अमेरिका मिडटर्म चुनाव 2026: अपने 'गढ़' भी हार गई ट्रंप की पार्टी, समझिए आखिर कैसे हुआ ये?

अमेरिका का मिडटर्म चुनाव कई मायनों में काफी अहम है. इसने अब तक के चुनावी गणित को बदलकर रख दिया है. डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के गढ़ों में डेमोक्रेट्स ने सेंध लगा दी है.

अमेरिका मिडटर्म चुनाव 2026: अपने 'गढ़' भी हार गई ट्रंप की पार्टी, समझिए आखिर कैसे हुआ ये?
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को इस चुनाव में हार के बाद हर फैसले के लिए डेमोक्रेट पार्टी का मुंह देखना पड़ेगा. (फोटो-AFP)

उत्तरी अमेरिका में पतझड़ के मौसम में एक अजीब सी शांति होती है. पतझड़ का सबसे सुखद पहलू पेड़ों की पत्तियों के बदलते रंग हैं. 3 नवंबर को 2026 के मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म्स) के लिए जब अमेरिकी मतदाता अपना फैसला सुनाने निकले, तो ये रंग आने वाले राजनीतिक मुकाबले के लिए एक सटीक रूपक की तरह लग रहे थे. एक तरफ तो कहानी कुछ और बयां की जा रही थी, लेकिन असल में रंगों ने कुछ और ही कहानी कह दी.

कैसा रहा चुनाव का रिजल्ट

पिछले कुछ हफ्तों तक चुनावी माहौल में रिपब्लिकन पार्टी का 'लाल' और डेमोक्रेटिक पार्टी का 'नीला' रंग छाया हुआ था, लेकिन रात होते-होते अमेरिकी चुनावी नक्शे पर सिर्फ एक ही रंग दिखाई दिया - नीला. वहीं, रिपब्लिकन खेमे में मायूसी छा गई. नतीजे सामने आ चुके हैं. डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया है. उन्होंने 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में 218 और सीनेट में 51 सीटों का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है. ये तो बस जीत के आंकड़े हैं, लेकिन अगर रुझानों की बात करें, तो डेमोक्रेट्स ने 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में 245 से ज्यादा और सीनेट में 54 सीटें पर बढ़त बना ली हैं. वे अलास्का और मिसिसिपी पर भी कब्जा कर सकते हैं, जिससे सीनेट में उनकी कुल सीटें 56 तक पहुंच सकती हैं.

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ये आंकड़े एक अच्छी कहानी तो बताते हैं, लेकिन पूरी कहानी नहीं कहते. आखिरकार, इस मामले में गणित केवल एक आंकड़े देता है, यह लोगों की भावनाओं को पूरी तरह से नहीं दर्शा पाता. भावनाओं को बयां करने के लिए शब्दों की जरूरत होती है, और मैं इस पूरी उलझन को समझाने के लिए लगभग 1000 शब्दों का सहारा लेने जा रहा हूं.

एक आम चुनावी साल में, डेमोक्रेट्स अपने पारंपरिक उदारवादी गढ़ों को बचाए रखते हैं, रिपब्लिकन भी अपने रूढ़िवादी गढ़ों में ऐसा ही करते हैं, और फिर असली मुकाबला शुरू होता है – उन अहम 'पर्पल स्टेट्स' (बैंगनी राज्यों) के लिए. यानी, नीले और लाल रंगों के मिश्रण में एक और रंग जोड़ लें – 'स्विंग स्टेट्स' (ऐसे राज्य जहां कभी कोई पार्टी जीतती है, तो कभी दूसरी). इन राज्यों को सिर्फ 'अनिश्चित' या 'बदलते मिजाज वाला' कहना काफी नहीं होगा; असल में ये वो राज्य हैं, जिन पर किसी एक पार्टी का स्थायी कब्ज़ा नहीं रहा है, या जहां हर चुनाव में पाला बदलता रहा है.

