दौलत और शोहरत के पीछे भागती दुनिया को 'सजन रे झूठ मत बोलो' गाना आज भी एक पल ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देता है. फिल्म 'तीसरी कसम' का यह सदाबहार गीत याद दिलाता है कि अमीरी-गरीबी, ऊंच-नीच और रुतबे के तमाम फर्क आखिरकार यहीं रह जाते हैं. मुकेश की रूहानी आवाज, शैलेन्द्र के बोल और शंकर-जयकिशन के मधुर संगीत ने इसे सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि जिंदगी का दर्शन बना दिया. यही वजह है कि दशकों बाद भी यह नगमा लोगों के दिलों को उसी तरह छूता है. चलिए जानते हैं, 60 साल पुरानी इस फिल्म और उसके गाने के कुछ फैक्ट्स.
राज कपूर और वहीदा रहमान की यादगार फिल्म
‘सजन रे झूठ मत बोलो' साल 1966 में आई फिल्म ‘तीसरी कसम' का गीत है. फिल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने किया था. इसमें राज कपूर ने हीरामन नाम के भोले बैलगाड़ी वाले का किरदार निभाया था, जबकि वहीदा रहमान हीराबाई बनी थीं. फिल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम' पर आधारित थी. फिल्म की कहानी गांव के सीधे-सादे जीवन और समाज की सोच को दिखाती है. हीरामन के लिए दुनिया में सबसे बड़ी चीज ईमानदारी और इज्जत है. यही सोच उसे हीराबाई के करीब लाती है. लेकिन दोनों की दुनिया अलग है और समाज की बंदिशें उनके रिश्ते के आड़े आती हैं.
गाने में छिपा है जिंदगी का सच
इस गीत की सबसे खास बात यह है कि यह किसी एक इंसान को नहीं, बल्कि हर किसी को आईना दिखाता है. गीत में दौलत के घमंड को तोड़ते हुए कहा गया है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा बन जाए, उसे एक दिन इस दुनिया से जाना ही है. यही वजह है कि यह गीत सिर्फ फिल्म का हिस्सा नहीं लगता, बल्कि जिंदगी की सीख बन जाता है.