30 रुपए लेकर आया था मुंबई, फिर बना सुपरस्टार

एक इंटरव्यू में देव आनंद ने बताया कि उनके पिता चाहते थे कि वह बैंक में काम करें, लेकिन वह ऊंची उड़ान भरना चाहते थे. इसलिए वह सिर्फ 30 रुपये लेकर बॉम्बे आ गए. 

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इस सुपरस्टार को पहचाना ?
नई दिल्ली:

बॉलीवुड में कई सुपरस्टार हुए, जिनका अपने दौर में स्टारडम देखने लायक था.  एक के बाद एक हिट फिल्में देने वाले इन स्टार्स पर फैंस जान छिड़कते थे. आज हम ऐसे ही एक सुपरस्टार की बात करने जा रहे हैं.  वह सिर्फ 30 रुपये लेकर बॉम्बे आए, 65 रुपये महीने पर क्लर्क की नौकरी की और बाद में 'बॉलीवुड के पहले स्टाइल आइकन' बनें. इस सुपरस्टार के पिता चाहते थे कि वह बैंक में काम करे, लेकिन उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने का फैसला किया और सिर्फ 30 रुपये लेकर बॉम्बे आ गए.

बॉलीवुड में कुछ एक्टर्स को आइकन और पायनियर माना जाता है, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. आज हम एक ऐसे एक्टर-डायरेक्टर-प्रोड्यूसर के बारे में बात करेंगे, जिनकी सदाबहार शख्सियत ने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और उन्होंने अपने फैंस को बेफिक्र जिंदगी जीने का सही मतलब सिखाया. वह एक ऐसे लेजेंड थे जो इस मंत्र पर जीते थे, "मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया.... हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...." उन्हें 'बॉलीवुड का पहला स्टाइल आइकन' माना जाता है. जीहां, हम बात कर रहे हैं देव आनंद की. 

देव आनंद सिर्फ 30 रुपये लेकर आए थे बॉम्बे 

न्यूजबुलेट के साथ एक इंटरव्यू में देव आनंद ने बताया कि उनके पिता चाहते थे कि वह बैंक में काम करें, लेकिन वह ऊंची उड़ान भरना चाहते थे. इसलिए वह सिर्फ 30 रुपये लेकर बॉम्बे आ गए. 

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ऐसी रही देव आनंद की शुरुआत
 इस एक्टर-डायरेक्टर-प्रोड्यूसर ने बिना किसी सपोर्ट या फिल्मी बैकग्राउंड के अपनी जगह बनाई. देव फिल्म इंडस्ट्री से नहीं थे. उन्होंने  साहित्य में BA किया था. उनका असली नाम देवदत्त पिशोरीमल आनंद था. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत चर्चगेट स्थित मिलिट्री सेंसर ऑफिस में 65 रुपये की मासिक सैलरी पर की थी.  बाद में उन्होंने एक अकाउंटिंग फर्म में 85 रुपये की सैलरी पर क्लर्क के तौर पर काम किया. देव अपने बड़े भाई चेतन के साथ 'इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन'  की स्थापना की. 

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ऐसे मिला देव को पहला ब्रेक 
शुरुआत में बॉम्बे में रोल पाने के लिए देव को काफी संघर्ष करना पड़ा. उसी इंटरव्यू में देव ने कहा, "मुझे याद है जब मैं उस व्यक्ति के ऑफिस में बिना बुलाए घुस गया, जिसने मुझे पहला ब्रेक दिया. प्रभात फिल्म स्टूडियो के बाबू राव पाई, वे मुझे देखते ही रह गए. उस समय उन्होंने तय कर लिया कि यह लड़का ब्रेक पाने का हकदार है और बाद में अपने लोगों से कहा कि 'यह लड़का मुझे अपनी मुस्कान, खूबसूरत आंखों और जबरदस्त आत्मविश्वास की वजह से बहुत पसंद आया.'" आनंद ने प्रभात फिल्म्स की पी.एल. संतोषी के निर्देशन में बनी फिल्म 'हम एक हैं' से डेब्यू किया. फिल्म बहुत बड़ी हिट तो नहीं रही, लेकिन उनके अभिनय की तारीफ हुई. डायरेक्टर शहीद लतीफ ने इस नए लड़के की काबिलियत को पहचाना और उन्हें अपनी फिल्म 'जिद्दी' (1948) में बड़ा ब्रेक दिया. यह देव की पहली कमर्शियल सफलता थी और इसने बॉलीवुड में कामिनी कौशल और प्राण को भी स्थापित किया. 

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देव और उनकी ब्लॉकबस्टर फिल्में 
'जिद्दी' के बाद देव ने 'जाल' (1952), 'टैक्सी ड्राइवर' (1954), 'इंसानियत' (1955), 'मुनीमजी' (1955), 'सी.आई.डी.' (1956), 'पेइंग गेस्ट' (1957), 'काला पानी' (1958) और 'काला बाजार' (1960) जैसी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्में दीं. देव आनंद ने 'मंजिल' (1960), 'जब प्यार किसी से होता है' (1961), 'हम दोनों' (1961), 'असली-नकली' (1962) और 'तेरे घर के सामने' (1963) जैसी फिल्मों से खुद को एक रोमांटिक हीरो के तौर पर स्थापित किया. 70 के दशक में, देव ने 'प्रेम पुजारी' (1970) से डायरेक्टर के तौर पर शुरुआत की और 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971), 'तेरे मेरे सपने' (1971), 'ये गुलिस्तान हमारा' (1972), 'बनारसी बाबू' (1973), 'छुपा रुस्तम' (1973), 'अमीर गरीब' (1974), 'हीरा पन्ना' (1973) और 'वारंट' (1975) जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में काम किया.

छह दशक के करियर में देव ने 110 फिल्में कीं और चार फिल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीते, जिनमें दो 'बेस्ट एक्टर' के अवॉर्ड शामिल थे. भारत सरकार ने उन्हें 2001 में पद्म भूषण और 2002 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया. 3 दिसंबर 2011 को लंदन के 'द वाशिंगटन मेफ़यर होटल' में अपने कमरे में देव आनंद का निधन हो गया. देव 88 साल के थे. 
 

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