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यह चुनाव न केवल डेमोक्रेट्स द्वारा अपने गढ़ों को मजबूती से बचाने का मामला था, बल्कि उन्होंने रिपब्लिकन के उन किलों को भी भेद दिया, जिन्हें अभेद्य माना जाता था. चुनाव जीतने के लिए अपने पारंपरिक गढ़ों को बचाए रखना जरूरी है, किसी 'स्विंग स्टेट' को जीतना तारीफ के काबिल है; और अगर कई 'स्विंग स्टेट्स' जीत लिए जाएं, तो यह चुनावी राजनीति का एक अद्भुत कारनामा है. मगर, रिपब्लिकन को बैकफुट पर धकेलकर उन्हें अपने पारंपरिक रूढ़िवादी गढ़ों को बचाने के लिए मजबूर करना एक आक्रामक हमला है. और उससे भी हैरान करने वाली बात – रिपब्लिकन के मुख्य रूढ़िवादी गढ़ों को 'नीला' (डेमोक्रेट्स के पक्ष में) कर देना! यही बात इन मध्यावधि चुनावों (मिडटर्म्स) को अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना बनाती है.

रिपब्लिकन गढ़ में एक छोटा सा नीला निशान, जो रिपब्लिकन लोगों के दिलों में एक खंजर की तरह चुभता है. आइए इसे समझते हैं.

टेक्सास

कहा जाता है कि टेक्सास में सब कुछ बड़ा होता है, और यहां राजनीतिक दांव भी बहुत बड़े थे. डेमोक्रेट्स के लिए जो अहमियत कैलिफोर्निया और न्यूयॉर्क की है, वही लंबे समय से रिपब्लिकन के लिए टेक्सास की रही है - एक ऐसा राजनीतिक गढ़, जो अचानक आंशिक रूप से 'नीला' (डेमोक्रेटिक) हो गया. चुनाव से पहले टेक्सास पर अपनी रिपोर्टिंग में, मैंने ह्यूस्टन और ऑस्टिन को 'टमाटर के सूप में ब्लूबेरी' की तरह बताया था—यानी रूढ़िवादी इलाकों के बीच उदारवादी जगहें.

हालात तब बदले जब जेम्स टालारिको ने सीनेट के चुनाव में टेक्सास के अटॉर्नी जनरल केन पैक्सटन को हरा दिया. पैक्सटन ने खुद रिपब्लिकन प्राइमरी में मौजूदा सीनेटर जॉन कॉर्निन (जो सीनेट इंडिया कॉकस के सह-अध्यक्ष भी हैं) को हराया था, इसलिए पैक्सटन को हराना कोई आसान काम नहीं था. टालारिको के सामने मौजूद इस बेहद मुश्किल चुनौती को ऐसे समझा जा सकता है, टेक्सास से सीनेट के लिए चुने जाने वाले आखिरी डेमोक्रेट लॉयड बेंटसेन थे, जो 1988 में माइकल डुकाकिस के साथ उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे. डुकाकिस को टेक्सास के ही रहने वाले जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश (जो उस समय उपराष्ट्रपति थे) से हार का सामना करना पड़ा था, और बाद में बुश ही व्हाइट हाउस पहुंचे.

अगर 1988 बहुत पुरानी बात लगती है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि यह सचमुच जेम्स टालारिको की पूरी उम्र के बराबर है. चुने गए सीनेटर का जन्म 1989 में हुआ था. पता चला है कि टालारिको डोसा भी पलट सकते हैं और सीनेट की सीट भी! हालांकि, 'लोन स्टार स्टेट' (टेक्सास) में वे अकेले 'स्टार' नहीं थे.

राज्य के इतिहास में पहली बार, जीना हिनोजोसा ने ग्रेग एबॉट को हराया, जो गवर्नर के तौर पर अपना चौथा कार्यकाल चाह रहे थे. हिनोजोसा टेक्सास की पहली लैटिना गवर्नर बनीं. साथ ही, वे एन रिचर्ड्स के बाद पहली महिला डेमोक्रेटिक गवर्नर भी हैं. एन रिचर्ड्स 1991 से 1995 तक गवर्नर रहीं, जिसके बाद जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने उन्हें हरा दिया था—वही बुश, जिनका नाम अमेरिकी राष्ट्रपतियों की सूची में दर्ज है.

और तब से, रिपब्लिकनों ने टेक्सास के शहरों को पूरी तरह से 'लाल' (रिपब्लिकन पार्टी का रंग) कर दिया है—चुनाव के नक्शे के हिसाब से देखा जाए तो सचमुच ऐसा ही है. हालांकि राज्य की राजनीतिक निष्ठा नहीं बदली है, लेकिन अगर कट्टर रूढ़िवादी यह मानने से इनकार करें कि डेमोक्रेट्स ने यहां अपनी पैठ काफी मजबूत कर ली है, तो मुझे सच में हैरानी होगी.

