Opinion| तुर्किए को F-35 फाइटर जेट देने पर ट्रंप का 'यू-टर्न', कैसे भारत के लिए है बड़ी मुश्किल
अगर ट्रंप का यह F-35 वाला फैसला हकीकत में बदलता है, तो इससे न सिर्फ पश्चिम एशिया का सुरक्षा ढांचा बदलेगा बल्कि इजरायल की फौजी बढ़त भी कमजोर होगी. ये भारत के लिए भी नई मुश्किलें खड़ी करेगा.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में तुर्किए पर लगे प्रतिबंधों को हटाने का ऐलान किया है. इसके साथ ही उन्होंने तुर्किए को अमेरिका के सबसे आधुनिक पांचवीं पीढ़ी के F-35 फाइटर जेट देने का इशारा भी किया है. सालों पहले जब तुर्किए ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था, तब अमेरिका ने नाराज होकर उसे इस फाइटर जेट प्रोग्राम से बाहर कर दिया था.
इसके अलावा, अमेरिका अब तुर्किए के अपने लड़ाकू विमान 'कान' के लिए इंजन देने पर भी विचार कर सकता है. खबर है कि तुर्किए शुरुआत में ऐसे छह जेट विमान चाहता है. ट्रंप ने इस नीति में बड़े बदलाव का ऐलान 8 जुलाई, 2026 को अंकारा में हुए नाटो समिट के दौरान तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान के साथ किया. हालांकि, ट्रंप के इस फैसले का अमेरिकी संसद में भारी विरोध होना तय है.
इस बड़े भू-राजनीतिक फैसले से इजरायल और ग्रीस के कान खड़े हो गए हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस संभावित सौदे और इंजन सप्लाई का कड़ा विरोध किया है. वे इस डील को रुकवाने के लिए लगातार पैरवी कर रहे हैं. उनका कहना है कि तुर्किए को F-35 मिलने से मध्य पूर्व में ताकत का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा.
पिछले साल 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान तुर्किए ने पाकिस्तान के लिए बकायदा फौजी सामान से भरे कार्गो विमान भेजे थे. यह सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ बैक-चैनल बातचीत और कूटनीति के लिए पाकिस्तान को एक अहम जरिया चुना है.
ट्रंप ने पाकिस्तान की इस मध्यस्थता की जमकर तारीफ की है और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ अपने बेहतरीन निजी ताल्लुकात का खुलकर प्रदर्शन भी किया है.
दुनिया का सबसे बेहतरीन फाइटर जेट F-35
लॉकेहीड मार्टिन कंपनी के F-35 लाइटनिंग II को आज की तारीख में दुनिया का सबसे बेहतरीन और हरफनमौला पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट माना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी इसके आधुनिक सेंसर और पूरी दुनिया में फैली इसकी प्रोडक्शन लाइन है.
इस जेट के कंप्यूटर चारों तरफ लगे कैमरों, राडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम से डेटा जुटाकर पायलट के सामने दुश्मन के इलाके की ऐसी मुकम्मल तस्वीर रख देते हैं कि दुश्मन को भनक तक नहीं लगती.
इसका राडार क्रॉस-सेक्शन (रडार की पकड़ में आने वाला हिस्सा) एक गोल्फ की गेंद जितना छोटा है, जिसकी वजह से यह दुश्मन के इलाके में घुसकर हमला कर सकता है और दुश्मन के आधुनिक रडार भी इसे देख नहीं पाते.
F-35 ने मध्य पूर्व, यूरोप और भूमध्य सागर में दुश्मन के एयर डिफेंस को तबाह करने और ड्रोन को मार गिराने में अपनी ताकत का लोहा मनवाया है.
अब तक अमेरिका पूरी दुनिया में 1,340 से ज़्यादा F-35 जेट डिलीवर कर चुका है. दस देश इस समय इसे उड़ा रहे हैं, जबकि 11 और देशों ने इसका ऑर्डर दे रखा है. वैसे तो हर साल औसतन 156 विमान बनते हैं, लेकिन पिछले साल रिकॉर्ड 191 जेट डिलीवर किए गए, जिससे सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की वजह से अटका पुराना बैकलॉग साफ हो गया.
इसकी मुख्य फैक्ट्री टेक्सास के फोर्ट वर्थ में है, जबकि इटली और जापान में भी इसके असेंबली प्लांट हैं. इसके तीन रूप हैं. पहला F-35A (सामान्य टेकऑफ), दूसरा F-35B (कम जगह से उड़ने और सीधे जमीन पर उतरने वाला) और तीसरा F-35C (नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए).
वहीं चीन का चेंगदू J-20 'माइटी ड्रैगन' लंबी दूरी के हमलों के लिए बनाया गया है, हालांकि उसकी असली ताकत अब भी एक राज है.
