400 करोड़ की आबादी, 70 लाख सैनिक और 38 ट्रिलियन डॉलर की GDP... अगर BRICS एक देश होता तो कितना बड़ा होता?
दिल्ली में BRICS समिट होने वाली है. इसे लेकर पश्चिमी देशों तक हलचल है. आज के समय में दुनिया में दो बड़े संगठन- BRICS और G-7 हैं.
दिल्ली 12 और 13 सितंबर को किसी किले से कम नहीं होगी. पूरी दिल्ली में पुलिस के 15 हजार जवान और पैरामिलिट्री फोर्स की 200 कंपनियां तैनात रहेंगी. वजह है कि दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाली BRICS समिट. इसमें शामिल होने के रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी भारत आने वाले हैं.
दिल्ली में 14 साल बाद BRICS होने वाली है. इससे पहले 2012 में दिल्ली में BRICS हुई थी. वहीं, 2021 के बाद अब BRICS की मेजबानी भारत के पास फिर आई है. इन कुछ सालों में BRICS काफी बदल गया है. अब ये वो वाला BRICS नहीं रहा, बल्कि अब ये BRICS+ बन गया है. अब इसमें पहले की तरह 5 नहीं, बल्कि 11 देश हैं.
पिछले कुछ सालों में BRICS दुनिया के सबसे ताकतवर संगठन के रूप में उभरा है. अब इसकी तुलना 7 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के संगठन G-7 से होती है. कई मायनों में तो G-7 भी BRICS का मुकाबला नहीं कर पाता. ये समझ लीजिए कि आज अगर BRICS एक देश होता, तो आबादी, क्षेत्रफल और सेना के मामले में दुनिया में सबसे बड़ा होता. और क्या-क्या होता? ये भी जानेंगे, लेकिन उससे पहले जानते हैं कि BRICS और G-7 में कौन-कौन हैं?
दो बड़े संगठन, दो अलग दुनिया
आज दुनिया में दो बड़े संगठन- BRICS और G-7 हैं. G-7 में अमेरिका, यूके, जापान, इटली, जर्मनी, फ्रांस और कनाडा शामिल हैं, तो वहीं BRICS में 11 देश में हैं. इसमें कुछ देश हाल-फिलहाल में ही शामिल किए गए हैं.
शुरुआत में BRICS में सिर्फ चार देश- ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन ही थे. साल 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के दौरान चारों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, तब इसे BRIC नाम दिया गया था. 2009 में इस संगठन की पहली समिट हुई. 2010 में दूसरी समिट हुई और उसी साल इसमें साउथ अफ्रीका को शामिल किया. ऐसे में ये BRIC बन गया BRICS. इसमें B से ब्राजील, R से रूस, I से इंडिया, C से चीन और S से साउथ अफ्रीका.
2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी BRICS के सदस्य बन गए. फिर जनवरी 2025 में इंडोनेशिया इसमें शामिल हो गया. इसलिए आज इसे BRICS+ कहा जाता है.

इन 11 देशों के अलावा बेलारूस, बोलिविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम भी इसके पार्टनर हैं.
कुल मिलाकर, दोनों संगठन दो अलग दुनिया हैं. G-7 जहां दुनिया की 7 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का संगठन है तो वहीं BRICS में विकासशील देश हैं. एक तरफ G-7 में अमेरिका और उसके दोस्त हैं तो दूसरी तरफ BRICS में शामिल ज्यादातर देश अमेरिका के विरोधी हैं, जिनमें चीन और रूस बड़ा नाम है.
एक देश होता तो कैसा होता?
कोई देश कैसे बनता है? उसके लिए तीन बुनियादी चीजें जरूरी हैं. पहली- आबादी. दूसरा- इलाका. और तीसरा- अर्थव्यवस्था.
और BRICS इन तीनों ही मामलों में G-7 को पीछे छोड़ देता है. BRICS में शामिल 11 देशों में लगभग 4 अरब लोग रहते हैं. यानी, दुनिया की आबादी का 49% से भी ज्यादा. इसका मतलब हुआ कि दुनिया का हर दूसरा शख्स BRICS कंट्री में है. जबकि, G-7 देशों में लगभग 80 करोड़ लोग रहते हैं.
रही बात इलाके की तो BRICS के 11 देशों का कुल क्षेत्रफल 4.77 करोड़ वर्ग किलोमीटर है. यह दुनिया के कुल क्षेत्रफल का लगभग 32% है. यानी दुनिया का एक तिहाई क्षेत्रफल BRICS के पास है. वहीं, G-7 देशों का कुल क्षेत्रफल 2.11 करोड़ वर्ग किलोमीटर है, यानी BRICS के आधे से भी कम.
हालांकि, अर्थव्यवस्था के मामले में G-7 अभी BRICS से कहीं आगे है. IMF के आंकड़ों के मुताबिक, BRICS के 11 देशों की कुल जीडीपी 35.18 ट्रिलियन डॉलर है. दुनिया की 40% जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी है. जबकि, G-7 देशों की जीडीपी 55.32 ट्रिलियन डॉलर है, जो BRICS से 57% ज्यादा है.

