दो दौर, दो सदाबहार गाने, लेकिन एक बात कॉमन! ‘चौदहवीं का चांद हो’ और ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ का दिलचस्प कनेक्शन

66 और 55 साल पुराने इन दो सदाबहार गानों में है गजब का कनेक्शन, एक ने सिखाया खूबसूरती का मतलब तो दूसरे ने जगाई तन्हाई, दोनों में है एक ही राग की छाप.

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66 और 55 साल पुराने इन गानों में एक बात क्या कॉमन हैं?
नई दिल्ली:

बॉलीवुड के पुराने गानों की खासियत होती है उनकी मिठास जो सालों बाद भी कम नहीं होती है. पुराने समय के कुछ गीत अपनी आवाज और धुन की वजह से हमेशा दिल में बसे रहते हैं. आज हम बात करेंगे ऐसे ही दो गानों की 'चौदहवीं का चांद हो' और 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए'. जिसमें से एक गाना साल 1960 की फिल्म 'चौदहवीं का चांद' का हिस्सा था, तो दूसरा 1971 की फिल्म 'आनंद' का है. इन दोनों गाने के मूड एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, दोनों की कहानियां अलग हैं, लेकिन इनका संगीत इनको खास बनाता है.  'चौदहवीं का चांद हो' और कहीं दूर जब दिन ढल जाए' एक ही धुन नें बने हुए गीत हैं. 

मोहम्मद रफी की आवाज में अमर हुआ 'चौदहवीं का चांद'

साल 1960 में आई फिल्म 'चौदहवीं का चांद' का टाइटल आज भी पुराने गाने पसंद करने वालों की प्लेलिस्ट में आज भी शामिल हैं. आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय रोमांटिक गीतों में गिना जाता है. इस गाने को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज से सजाया था. इसके बोल शकील बदायंनी ने लिखे थे और इसका संगीत दिया था रवि ने. फिल्म में गुरु दत्त और वहीदा रहमान लीड रोल में थे. इस गाने में प्रेमिका की खूबसूरती की तारीफ जिस अंदाज में की गई है, वह आज भी लोगों को आकर्षित करती है.

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