चीनी वायुसेना के पास ऐसे 300 से ज्यादा J-20 विमान हैं. रूस का सुखोई Su-57 भी हवा में काफी फुर्तीला और सस्ता है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसकी रडार से बचने की क्षमता और तकनीक पश्चिमी देशों के F-35 के मुकाबले कमजोर है. 2026 के मध्य तक रूस ने ऐसे करीब 44 विमान बनाए हैं.
इस बीच, चीन का एक और पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट, शेनयांग J-35, अब तेजी से बन रहा है और चीन की थल सेना और नौसेना दोनों में शामिल हो चुका है. पाकिस्तान ने भी इसके एक्सपोर्ट वेरिएंट (J-35AE) के 40 विमान खरीदने के लिए चीन के साथ शुरुआती समझौता कर लिया है.
वॉशिंगटन का मिजाज आखिर क्यों बदल गया?
शुरुआत में अमेरिका ने तुर्किए को F-35 देने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि तुर्किए ने रूस से S-400 मिसाइल सिस्टम खरीद लिया था.
वॉशिंगटन की दलील थी कि अगर तुर्किए रूसी सिस्टम और अमेरिकी F-35 को एक साथ चलाएगा, तो इस खुफिया जेट की तकनीक और कमियां मॉस्को (रूस) को पता चल सकती हैं.
इसी वजह से 2019 में तुर्किए को इस प्रोग्राम से निकाल दिया गया था. बाद में अमेरिकी कांग्रेस ने भी शर्त लगा दी कि जब तक तुर्किए के पास S-400 है, उसे F-35 नहीं मिल सकता. इसके बावजूद, तुर्किए ने 2019 से लेकर आज तक इस शर्त को पूरा करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया.
उल्टा, पिछले कुछ समय में तुर्किए ने इजरायल के खिलाफ अपनी बयानबाजी तेज कर दी है, ग्रीस की संप्रभुता को चुनौती दी है, उत्तरी साइप्रस में अपनी फौज का कब्जा मजबूत किया है और यूरोप को भी डराने-धमकाने की कोशिश की है.
यही नहीं, तुर्किए टेलीकॉम जैसे अहम सेक्टर्स में चीन के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ा रहा है. याद रहे, चीनी कंपनी हुवावे और 5G तकनीक की वजह से ही अमेरिका ने कभी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को F-35 देने से मना कर दिया था. वही नियम तुर्किए पर भी लागू होना चाहिए.
भारत की सिरदर्दी
तुर्किए और पाकिस्तान का फौजी और एविएशन गठजोड़ अब एक मजबूत रणनीतिक रिश्ते में बदल चुका है. दोनों देश मिलकर तकनीक साझा कर रहे हैं और तुर्किए के 'KAAN' स्टील्थ फाइटर जेट पर काम कर रहे हैं. इसके अलावा, पाकिस्तान ने तुर्किए के मशहूर बायरकटार TB2 ड्रोन खरीदे हैं और 'अंका' ड्रोन को दोनों देश मिलकर बना रहे हैं.
पाकिस्तानी इंजीनियर तुर्किए की एरोस्पेस इंडस्ट्रीज (TAI) के साथ काम करके अगली पीढ़ी के विमानों की बारीकियां सीख रहे हैं. पाकिस्तान ने तुर्किए के ड्रोनों को अपनी फौज में बड़े पैमाने पर शामिल कर लिया है.
तुर्किए की कंपनी TAI और पाकिस्तान की नेस्कॉम (NESCOM) के बीच हुए समझौतों का मकसद मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ने वाले 'अंका' ड्रोन का मिलकर उत्पादन करना है. पाकिस्तान ने अपनी वायुसेना को आधुनिक बनाने के लिए तुर्किए की 'केमानकेस'क्रूज मिसाइलें भी खरीदी हैं. दोनों देशों की वायुसेनाओं के बड़े अफसरों की मुलाकातें अक्सर होती रहती हैं, जहां वे जॉइंट ट्रेनिंग और नई तकनीकों पर साथ काम करने का इरादा दोहराते हैं.
यह गठजोड़ दक्षिण एशिया की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है, क्योंकि इससे पाकिस्तान को गैर-पश्चिमी तकनीक मिल रही है जिससे वह अपनी हवाई और ड्रोन ताकत को आधुनिक बना रहा है.
फौजी एक्सपर्ट्स का मानना है कि तुर्किए की ड्रोन तकनीक और चीन के आधुनिक सेंसर मिलकर पाकिस्तान को जंग के मैदान में (C4ISR क्षमता में) बढ़त दिला सकते हैं. पिछले कुछ सालों में अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों और पड़ोस के हालात की वजह से तुर्किए और पाकिस्तान फौजी तौर पर एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए हैं.