कैनसस

'कैनसस के साथ क्या दिक्कत है?' - यह 2004 में थॉमस फ्रैंक की लिखी एक किताब का शीर्षक था. इसमें उन्होंने यह सवाल उठाया था कि कैसे सांस्कृतिक रूढ़िवाद ने मतदाताओं को अपने आर्थिक हितों के बावजूद रिपब्लिकन का समर्थन करने के लिए राजी कर लिया. 2026 में, रिपब्लिकन खुद से यही सवाल पूछ रहे हैं.

अगर आपको लगता है कि टेक्सास में डेमोक्रेट सीनेटर हुए काफी समय हो गया है, तो कैनसस का जवाब है - 'जरा हमारा हाल तो देखिए!' यूनाइटेड मेथोडिस्ट मेगाचर्च के पादरी एडम हैमिल्टन ने मौजूदा रिपब्लिकन सीनेटर रोजर मार्शल को हरा दिया. अमेरिकी इतिहास और संस्कृति में 'हैमिल्टन' नाम का काफी सम्मान है. अब डेमोक्रेटिक पार्टी के इतिहास में भी उनका नाम दर्ज हो गया है, क्योंकि वे 1932 (यानी लगभग एक सदी पहले) के बाद कैनसस से अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले डेमोक्रेट बन गए हैं.

हैमिल्टन ने केवल अपने चर्च के अनुयायियों को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि उनकी जीत यह दिखाती है कि अगर डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रूढ़िवादी इलाकों में वहां की भाषा (जिसमें आस्था की भाषा भी शामिल है) में बात करें, तो वे वहां भी मुकाबला कर सकते हैं. संयम और उदारता का संदेश देने वाले इस पादरी को अपने चर्च के बाहर भी बड़ी संख्या में समर्थक मिले. रिपब्लिकन पार्टी के लिए, अमेरिका के इस कृषि-प्रधान क्षेत्र (जिसे 'ब्रेडबास्केट' कहा जाता है) में कोई 'सपनों की दुनिया' नहीं दिखी.

आयोवा

कंसास और आयोवा में भी वैसी ही आर्थिक परेशानी देखने को मिली, जिसके चलते जोश ट्यूरेक सीनेट के लिए चुने गए और रॉब सैंड गवर्नर बने. इन मिडवेस्ट राज्यों को डोनाल्ड ट्रंप की तीखी बयानबाजी से कहीं ज्यादा नुकसान उनकी व्यापार नीतियों से हुआ. टैरिफ (आयात शुल्क) की मार सोयाबीन किसानों पर बुरी तरह पड़ी, आयातित मशीनों की लागत बढ़ गई, और जवाबी टैरिफ के कारण कंसास और आयोवा की फसलों के लिए निर्यात बाजार सिकुड़ गए.

इस तरह, कृषि प्रधान इलाकों में रिपब्लिकन पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा और ट्रंप तथा उनके सहयोगियों को पूरी तरह से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

ओहायो

ओहायो और राष्ट्रपति चुनावों के मामले में एक बहुत ही सरल नियम था: यहां जीतें और व्हाइट हाउस (राष्ट्रपति पद) जीतें. कभी देश के चुनावी रुझान तय करने वाला यह राज्य, 1964 में लिंडन बी. जॉनसन से लेकर 2016 तक, हर बार उसी उम्मीदवार को चुनता रहा जो राष्ट्रपति बना. हालांकि, 2020 में एक अपवाद देखने को मिला—जो बाइडेन ओहायो हार गए, लेकिन फिर भी राष्ट्रपति चुनाव जीत गए.

कभी यह एक अहम 'स्विंग स्टेट' (निर्णायक राज्य) हुआ करता था, लेकिन बाद में यह पूरी तरह से रिपब्लिकन गढ़ बन गया. यहां तीन बार के सीनेटर शेरोड ब्राउन को हार का सामना करना पड़ा. ब्राउन 2024 में अपनी पिछली सीनेट दौड़ हार गए थे, लेकिन उन्होंने वापसी की कोशिश की. उनका मुकाबला जॉन हस्टेड से था, जिन्हें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के खाली किए गए पद पर नियुक्त किया गया था.

