पाकिस्तान ने किए थे अत्याचार और तुर्किये से नाता नहीं, फिर क्यों 'इस्लामिक नाटो' में जाना चाहता है बांग्लादेश

प्रोफेसर अमित सिंह के मुताबिक बांग्लादेश भी पैक्ट में कुछ देने की स्थिति में नहीं है, लेकिन वह एक बड़े सुरक्षा समझौते में शामिल होना चाहता है.

कभी पाकिस्तान के ही अत्याचारों से लड़कर बांग्लादेश अलग मुल्क बना था. अब वह उसी मक्का पैक्ट में शामिल होने की इच्छा जता रहा है, जिसका हिस्सा पाकिस्तान है. यही नहीं पाकिस्तान की ही पहल पर यह पैक्ट हुआ, जिसमें सऊदी अरब और तुर्किये शामिल हैं. यही नहीं पाकिस्तान तो इसे इस्लामिक नाटो बता रहा है और कई अन्य देशों को शामिल करने की बात कर रहा है. ऐसे में सवाल है कि अब तक भारत का करीबी रहा और उसी की मदद से अस्तित्व में आया बांग्लादेश इसमें शामिल होने का इच्छुक क्यों है. इसका जवाब भारत से बदलते रिश्तों में है. कभी भारत की मदद से ही बना और फिर आगे बढ़ा बांग्लादेश आज भारत पर ही दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है. 

बांग्लादेश की इस्लामिक नाटो से जुड़ने की इच्छा पर प्रोफेसर अमित सिंह ने विस्तार से बात की. उनका कहना है कि पाकिस्तान के पास इस पैक्ट में देने के लिए कुछ नहीं है. बस वह न्यूक्लियर पावर दिखाकर तुर्की और सऊदी को लुभाना चाहता है. बांग्लादेश भी कुछ देने की स्थिति में नहीं है, लेकिन वह एक बड़े सुरक्षा समझौते में शामिल होना चाहता है. खासतौर पर भारत पर दबाव बनाने का उद्देश्य है. इसके अलावा सऊदी अरब से बड़े पैमाने पर वह रेमिटेंस भी हासिल करता है. ऐसे में सऊदी अरब से सुरक्षा के संबंध में पैक्ट होने से इस रिश्ते को और मजबूती मिलने की उसे उम्मीद है. 

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वह कहते हैं, 'भले ही इस पैक्ट का नाम मक्का पर रखा गया है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षा से ही जुड़ा है. बांग्लादेश को लगता है कि भारत अब उस पर दबाव बना रहा है. बांग्लादेशियों को वापस भेजकर और चिकन नेक यानी सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा भी भारत मजबूत कर रहा है. इससे बांग्लादेश को लग रहा है कि भारत अब उस पर दबाव बना रहा है और उसके जवाब में वह मक्का पैक्ट में शामिल होकर उलटा भारत को प्रेशर में ला सकेगा.' जेएनयू के स्पेशल सेंटर फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर अमित सिंह यह भी कहते हैं कि इस पैक्ट का ज्यादा असर भारत पर नहीं होगा.

तुर्किये को इस पैक्ट की ज्यादा जरूरत लगती है और उसकी वजह भी भारत ही है. साइप्रस, आर्मेनिया और ग्रीस जैसे तुर्की के पड़ोसी देशों से भारत के अच्छे रिश्ते हैं. इसके अलावा भारत इन्हें हथियार भी बेच रहा है. ऐसे में तुर्की को लगता है कि भारत उसकी घेरेबंदी कर रहा है और वह जवाब में मक्का पैक्ट जैसी डील कर रहा है. इसमें उसे इस्लाम को वह जोड़ मिल गया है, जिसके जरिए भारत के बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश को भी साथ लाना संभव है.

मक्का पैक्ट की इतनी चर्चाओं के बाद भी प्रोफेसर अमित सिंह मानते हैं कि इससे भारत के लिए चिंता की कोई वजह नहीं बनती. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत रक्षा तकनीक, हथियारों के जखीरे और अर्थव्यवस्था के मामले में कहीं आगे है. यहां तक कि सऊदी अरब भी हमसे ब्राह्मोस मांग रहा है. भारत की तैयारी पूरी है और अपनी संप्रभुता को लेकर भारत सजग है. 