सेना कितनी बड़ी होती?
कोई देश तो बन जाएगा लेकिन उसे सुरक्षित रखने के लिए सेना की जरूरत पड़ेगी. अगर BRICS एक देश बन जाए तो दुनिया में सबसे बड़ी सेना यहीं होगी.
globalmilitary.net के मुताबिक, अभी सबसे ज्यादा 20 लाख सैनिक चीन के पास हैं. फिर रूस के पास 11 लाख और भारत के पास 14.75 लाख सैनिक हैं. BRICS के सभी 11 देशों के पास 70.61 लाख से ज्यादा सैनिक हैं. इसकी तुलना में G-7 के पास 24 लाख सैनिक हैं. यानी, BRICS की सेना G-7 की तुलना में लगभग 3 गुना बड़ी है.
हालांकि, सैन्य विमानों के मामले में G-7 आगे होता. BRICS देशों के पास 17,654 विमान हैं, जबकि G-7 देशों के पास 17,899 विमान हैं.
वहीं, परमाणु हथियारों की बात करें तो BRICS और G-7 के 3-3 देश परमाणु ताकत हैं. BRICS के तीन देशों- चीन, रूस और भारत के पास 6,230 परमाणु हथियार हैं. वहीं, G-7 के 3 देशों- अमेरिका, फ्रांस और यूके के पास 5,637 हथियार हैं.

तेल और एनर्जी पर BRICS का ही दबदबा
दुनिया किस चीज पर टिकी है? तेल और एनर्जी. और इस पर किसका दबदबा है? BRICS का. दुनिया के 9 सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में से 6 BRICS के सदस्य हैं. इनमें सऊदी अरब, रूस, चीन, ब्राजील, ईरान और UAE है.
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के डेटा के मुताबिक, दुनियाभर में जितना तेल का उत्पादन होता है, उसमें से 38.6% उत्पादन सिर्फ BRICS के 6 सदस्य देशों में होता है. जबकि, टॉप-10 में 2 देश- अमेरिका और कनाडा हैं.
तेल उत्पादन के अलावा, BRICS के दो देश- चीन और भारत की दुनिया की रिफाइनिंग कैपेसिटी में भी बड़ी हिस्सेदारी है. भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा मुल्क है, जहां सबसे ज्यादा तेल रिफाइन किया जाता है.
इतना ही नहीं, रेयर अर्थ मिनरल्स पर भी BRICS का ही दबदबा है. अकेला चीन ही दुनिया के 80% से ज्यादा रेयर अर्थ मिनरल्स पर अपना कंट्रोल रखता है. ये वही मिनरल्स हैं, जिनसे आज की दुनिया चलती है. इसके अलावा, दुनिया के कारोबार में BRICS देशों की 46% हिस्सेदारी है.
अमेरिका और यूरोप जैसे पश्चिमी मुल्कों की चिंता इसलिए भी बढ़ रही है, क्योंकि BRICS देश अब आपस में कारोबार बढ़ा रहे हैं. 2003 में BRICS देशों के बीच 84 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था, जो बढ़कर 2024 में 1.17 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया.

क्या G-7 का मुकाबला कर पाएगा BRICS?
पिछले कुछ सालों में BRICS ने खुद को ताकतवर बनाया है. इसके 11 सदस्य हैं. 10 पार्टनर कंट्री हैं. कई और देशों ने BRICS के साथ जुड़ने में दिलचस्पी दिखाई है. लेकिन G-7 का मुकाबला कर पाना अभी भी थोड़ा मुश्किल है. उसकी वजह है- करंसी और फाइनेंशियल मार्केट पर G-7 का दबदबा.
दुनियाभर में कारोबार अमेरिकी डॉलर पर ही होता है. दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 56% है, जबकि यूरो की हिस्सेदारी 20% है. दशकों की बहस के बावजूद अभी भी कोई ऐसी करंसी नहीं आ सकी है जो डॉलर का मुकाबला कर सके.
कुछ सालों में BRICS ने सदस्य देशों के बीच लोकल करंसी में कारोबार करने का प्रस्ताव दिया है. कुछ देश अपनी-अपनी करंसी में कारोबार कर भी रहे हैं. इसके अलावा, इनके बीच 'BRICS करंसी' बनाने पर भी चर्चा हुई थी. हालांकि, भारत, ब्राजील, UAE और साउथ अफ्रीका जैसे देश इसके विरोध में हैं.
फाइनेंशियल मार्केट पर भी G-7 का ही दबदबा है. ग्लोबल बैंकिंग के लिए एक मैसेजिंग सिस्टम है- SWIFT, जो बेल्जियम में है. बेल्जियम भले ही G-7 का सदस्य न हो, लेकिन यूरोपीय देश होने के नाते अप्रत्यक्ष तौर से इससे जुड़ा है. दुनियाभर में 90% से ज्यादा इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन SWIFT से ही होते हैं. अगर किसी देश को इससे निकाल दिया जाए तो उसका ट्रांजैक्शन दुनिया से कट जाता है. 2022 में रूस को SWIFT से बाहर कर दिया गया था.
आज दोनों ही संगठन एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं. लेकिन ये भी सच है कि सबको सबका साथ चाहिए. विकासशील और गरीब देश जहां पश्चिम की सिक्योरिटी गारंटी चाहती है, तो वहीं पश्चिम को भी चीन और भारत जैसे बड़े बाजारों की जरूरत है.
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