अमिताभ का वो गाना, जो 45 साल पहले हुआ था रिलीज, रवींद्रनाथ टैगोर के बंगाली गीत से था प्रेरित, किशोर कुमार की आवाज ने दी पहचान

अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘याराना’ का गाना ‘छूकर मेरे मन को’ सिर्फ एक सुपरहिट गाना नहीं था, बल्कि इसकी शुरुआती धुन रवींद्रनाथ टैगोर के प्रसिद्ध रवींद्र संगीत से प्रेरित थी.

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अमिताभ बच्चन का यह गाना आज भी है सुपरहिट

हिंदी सिनेमा में कई ऐसे गीत हैं, जिनका जादू दशकों बाद भी फीका नहीं पड़ा. इन्हीं में से एक है फिल्म ‘याराना' का सदाबहार गीत ‘छूकर मेरे मन को'. साल 1981 में रिलीज हुआ यह गाना आज भी रेडियो, म्यूजिक ऐप्स और स्टेज परफॉर्मेंस की पहली पसंद बना हुआ है. अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया यह गीत किशोर कुमार की मखमली आवाज, राजेश रोशन के मधुर संगीत और अंजान के बोलों का खूबसूरत संगम है. हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गीत की शुरुआती धुन का गहरा संबंध नोबेल पुरस्कार विजेता कवि रवींद्रनाथ टैगोर की एक प्रसिद्ध रवींद्र संगीत रचना से भी जुड़ा हुआ है. यही वजह है कि यह गीत संगीत प्रेमियों के बीच आज भी उतना ही लोकप्रिय है.   

रवींद्रनाथ टैगोर की रचना से था खास कनेक्शन

‘छूकर मेरे मन को' की शुरुआती दो पंक्तियों की धुन रवींद्रनाथ टैगोर के प्रसिद्ध रवींद्र संगीत 'तुमार होलो शुरू, आमार होलो सारा' से प्रेरित मानी जाती है. संगीतकार राजेश रोशन ने शुरुआती हिस्से में इस धुन का प्रभाव लिया, जबकि गीत का बाकी हिस्सा पूरी तरह मौलिक रूप से तैयार किया गया. संगीत विशेषज्ञों के अनुसार, यही मिश्रण इस गीत को अलग पहचान देता है, जिसमें रवींद्र संगीत की आत्मा और हिंदी फिल्म संगीत की मिठास दोनों महसूस होती हैं.   

किशोर कुमार की आवाज ने बना दिया सदाबहार

इस गीत को किशोर कुमार ने अपनी खास अंदाज और गायकी से अमर बना दिया. फिल्म में यह गाना अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया था और उनके शांत, सहज अभिनय ने गीत की खूबसूरती को और बढ़ा दिया. गीत के बोल अंजान ने लिखे थे, जिनमें प्रेम और आत्मीयता की सरल अभिव्यक्ति सुनने वालों के दिल को छू जाती है. आज भी यह गीत किशोर कुमार के सबसे पसंदीदा रोमांटिक गीतों की सूची में शामिल किया जाता है.   

45 साल बाद भी नहीं फीका पड़ा जादू

रिलीज के चार दशक से अधिक समय बाद भी ‘छूकर मेरे मन को' की लोकप्रियता बरकरार है. यह गीत अक्सर क्लासिक बॉलीवुड प्लेलिस्ट, लाइव कॉन्सर्ट और रियलिटी शो में सुनाई देता है. संगीत समीक्षकों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी, भावनात्मक धुन और रवींद्र संगीत से जुड़ा सांस्कृतिक स्पर्श है. यही कारण है कि 45 साल बाद भी यह गीत नई पीढ़ी के श्रोताओं के बीच अपनी जगह बनाए हुए है और हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार सदाबहार गीतों में गिना जाता है.   

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