अक्सर हो जाते हैं नर्वस, कह नहीं पाते दिल की बात, तो एक बार जरूर देखें ये 50 साल पुरानी फिल्म

अकसर हम में से कई लोग दिल की बात जुबान तक लाने में हिचक जाते हैं. पसंद होती है, इमोशन्स होते हैं, लेकिन सामने खड़े इंसान से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. ऑफिस हो, बस स्टॉप हो या रोज की छोटी-छोटी मुलाकातें.

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अकसर हो जाते हैं नर्वस, कह नहीं पाते दिल की बात
नई दिल्ली:

अकसर हम में से कई लोग दिल की बात जुबान तक लाने में हिचक जाते हैं. पसंद होती है, इमोशन्स होते हैं, लेकिन सामने खड़े इंसान से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. ऑफिस हो, बस स्टॉप हो या रोज की छोटी-छोटी मुलाकातें. जिनसे दिल धड़कता है पर शब्द साथ नहीं देते. अगर आप भी कभी इस कन्फ्यूजन और नर्वसनेस से गुजरे हैं, तो 50 साल पहले आई फिल्म ‘छोटी सी बात' जरूर देखनी चाहिए. ये फिल्म न सिर्फ प्यार की सादगी को दिखाती है, बल्कि ये भी सिखाती है कि कॉन्फिडेंस कैसे धीरे-धीरे जिंदगी बदल देता है. बासु चटर्जी के निर्देशन में बनी ये फिल्म आज भी उतनी ही ताजा लगती है.

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कहानी एक शर्मीले इंसान की

‘छोटी सी बात' की कहानी सरल लेकिन दिल छू लेने वाली है. अरुण (अमोल पालेकर) एक सीधा-सादा, शर्मीला लड़का है, जिसे प्रभा (विद्या सिन्हा) पसंद है. वो रोज उसे बस स्टॉप पर देखता है, उसके साथ चलता है, लेकिन बात करने की हिम्मत नहीं कर पाता. सामने एक कॉन्फिडेंट और स्मार्ट लड़का भी मौजूद है. जो हर बार अरुण से आगे निकल जाता है. यही असहजता, हिचक और खुद से लड़ाई इस फिल्म को बेहद रिलेटेबल बनाती है. फिल्म ये दिखाती है कि प्यार सिर्फ कॉन्फिडेंट लोगों का नहीं, बल्कि उन लोगों का भी होता है जो अंदर ही अंदर घबराते रहते हैं. अरुण की यही झिझक दर्शकों को उसकी कहानी के और करीब ले आती है.

सादगी और मीठा रोमांस

कहानी में मोड़ तब आता है जब अरुण अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए मदद लेने निकल पड़ता है. धीरे-धीरे वो बदलता है, खुद को समझता है और यही सफर फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती है. अमोल पालेकर की नेचुरल एक्टिंग, विद्या सिन्हा की सादगी और अशोक कुमार का दमदार किरदार, सब मिलकर फिल्म को खास बनाते हैं. फिल्म में न दिखावटी ग्लैमर है, न ओवरड्रामा. सिर्फ मामूली से लोग, मामूली सी जिंदगी और उसमें पनपती प्यारी सी कहानी. यही वजह है कि आधी सदी बीत जाने के बाद भी ‘छोटी सी बात' उतनी ही अपनी सी लगती है.

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