गवर्नर पद के चुनाव में प्रमुख भारतीय-अमेरिकी व्यवसायी विवेक रामास्वामी पर एमी एक्टन की जीत से कांग्रेस में सीटों की संख्या तो नहीं बदली, लेकिन यह मतदाताओं की सोच और 'MAGA' (मागा) समर्थित उम्मीदवारों के खिलाफ बढ़ते विरोध को जरूर दर्शाती है.

रामास्वामी के चुनाव प्रचार अभियान की आलोचना हुई, क्योंकि उन्होंने एक विवादित विज्ञापन चलाया था जिसमें एक्टन की उनसे अलग रह रहीं मां को दिखाया गया था. इस पर न केवल डेमोक्रेट्स ने, बल्कि उनकी अपनी पार्टी, रिपब्लिकन के साथियों ने भी सवाल उठाए. लेकिन, 'बीटल्स' बैंड के एक गाने की तर्ज पर कहें तो, रामास्वामी को "अपने दोस्तों से थोड़ी मदद" मिल गई; उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ओहियो के ही रहने वाले उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का सहारा लिया.

साउथ कैरोलिना

'बाइबल बेल्ट' (धार्मिक रूप से रूढ़िवादी क्षेत्र) में, साउथ कैरोलिना ने रिपब्लिकन पार्टी के गढ़ में एक और दरार दिखा दी है. इस राज्य ने पिछले तीन दशकों में किसी डेमोक्रेट सीनेटर को नहीं चुना था. डार्लिन ग्राहम ने अपने भाई लिंडसे ग्राहम की जगह ली है. लिंडसे ग्राहम, जो सीनेटर थे, ने साढ़े 23 साल तक सेवा दी थी, लेकिन जुलाई में अचानक उनका निधन हो गया.

उनकी जगह, बच्चों की डॉक्टर (पीडियाट्रिशियन) एनी एंड्रयूज ने 1998 के बाद से यहां डेमोक्रेट्स को सीनेट में पहली जीत दिलाई. वह साउथ कैरोलिना राज्य से चुनी जाने वाली पहली महिला सीनेटर बन गईं. डेमोक्रेट्स के लिए यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसी उन्हें जरूरत थी. उनका डायग्नोसिस बहुत सीधा था, रिपब्लिकन पार्टी के इस गढ़ को एक नए 'नुस्खे' की जरूरत थी. आखिरकार, बड़ी संख्या में लोगों ने उनके पक्ष में अपनी सहमति दी.

जॉर्जिया

अटलांटा को 'दक्षिण का हॉलीवुड' कहा जाता है, लेकिन मौजूदा सीनेटर जॉन ओसॉफ के लिए यहां कोई ड्रामा नहीं हुआ; उन्होंने माइक कॉलिन्स को हराकर सीनेट में अपना दूसरा कार्यकाल हासिल किया. हालांकि, पटकथा लेखकों के लिए यहां एक दिलचस्प मोड़ जरूर था—अटलांटा की पूर्व मेयर कीशा लांस बॉटम्स, जॉर्जिया में गवर्नर के पद पर चुनी जाने वाली पहली महिला और पहली अश्वेत व्यक्ति बन गईं. पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से गवर्नर के पद पर रिपब्लिकन पार्टी का कब्जा था.

यह एक ऐसा राज्य है जो अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन (सिविल राइट्स मूवमेंट) से गहराई से जुड़ा हुआ है; यह मार्टिन लूथर किंग जूनियर की जन्मस्थली भी है. ओसॉफ का खुद भी नागरिक अधिकार आंदोलन से गहरा व्यक्तिगत जुड़ाव रहा है. उन्होंने कांग्रेसमैन जॉन लुईस के साथ इंटर्नशिप की थी, जो एक प्रमुख नागरिक अधिकार कार्यकर्ता थे और बाद में ओसॉफ के मेंटर (मार्गदर्शक) बने—उस समय ओसॉफ राजनीति में अपने शुरुआती कदम रख रहे थे.

मिसिसिपी

फिल्मों और दक्षिण की बात करें तो, फिल्म निर्माता मीरा नायर (न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी की मां) द्वारा निर्मित फिल्म 'मिसिसिपी मसाला' नस्ल, दक्षिण और रिश्तों जैसे विषयों पर आधारित है. आमतौर पर रिपब्लिकन के गढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में यह अप्रत्याशित रूप से रोमांचक मुकाबला है. स्कॉट कोलम मौजूदा सांसद सिंडी हाइड-स्मिथ के लिए चुनौती पेश कर रहे हैं, क्योंकि (लिखते समय) मुकाबला इतना करीबी है कि किसी को भी विजेता घोषित करना मुश्किल है और जीत-हार का अंतर बहुत कम है. जैसा कि मैंने NDTV के लिए बताया था, यह फिल्म दक्षिण के डेमोक्रेट्स के लिए एक मिसाल बन सकती है.

