हिंदी सिनेमा में लता मंगेशकर की आवाज की अपनी अलग पहचान रही है. उनके गाए गीतों ने कभी मोहब्बत का एहसास कराया, तो कभी जुदाई का दर्द बयां किया. आज उनकी आवाज के बिना हिंदी फिल्म संगीत की कल्पना करना भी मुश्किल है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि करियर की शुरुआत में एक फिल्म निर्माता ने उनकी आवाज को यह कहकर ठुकरा दिया था कि वह बहुत पतली है? इस मुश्किल वक्त में संगीतकार मास्टर गुलाम हैदर ने लता मंगेशकर का साथ दिया. इसके बाद रेलवे स्टेशन पर सिगरेट की डिब्बी से ताल बनाते हुए एक ऐसे गाने की धुन तैयार हुई, जिसने आगे चलकर इतिहास रच दिया. यह किस्सा साल 1948 में आई फिल्म ‘मजबूर' के गीत से जुड़ा है.
78 साल पुराना वो गाना, जिसने लता मंगेशकर को दिलाई पहचान
साल 1948 में रिलीज हुई फिल्म ‘मजबूर' का गाना ‘दिल मेरा तोड़ा, मुझे कहीं का न छोड़ा' आज भी पुराने हिंदी फिल्मी गीतों को पसंद करने वालों के बीच याद किया जाता है. इस गीत को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी, जबकि इसका संगीत मास्टर गुलाम हैदर ने तैयार किया था. यह वह दौर था, जब लता मंगेशकर फिल्म संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं. उनकी आवाज में एक अलग मिठास थी, लेकिन उस समय के कुछ फिल्मकार गायकी के दूसरे अंदाज को पसंद करते थे. ऐसे में गुलाम हैदर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने का मौका देने की कोशिश की.
जब निर्माता ने पतली आवाज बताकर कर दिया रिजेक्ट
लता मंगेशकर को फिल्मों में गाने का मौका दिलाने के लिए मास्टर गुलाम हैदर उन्हें निर्माता शशधर मुखर्जी के पास लेकर गए थे. बताया जाता है कि लता की आवाज सुनने के बाद मुखर्जी ने उसे पतला बताते हुए अपनी फिल्म के लिए उपयुक्त नहीं माना. उनके इस फैसले से गुलाम हैदर निराश जरूर हुए, लेकिन उन्हें लता की काबिलियत पर पूरा भरोसा था.
गुलाम हैदर ने उसी समय भविष्यवाणी की थी कि एक दिन हिंदी सिनेमा में ऐसा आएगा, जब फिल्म निर्माता लता मंगेशकर से अपने गाने गवाने के लिए उनके पास कतार लगाएंगे. बाद के वर्षों में लता की लोकप्रियता ने इस भरोसे को सही साबित कर दिया. उनकी आवाज हिंदी फिल्म संगीत का अहम हिस्सा बन गई.
रेलवे स्टेशन पर सिगरेट की डिब्बी से तैयार हुई धुन
इस गीत से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी मशहूर है. बताया जाता है कि शशधर मुखर्जी से मुलाकात के बाद रेलवे स्टेशन पर इंतजार करते हुए गुलाम हैदर ने सिगरेट की डिब्बी पर ताल बजाई और लता मंगेशकर के साथ गाने की धुन पर काम किया. इसी तरह तैयार हुआ गीत आगे चलकर फिल्म ‘मजबूर' का हिस्सा बना.
लता की आवाज और गुलाम हैदर के संगीत ने इस गीत को यादगार बना दिया. वक्त के साथ लता मंगेशकर ने एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने दिए और अपनी गायकी से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया. उनकी कामयाबी की कहानी यह भी बताती है कि किसी कलाकार की प्रतिभा को शुरुआती दौर में नकार देना उसकी मंजिल तय नहीं करता. कई बार वही आवाज आगे चलकर इतिहास रच देती है.