Opinion: अचानक इतने डरे हुए क्यों दिख रहे हैं पाकिस्तानी जनरल? मुनीर गैंग में सब ठीक नहीं है

पाकिस्तान में सेना अभूतपूर्व तौर से अलोकप्रिय हो चुकी है. पाकिस्तान जनरलों के हाथ से हालात निकलते जा रहे हैं.

Opinion: अचानक इतने डरे हुए क्यों दिख रहे हैं पाकिस्तानी जनरल? मुनीर गैंग में सब ठीक नहीं है

पाकिस्तान में आजकल कुछ बहुत ही अजीब घटनाएं घट रही हैं.ये  उस पहले से अशांत देश के लिहाज से भी असाधारण हैं. सबसे पहले तो गृह मंत्री मोहसिन नकवी का वह बयान आया जिसमें उन्होंने सरकार की नाकामी का रोना रोया और पाकिस्तान में 'कॉकरोच' प्रदर्शनों के खतरों का जिक्र किया.

इसके बाद इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (DG-ISPR) के महानिदेशक सामने आए. उन्होंने पूरे दो घंटे की एक लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इसमें ज्यादातर बातें अंग्रेजी में थीं और आंकड़ों की बौछार थी. जाहिर है कि यह बयानबाज़ी विदेशी दुनिया को दिखाने के लिए थी, भले ही उनका अपना मुल्क हिंसा की आग में झुलस रहा हो.

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यही बातें बाद में प्रमुख पत्रकारों समेत कई लोगों ने दोहराईं और नौजवानों में बढ़ते गुस्से को लेकर गंभीर चेतावनियां दीं. ऐसा लगता है कि पड़ोसी देश में उभरे एक खास कीड़े (प्रतीकात्मक) ने पाकिस्तान के हुक्मरानों और एलीट वर्ग के दिलों में खौफ पैदा कर दिया है.

पाकिस्तानी गृह मंत्री की सलाह

सबसे पहले बात करते हैं गृह मंत्री के उस अजीब और शायद कभी न पूरे होने वाले मशवरे की. वह देश की व्यवस्था को नीचे से ऊपर तक पूरी तरह 'सुधारना' चाहते हैं ताकि शासन बेहतर हो सके और युवाओं को शांत किया जा सके. लेकिन यह सलाह उस शख्स के मुंह से अजीब लगती है, जो पाकिस्तान में पंजाब का मुख्यमंत्री रहते हुए 2024 में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के प्रदर्शनकारियों पर आधी रात को हुए क्रूर कार्रवाई का जिम्मेदार था. उस घटना में चार लोग मारे गए थे और 90 से ज्यादा जख्मी हुए थे. उन पर करोड़ों के भ्रष्टाचार के संगीन आरोप भी हैं. सच चाहे जो हो, लेकिन उनकी छवि किसी रोल मॉडल जैसी तो बिल्कुल नहीं है.

दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' प्रदर्शनों का हवाला देते हुए उन्होंने बिल्कुल सही चेतावनी दी कि पाकिस्तान का युवा अब मुफ्त लैपटॉप जैसी छोटी-मोटी चीजों से बहलने वाला नहीं है; उसे व्यवस्था में बड़ा बदलाव चाहिए. इसका हल उन्होंने यह निकाला कि बेहतर शासन के लिए नए प्रशासनिक इलाके बनाए जाएं. 

मिसाल के तौर पर, मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट-पाकिस्तान (MQM-P) काफी समय से कराची को सिंध से अलग करके एक नया सूबा बनाने की मांग कर रही है.

लेकिन सिंध की सत्ता संभाल रही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) इसका सख्त विरोध करती है. दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों पार्टियां केंद्र की PML-N सरकार में सहयोगी हैं. इसी तरह, PPP और PTI लंबे समय से दक्षिण पंजाब को अलग सूबा बनाने की मांग कर रही हैं, जिसका विरोध PML-N करती रही है. 

नकवी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि नए सूबे बनाने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा. इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है और PML-N के पास यह बहुमत नहीं है.

हां, अगर फौज चाहे तो यह मुमकिन हो सकता है. फिलहाल फौज की तरफ से ऐसा कोई इशारा नहीं मिला है, लेकिन नकवी की इस बात पर भारी आलोचना हुई. मजेदार बात यह रही कि नकवी यह भाषण 'पाकिस्तान इकोनॉमिक समिट 2026' में बड़े कारोबारियों के सामने दे रहे थे. उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि असल में देश तो वही चला रहे हैं, क्योंकि राजनीतिक पार्टियों को करोड़ों का चंदा वही देते हैं. नकवी को यह सब बखूबी मालूम है, आखिर वे खुद इस खेल के पुराने खिलाड़ी रहे हैं.

