6-7 मई की वो रात: जब न्यूजरूम में सिर्फ खबर नहीं, भारत का शौर्य चमक रहा था
‘ऑपरेशन सिंदूर’ सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं था. यह उन 26 बेगुनाहों की चीख का जवाब था. यह नए भारत की गर्जना थी और यह संदेश भी कि अब हिंदुस्तान शांति की भाषा जरूर बोलता है, लेकिन अगर कोई उसकी तरफ बारूद फेंकेगा… तो जवाब इतिहास में दर्ज होगा.
22 अप्रैल, पहलगाम
खबर आई कि आतंकियों ने 26 निर्दोष लोगों की जान ले ली. टीवी स्क्रीन पर खून, चीखें और बिखरे सामान दिखाई दे रहे थे. लेकिन उस दिन सिर्फ पहलगाम नहीं रोया था… पूरा देश भीतर तक हिल गया था. आतंकियों ने धर्म देखकर निहत्थे पर्यटकों को गोली मारी. कलमा न पढ़ पाने वाले पर्यटकों को निशाना बनाया गया. महिलाओं से कहा गया, 'जाकर मोदी को बता देना'.
उस हमले के बाद एक शब्द हर भारतीय की जुबान पर चढ़ गया था, 'बदला…'
यह सिर्फ गुस्सा नहीं था. यह उन 26 चेहरों की टीस थी, जो बिना किसी कसूर के मार दिए गए. चाय की दुकानों से लेकर न्यूजरूम तक, सोशल मीडिया से लेकर देश की हर सड़क तक, हर जगह एक ही सवाल था, 'भारत जवाब कब देगा?'
दिल्ली में लगातार हाई लेवल बैठकें चल रही थीं. CCS की मीटिंग्स हो रही थीं. युद्ध रणनीति से लेकर कूटनीति तक, हर स्तर पर पाकिस्तान को घेरने की तैयारी थी. सिंधु जल संधि रोक दी गई. अटारी बॉर्डर बंद कर दिया गया. पाकिस्तानी नागरिकों की यात्रा पर सख्ती हुई. पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारियों को देश छोड़ने के आदेश दिए गए.
भारत एक-एक चाल चल रहा था… बेहद शांत, बेहद ठंडे दिमाग से.

लेकिन जनता के भीतर एक बेचैनी बाकी थी. '26 लोगों को मारने वाले आतंकी अभी जिंदा क्यों हैं?'
दिन बीत रहे थे. टीवी चैनलों पर डिबेट्स गर्म थीं. न्यूज़रूम की स्क्रीनें सिर्फ खबरें नहीं दिखा रही थीं, वे देश के मूड को दिखा रही थीं. एंकरों की आवाज में तल्खी थी. रिपोर्टरों की आंखों में इंतजार था. हर डेस्क पर एक ही चर्चा, 'कुछ बड़ा होने वाला है…'
और सच कहें तो यह आहट सिर्फ सीमा पर नहीं थी, दफ्तरों में भी महसूस होने लगी थी.
हमारे न्यूजरूम में भी युद्ध जैसे हालात में क्विक रिस्पॉन्स के लिए अलग टीम बनाई गई. मैं भी उसी टीम का हिस्सा था. छुट्टियां कैंसिल हो रही थीं. हर नोटिफिकेशन दिल की धड़कन बढ़ा देता था.
फिर आई 6-7 मई की वो रात.
रात करीब 12:00 बजे हम ऑफिस से निकले. रोज की तरह थके हुए थे, लेकिन दिमाग में वही तनाव चल रहा था- भारत आखिर कब जवाब देगा?
घर पहुंचे ही थे कि कुछ देर बाद फोन बज उठा.
'तुरंत ऑफिस पहुंचो…'
आवाज में वह तेजी थी जो सिर्फ बहुत बड़ी खबर के वक्त होती है.
घड़ी करीब 1 बजे का वक्त दिखा रही थी. मैंने तुरंत फोन खोला. इनपुट ग्रुप में ADGPI का ट्वीट चमक रहा था-
उसी समय भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर' शुरू कर दिया था.
रात 1 बजकर 5 मिनट पर भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान और PoK में बने 9 आतंकी ठिकानों पर हमला बोल दिया. सिर्फ 25 मिनट के भीतर आतंक के अड्डे धुएं में बदल दिए गए. 100 से ज्यादा आतंकी ढेर हो चुके थे.
'Operation Sindoor'

