न फ्लैक्स थे, न डिजिटल डिजाइनिंग और न ही सोशल मीडिया का शोर. फिल्मों के बड़े पोस्टर कलाकारों के हाथों से तैयार होते थे. रंग, ब्रश और बारीक मेहनत से बनाए गए ये पोस्टर सिर्फ प्रचार का जरिया नहीं, बल्कि अपने आप में एक कला हुआ करते थे. कई बार लोग फिल्म देखने से पहले उसके पोस्टर को देखने रुक जाते थे. ऐसी ही एक थ्रोबैक तस्वीर इन दिनों चर्चा में है, जिसमें दिल्ली के चांदनी चौक में धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की सुपरहिट फिल्म 'राजा जानी' का विशाल पोस्टर दिखाई दे रहा है.
जब पोस्टर बनाना भी एक कला थी
तस्वीर को ध्यान से देखें तो समझ आता है कि उस दौर में पोस्टर कलाकार कितनी मेहनत करते थे. धर्मेंद्र और हेमा मालिनी के चेहरे बड़े कैनवास पर हाथों से उकेरे जाते थे. कलाकार कोशिश करते थे कि सितारों के भाव, अंदाज और आकर्षण को हूबहू उतार सकें. कई बार ऐसे पोस्टर तैयार करने में कई दिन लग जाते थे. यही वजह थी कि सिनेमाघरों के बाहर लगे पोस्टर भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाते थे.
चांदनी चौक में छाया था 'राजा जानी' का रंग
1972 में रिलीज हुई 'राजा जानी' उस दौर की पॉपुलर फिल्मों में शामिल थी. तस्वीर में दिखाई दे रहा बड़ा पोस्टर बताता है कि फिल्म को कितने बड़े स्तर पर प्रदर्शित किया गया था. आज दर्शक फिल्म का ट्रेलर मोबाइल पर देखते हैं, लेकिन उस दौर में सिनेमाघर के बाहर लगे पोस्टर ही फिल्म की पहली झलक होते थे. कई लोग सिर्फ यह देखने पहुंच जाते थे कि नई फिल्म का पोस्टर कैसा है. बड़े-बड़े हाथ से बने पोस्टर दर्शकों में उत्सुकता पैदा करते थे और फिल्म के प्रति आकर्षण बढ़ाते थे. यह तस्वीर सिर्फ एक फिल्म का पोस्टर नहीं दिखाती, बल्कि उस दौर की मेहनत, कला और सिनेमा के प्रति लोगों के जुनून की भी याद दिलाती है. एक ऐसा दौर, जब पोस्टर भी किसी सुपरस्टार से कम नहीं हुआ करते थे.