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क्यों बांग्लादेश के हित में है भारत से अच्छे संबंध रखना?

वह कहते हैं कि बांग्लादेश के लिए तो बेहतर यही होगा कि मक्का पैक्ट की बजाय भारत से अच्छे संबंध रखे. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के साथ बांग्लादेश अच्छे संबंध बनाकर रखे तो उसके भविष्य के लिए अच्छा होगा. भारत विस्तारवादी देश नहीं है. बांग्लादेश से उसकी जमीनी और समुद्री सीमा लगती है. ऐसे में दोनों एक-दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी हो सकते हैं. यही नहीं बांग्लादेश में भी एक सेकुलर तबका है, जो पाकिस्तान के साथ करीबी रिश्तों को बहुत सहजता से नहीं देखता. फिर भारत से बैर भाव रखने पर यदि किसी तरह का सुरक्षा संकट आता है तो ये देश उसकी मदद करने की स्थिति में नहीं होंगे. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी सऊदी अरब ने कोई दखल नहीं दिया था. 

बांग्लादेश को सऊदी अरब से दिख रहा कमाई वाला फायदा

बांग्लादेश को एक फायदा पैसों का भी दिख रहा है. बांग्लादेश में आने वाली विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्रोत सऊदी अरब से आने वाला रेमिटेंस है. बड़ी संख्या में बांग्लादेश के लोग कमाने के लिए सऊदी अरब में हैं और वे परिवारों को बड़ी रकम भेजते हैं. 2025-26 के शुरुआती 11 महीनों में 5.28 अरब डॉलर की रकम सऊदी अरब से आई थी. यह बांग्लादेश में आई कुल विदेशी मुद्रा का 16 फीसदी हिस्सा है. इसके अलावा बांग्लादेश को लगता है कि इस रेमिटेंस के साथ ही सऊदी निवेश भी उसे मिल सकता है. वहीं तुर्की को हथियार के लिए एक और बाजार मिल जाएगा. वह पहले ही पाकिस्तान को बड़ी संख्या में ड्रोन बेच रहा है. अब बांग्लादेश को भी वह सप्लाई करने का प्लान बना रहा है. 

पाकिस्तान से करीबी बढ़ाना उलटा भी पड़ सकता है, कैसे?

बांग्लादेश यदि इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान से करीबी बनाना चाहता है तो यह भी सच है कि दोनों कभी एक ही थे, लेकिन अलग भी हुए. ऐसा इसलिए क्योंकि इस्लाम उन्हें एक रखता था तो वहीं भाषा, संस्कृति और भूगोल उन्हें अलग करते थे और अंत में नया देश अस्तित्व में आ ही गया. पाकिस्तानी सेना ने तब भीषण अत्याचार बांग्ला भाषियों पर किए थे. अब भी बांग्लादेश में सेकुलर लोग उसे याद करते हैं और पाकिस्तान के खिलाफ है. ऐसे में पाकिस्तान की गोद में ही बैठ जाना बांग्लादेश के लिए खतरनाक होगा. यही नहीं मक्का पैक्ट अब भी सैद्धांतिक बातें करता है, लेकिन उसकी शर्तें स्पष्ट नहीं हैं. ऐसे में पाकिस्तान की सहभागिता वाले किसी संगठन में आंख बंद करके शामिल होने के रिस्क भी हो सकते हैं.

बांग्लादेश की 'मक्का पैक्ट' वाली इच्छा पर क्या बोला भारत

भारत इस संबंध में बहुत चिंतित नहीं है क्योंकि उसकी अपनी रक्षा क्षमता काफी अधिक है और वह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में है. फिर भी इस पैक्ट पर भारत की नजरें बनी हुई हैं. बांग्लादेश के पैक्ट में शामिल होने की इच्छा पर जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से पूछा गया तो उन्होंने कहा-

'हमारी नजरें बनी हुई हैं. उन्होंने कहा कि हम पश्चिम एशिया में चल रहे घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं. फिलहाल इससे ज्यादा हम कुछ नहीं कह सकते.' 

रणधीर जायसवाल

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता

बता दें कि बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के सलाहकार हुमांयूं कबीर ने हाल ही में कहा था कि हम मक्का पैक्ट से जुड़ने को तैयार हैं. 

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