मिशिगन

मिशिगन ने अमेरिका को पहियों पर लाने में मदद की. डेट्रॉइट अमेरिका की ऑटोमोबाइल राजधानी है और यहां फोर्ड, जनरल मोटर्स और क्रिसलर जैसी कंपनियों के मुख्यालय हैं. अब, इस राज्य में डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगियों के लिए हालात उल्टे हो रहे हैं.

एक और ऐतिहासिक घटनाक्रम में, अब्दुल अल-सैयद ने माइक रोजर्स को हराया और कांग्रेस के इतिहास में पहले मुस्लिम सीनेटर के रूप में अपना नाम दर्ज कराया. मिस्र से आए प्रवासियों के बेटे और पूर्व जन-स्वास्थ्य अधिकारी, अल-सैयद ने गैरी पीटर्स की सीट को डेमोक्रेट्स (ब्लू) के पास ही बनाए रखा. गौरतलब है कि मिशिगन के डियरबॉर्न शहर में 54.5% निवासी मध्य-पूर्वी या उत्तरी अफ्रीकी मूल के हैं. अल-सैयद की जीत इस धारणा को भी गलत साबित करती है कि डेमोक्रेट्स अब मध्यमार्गी हो गए हैं. अल-सैयद पूरी तरह से प्रगतिशील हैं और उन्होंने राजनीति में बड़े पैसे के प्रभाव को भी चुनौती दी. इस तरह, अमेरिका के ऑटोमोबाइल उद्योग के केंद्र में, डेमोक्रेट्स ने जीत की रफ्तार तेज कर दी है.

अलास्का

और उत्तर की ओर, अलास्का में एक ऐसा राजनीतिक ड्रामा देखने को मिला जो किसी लोकप्रिय टीवी सीरियल जैसा था: 'द सुलिवन्स'. रिपब्लिकन सीनेटर डैन एस. सुलिवन का मुकाबला डेमोक्रेट मैरी पेल्टोला से था, जिसमें एक जाना-पहचाना नाम और एक अनोखी रणनीति शामिल थी.

बैलेट पेपर पर अचानक एक और व्यक्ति का नाम आ गया - डैनियल जे. सुलिवन जूनियर - जिसका नाम मौजूदा उम्मीदवार (डैन एस. सुलिवन) से मिलता-जुलता था. इससे राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन नाराज हो गए. उन्होंने आरोप लगाया कि पेल्टोला के कैंपेन ने मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए कोई राजनीतिक चाल चली है. नामों का यह मामला अपने आप में एक कहानी बन गया; फिलहाल, चुनाव का नतीजा अभी तय नहीं हुआ है.

इस चुनाव का सबसे बड़ा सबक?

डेमोक्रेट्स ने महंगाई, जीवन-यापन की लागत, ऊर्जा की कीमतें, स्वास्थ्य सेवा, आप्रवासन और कभी न खत्म होने वाले युद्धों को रोकने जैसे मुद्दों के जरिए एक साझा एजेंडा तैयार किया. अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग उम्मीदवारों ने यही संदेश अपनी स्थानीय भाषा और लहजे में लोगों तक पहुंचाया, जिससे वहां के समुदाय खुद को इससे जुड़ा हुआ महसूस कर सके. कैनसस में पादरी हैमिल्टन वहां के लोगों के अपने जैसे ही हैं, और डियरबॉर्न में अल-सैयद वहां के समर्थकों के लिए बेहद करीबी (हबीबी) हैं. अमेरिका कोई एक जैसी या एक समान जगह नहीं है, और न ही सभी उम्मीदवार एक जैसे हैं. शायद यह बस हर जगह के हिसाब से सही उम्मीदवार चुनने की बात थी, या फिर बिल क्लिंटन के 1992 के मशहूर राष्ट्रपति चुनाव वाले नारे को याद करें तो - "बात इकॉनमी (अर्थव्यवस्था) की है, बेवकूफ!"