DG-ISPR का फुसफुसाता तीर

इसके बाद DG-ISPR लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी की वह विवादित और खतरनाक मैराथन प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई. इस पूरी तकरीर का मकसद बलूचिस्तान में हो रही हिंसा का सारा ठीकरा दूसरों पर फोड़ना था. खासकर भारत पर. आरोपों के इस खेल में कुछ ऐसी वीडियो दिखाई गईं जो साफ तौर पर फर्जी और लिप-सिंक लग रही थीं. इन वीडियो में लड़कियां यह दावा कर रही थीं कि उन्हें अगवा करके आत्मघाती हमलावर बनने पर मजबूर किया जा रहा है. एक और क्लिप में एक स्थानीय शख्स सभी उपद्रवियों को 'फितना अल हिंदुस्तान' का आतंकवादी बता रहा था.

इसके अलावा तालिबान पर भी कई इल्जाम लगाए गए और विडंबना देखिए कि उन्हें सांस्कृतिक तौर से पाकिस्तानियों से बिल्कुल अलग बताया गया. अफसोस कि वे यह बात भूल गए कि तीन दशकों तक उन्होंने खुद ही इन अफगानों को हथियार बांटे थे.

स्थानीय लोगों को भी नहीं बख्शा गया, खासकर बलूचिस्तान के सरदारों को, जिनके बारे में कहा गया कि उन्हें सिर्फ अपने फायदे से मतलब है. प्रांतीय सरकार पर भी आरोप लगाया गया कि वह लेवीज और बलूच स्काउट्स जैसी अर्धसैनिक टुकड़ियों को सही उपकरण और सहूलियतें मुहैया नहीं करा रही है.

लेकिन जनरल साहब को शायद यह याद रखना चाहिए था कि 7वें नेशनल फाइनेंस कमीशन के तहत बलूचिस्तान को राष्ट्रीय संसाधनों के कुल बजट का सिर्फ 9% हिस्सा मिलता है, जबकि अकेले पंजाब को 52% मिलता है. जबकि बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का 44% हिस्सा है. इन आंकड़ों को उनकी बात से साफ गायब कर दिया गया. वैसे भी, बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री मीर सरफराज बुगती फौज की पसंद के ही आदमी हैं. उन्होंने तो एक बार बलूच मसले को हल करने के लिए 'नरसंहार' को इकलौता जरिया तक बता दिया था.

रोजाना 200 'इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन' का दावा ठोकने के बाद जनरल साहब की सलाह का लब्बे-लुआब यही था कि देश में 'अच्छे शासन' की जरूरत है. अपने प्रमुख, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल असीम मुनीर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि लोगों को सिर्फ अपने हकों की बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी 'जिम्मेदारियों' को भी समझना चाहिए.

यहां आकर बात हाथ से निकल गई. अगर फौज अपने तमाम दबदबे और ताकत के बावजूद सुशासन के लिए जिम्मेदार नहीं है, तो फिर कौन है? यकीनन वे बेबस नेता तो नहीं और न ही वह स्थानीय प्रशासन जिसके सिर पर हर वक्त फौजी अफसर सवार रहते हैं.

और हां, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में छिड़े जन-आंदोलन पर जनरल साहब ने एक शब्द तक नहीं बोला.

इस पूरी घबराहट की दो बड़ी वजहें हैं. पहली यह कि दिल्ली में हुए प्रदर्शनों ने पाकिस्तानी आवाम का ध्यान अपनी ओर खींचा और वहां के युवाओं ने भारतीय छात्रों की इस हिम्मत की काफी तारीफ की. इसके बाद इस्लामाबाद और रावलपिंडी में PoK के समर्थन में जो प्रदर्शन हुए, वे भले ही इत्तेफाक लगें, लेकिन याद रहे कि दुनिया भर में जन-आंदोलन अक्सर लहरों की तरह उठते हैं. 

2010 के दशक में भी ऐसा ही हुआ था जब करीब 25 देशों में प्रदर्शन फैले थे. तब पाकिस्तान इस लहर से काफी हद तक बचा रहा, सिवाय उन फौज-प्रायोजित प्रदर्शनों के जिनसे नवाज शरीफ की हुकूमत गिराई गई थी. लेकिन 2020 के दशक में, खासकर इमरान खान के जेल जाने के बाद प्रदर्शनों का यह सिलसिला काफी बढ़ गया. अब यह आंदोलन दूसरे सूबों से होता हुआ देश के दिल (रावलपिंडी/इस्लामाबाद) तक पहुंच चुका है. रावलपिंडी के लिए यह एक 'रेड लाइन' है. हालात यकीनन उनके हाथ से निकल चुके हैं.