उस एक लाइन को पढ़ते ही जैसे पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई. एक गहरी सांस ली. हेलमेट उठाया और फिर रात में गाड़ी सीधे ऑफिस की तरफ दौड़ पड़ी. उस रात नोएडा फिल्म सिटी का माहौल अलग था. सड़कें आधी खाली थीं, लेकिन न्यूज़रूमों में रोशनी पहले से ज्यादा चमक रही थी. जैसे पूरा मीडिया जाग उठा हो. टीवी पर चल रहीं साइरन की आवाजें दिल की धड़कनों को और तेज कर रही थीं. वेबसाइट तुरंत लाल-काले रंग के लुक में आई. थोड़ी ही देर में करीब 2:15 तक न्यूजरूम पूरा भर चुका था. हर डेस्क पर उंगलियां कीबोर्ड पर दौड़ रही थीं.
लेकिन उस रात सिर्फ काम नहीं हो रहा था. उस रात हर भारतीय पत्रकार के भीतर भी एक सैनिक जाग गया था. उस रात और उसके बाद अगली 3-4 रातें आंखों में नींद कम सुकून ज्यादा सो रहा था.
स्टूडियो की स्क्रीन पर जब पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों की तस्वीरें चल रही थीं, तो भीतर एक अजीब-सा सुकून था. ऐसा सुकून जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है. क्योंकि यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं थी… यह उन 26 लोगों के लिए न्याय जैसा महसूस हो रहा था.
भारतीय वायुसेना ने लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिद्दीन के ठिकानों को तबाह कर दिया था. मोस्ट वांटेड आतंकी मसूद अजहर के रिश्तेदार भी इस हमले में मारे गए.
भारत ने साफ संदेश दे दिया था- अगर आतंक भारत में आएगा, तो जवाब सीमा पार जाकर दिया जाएगा.
पाकिस्तान बौखला गया. उसने जवाबी हमले की कोशिश की. लेकिन भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम ने उसकी मिसाइलों को हवा में ही खत्म कर दिया. फिर भारत ने पलटवार किया. पाकिस्तान के एयरबेस और सैन्य ठिकाने निशाने पर आए.
6-7 मई की वह रात…
वह सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं थी. वह रात उस नए भारत की पहचान थी, जो शांति चाहता है, लेकिन कमजोरी नहीं दिखाता. जो युद्ध नहीं चाहता, लेकिन हमला सहकर चुप भी नहीं बैठता.
उस रात हर टीवी की स्क्रीन पर कोई खबर नहीं चल रही थी. वो भारत का शौर्य था जो काले और लाल रंग के रूप में चमक रहा था.
इसके बाद फिर 7-8 मई की रात आई. पाकिस्तान ने पलटवार की कोशिश की. स्क्रीन पर लगातार फ्लैश चल रहे थे- मिसाइलें, ड्रोन, एयरस्पेस अलर्ट. न्यूजरूम में बैठे हर इंसान की नजर एक साथ कई स्क्रीन पर थी. फोन लगातार बज रहे थे. लेकिन इस बार डर नहीं था… इंतजार था कि भारत अब क्या करेगा. और फिर भारत ने जवाब दिया. ऐसा जवाब, जिसने पाकिस्तान की रातों की नींद उड़ा दी.

भारतीय सेना ने दुश्मन के हमलों को सिर्फ रोका नहीं, उन्हें हवा में ही खत्म कर दिया. आसमान में भारत का एयर डिफेंस सिस्टम 'सुदर्शन' एक अभेद्य कवच बनकर खड़ा था. उसके बाद जो हुआ, उसने दुनिया को नए भारत की सैन्य ताकत का अहसास करा दिया. पाकिस्तान के 20% एयरफोर्स एसेट्स को तबाह कर दिया. भारत के इस सैन्य हमले में पाक के कई फाइटर जेट नष्ट हुए और भोलारी एयरबेस पर बड़े स्तर पर हताहतों की खबर सामने आई. इन 3-4 रातों में पाकिस्तान के रावलपिंडी से कराची और सिंध से सियालकोट तक हर इलाका भारत के निशाने पर आया.
फिर 8 मई 2025 की रात पाकिस्तान के रावलपिंडी क्रिकेट स्टेडियम के एक हिस्से को भारतीय ड्रोन हमले में काफी नुकसान पहुंचा. उन दिनों ऐसा लग रहा था जैसे हिंदुस्तान ने साफ शब्दों में कह दिया हो, 'अगर भारत पर नजर उठी, तो जवाब सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं रहेगा.'
उधर धर्मशाला में चल रहा IPL मैच एहतियातन रोक दिया गया. स्टेडियम की फ्लडलाइट्स के बीच पसरा सन्नाटा टीवी स्क्रीन से निकलकर सीधे दिल में उतर रहा था. देशभर में लोग रात-रात भर जाग रहे थे. कोई टीवी के सामने बैठा था, कोई मोबाइल पर अपडेट देख रहा था. और हम… हम न्यूजरूम में लगातार कई-कई घंटों तक काम करते जा रहे थे. शाम 3 बजे शुरू हुई ड्यूटी कब अगली सुबह 8-9 बजे में बदल जाती, पता ही नहीं चलता था. शरीर थक जाता था… लेकिन भीतर एक अलग ही ऊर्जा दौड़ रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे पूरा देश एक साथ सांस ले रहा हो.
फिर 10 मई की शाम आई
अचानक दुनिया की नजरें एक ट्वीट पर टिक गईं. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सीजफायर का जिक्र किया. कुछ देर बाद युद्धविराम की पुष्टि हुई. पता चला कि पाकिस्तान के DGMO ने भारत से सीजफायर की गुहार लगाई. तब जाकर यह युद्ध रुका. धीरे-धीरे टीवी स्क्रीन पर चलती लाल पट्टियां धीमी पड़ने लगीं. न्यूजरूम का शोर भी थोड़ा शांत हुआ. लेकिन भीतर कहीं एक बात साफ थी- यह सिर्फ युद्ध का विराम था, भारत के संकल्प का नहीं.
क्योंकि ‘ऑपरेशन सिंदूर' सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं था. यह उन 26 बेगुनाहों की चीख का जवाब था. यह नए भारत की गर्जना थी और यह संदेश भी कि अब हिंदुस्तान शांति की भाषा जरूर बोलता है, लेकिन अगर कोई उसकी तरफ बारूद फेंकेगा… तो जवाब इतिहास में दर्ज होगा.
(डिस्क्लेमर: सत्यम बघेल NDTV में चीफ सब एडिटर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.)
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