भारत के लिए चिंता की बात यह है कि जिस दिन DG-ISPR जहर उगल रहे थे, उसी दिन जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में हमला हो गया. लश्कर-ए-तैय्यबा के मुखौटे संगठन 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' (TRF) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली. इस हमले में एक ईंट-भट्टे पर काम करने वाले दो गैर-स्थानीय मजदूरों की मौत हो गई.  

आतंकियों ने जिस तरह पहलगाम की तर्ज पर पहले हिंदुओं की पहचान की और फिर उन्हें गोली मारी, उससे साफ है कि पाकिस्तान यह पैगाम देना चाहता है कि वह जब चाहे अपनी नापाक हरकतें कर सकता है. हालिया हमले का बड़े पैमाने पर न होना यह दर्शाता है कि उसका मकसद जंग छेड़ना नहीं, बल्कि माहौल में तनाव बनाए रखना है. 

कुछ दिन पहले ही एक पुलिसकर्मी को सिर में गोली मार दी गई थी और हमलावर भीड़ में गायब हो गया था. आगे भी मासूम नागरिकों और पुलिस पर ऐसे छोटे-छोटे हमलों की आशंका बनी रहेगी. इससे कुछ नहीं तो कम से कम पाकिस्तान के अंदर समर्थकों का हौसला बढ़ाने की कोशिश की जाएगी.

अहम बात यह भी है कि पाकिस्तान एक सीधी और पूरी जंग से बचने की कोशिश करेगा. इसकी वजह यह है कि सड़कों पर पाकिस्तानी फौज बेहद अलोकप्रिय हो चुकी है और युवाओं में भारी गुस्सा है. अगर जंग छिड़ी तो मुमकिन है कि फौजी कमान को ही उखाड़ फेंका जाए. वैसे भी, रोज 200 फौजी ऑपरेशन चलाना किसी भी सेना के लिए आसान काम नहीं है.

आतंकवाद-विरोधी नीतियां

इस बीच, 'कारण और प्रभाव' के कुदरती नियम को समझना बेहद जरूरी है. फौज जितना ज्यादा ऑपरेशन चलाएगी निशाना बनी आबादी में उतना ही ज्यादा असंतोष और गुस्सा फैलेगा. 

कश्मीर में तैनात भारतीय बलों के साथ भी ऐसा हो सकता था, लेकिन भारतीय सेना ने अपने ऑपरेशनों में हमेशा संवेदनशीलता और सूझबूझ से काम लिया. 'ऑपरेशन सद्भावना' के तहत खेल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी पहल शुरू की गईं. यह कोई ढिलाई या नरमी नहीं थी, बल्कि एक बेहतरीन रणनीति थी. इसी का नतीजा था कि भारतीय सेना को स्थानीय लोगों का भरोसा और दिल से सहयोग मिला. ये किसी भी आतंकवाद-विरोधी अभियान की असली कामयाबी होती है. अब वक्त आ गया है कि इस रणनीति को और बड़े पैमाने पर दोबारा लागू किया जाए.

उपराज्यपाल मनोज सक्सेना ने युवाओं को ध्यान में रखते हुए कई नई योजनाएं शुरू की हैं. इनमें 'डिजाइन योर ओन डिग्री' प्रोग्राम और नशे के खिलाफ अभियान शामिल हैं. भारत की रणनीति अब इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि वह एक डरे-सहमे, जुल्म सहते पाकिस्तान और भारतीय व्यवस्था के बीच का साफ अंतर दुनिया को दिखाए. 

पाकिस्तान के नीति-निर्माता भी शातिर हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत का रुख यही रहने वाला है. इसीलिए, आने वाले वक्त में उनकी रणनीति भारतीय समाज में मजहबी दरार डालने और सुरक्षा बलों को उकसाने की होगी, ताकि वे आम लोगों या भीड़ पर कार्रवाई करें और इसका फायदा उठाकर असंतोष फैलाया जा सके.

अब समय आ गया है कि दिल्ली अपना खुद का 'ऑपरेशन शील्ड' (Safeguarding Honesty, Integrity, Ethics, Law and Discipline) शुरू करे. रावलपिंडी के इन खोखले ऑपरेशनों से यह कहीं ज्यादा असरदार साबित होगा. रावलपिंडी की सोच पूरी तरह से फौजी है, लेकिन भारत के पास एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था है. आने वाले वक्त की चुनौतियों को देखते हुए अब एक पल भी गंवाने की गुंजाइश नहीं है.

(तारा कार्था, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की पूर्व निदेशक हैं)