पिछले साल 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान तुर्किए ने पाकिस्तान का फौजी और राजनयिक स्तर पर खुलकर साथ दिया था. तुर्किए ने पाकिस्तान को 350 से ज़्यादा ड्रोन भेजे, जिनमें बायरकटार TB2, YIHA और सोंगार (Songar) जैसे घातक ड्रोन शामिल थे.
ग्रीस और इजरायल भी परेशान
ग्रीस इस डील के सख्त खिलाफ है. उसका कहना है कि इससे इलाके का संतुलन बिगड़ जाएगा. तुर्किए और ग्रीस दोनों भले ही नाटो के सदस्य हैं, लेकिन समुद्री सीमा, हवाई क्षेत्र और द्वीपों के सैन्यीकरण को लेकर दोनों के बीच पुराना विवाद है, जो कभी-कभी खुली धमकी तक पहुंच जाता है.
ग्रीस ने खुद जुलाई 2024 में 20 F-35A विमानों का ऑर्डर दिया था. इनकी डिलीवरी 2028 के आखिर में शुरू होगी. ग्रीस का कहना है कि तुर्किए को F-35 देने से पूर्वी भूमध्य सागर में हथियारों की एक नई होड़ शुरू हो जाएगी. तुर्किए के इस खतरे से निपटने के लिए ग्रीस ने फ्रांस से राफेल जेट खरीदे हैं और अमेरिकी F-35 डील को जल्द से जल्द पूरा करने में जुटा है.
इजरायल के लिए भी यह सौदा एक बड़ा झटका है, क्योंकि इससे मध्य पूर्व में उसकी हवाई बादशाहत को खतरा पैदा हो सकता है. इजरायल की सुरक्षा का सबसे बड़ा नियम यही है कि इलाके में उसकी फौजी ताकत सबसे ऊपर रहे.
प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने सीएनएन को दिए इंटरव्यू में साफ कहा कि तुर्किए पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके संबंध हमास और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठनों से हैं.
भले ही वॉशिंगटन ने अभी आखिरी फैसला न लिया हो, लेकिन इजरायल में अब इस बात पर बहस छिड़ गई है कि अगर अमेरिका और तुर्किए के रिश्ते बदलते हैं, तो इजरायल को पूरे क्षेत्र में अपनी सुरक्षा रणनीति पर नए सिरे से सोचना होगा.
तुर्किए-पाकिस्तान गठजोड़ का भारत पर असर
एक ताकतवर और आक्रामक तुर्किए भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां खड़ी कर रहा है. नई दिल्ली तुर्किए के बढ़ते प्रभाव, खासकर पाकिस्तान के साथ उसकी फौजी दोस्ती, मध्य पूर्व और हॉर्न ऑफ अफ्रीका में उसके अरमान पर पैनी नजर रखे हुए है.
इस दोस्ती के भारत के लिए कई मायने हैं. तुर्किए आज पाकिस्तान को हथियार देने वाला सबसे बड़ा देश बन चुका है. दोनों के बीच लड़ाकू विमानों, ड्रोन और नौसेना के युद्धपोतों को लेकर हो रहे समझौते भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा हैं. इसके अलावा, तुर्किए कश्मीर के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा पाकिस्तान का राग अलापता है.
पाकिस्तान और अजरबैजान के साथ तुर्किए के इस त्रिकोण को काटने के लिए भारत ने अब तुर्किए के क्षेत्रीय दुश्मनों से हाथ मिला लिया है.
भारत ने पूर्वी भूमध्य सागर में भी अपनी नौसेना की मौजूदगी और कूटनीति तेज कर दी है, जहां तुर्किए अपना दबदबा बनाना चाहता है. भारत जिस 'इंडिया-मिडिल ईस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर' (IMEC) का समर्थन कर रहा है, वह जानबूझकर तुर्किए को छोड़कर अरब देशों के रास्ते यूरोप जाता है.
राष्ट्रपति एर्दोगान का वैश्विक इस्लामिक एकजुटता पर जोर देना और भारत की घरेलू नीतियों की आलोचना करना दोनों देशों के बीच अविश्वास की बड़ी वजह है.
हाल के सालों में भारत ने ग्रीस, साइप्रस और इजरायल जैसे देशों के साथ रिश्ते बहुत मजबूत किए हैं, क्योंकि इन सभी के तुर्किए के साथ गहरे विवाद हैं. भारत अब ग्रीस और इजरायल के साथ मिलकर हवाई युद्ध, नौसैनिक तालमेल और स्पेशल फोर्सेज के बड़े सैन्य अभ्यास करता है. इस पूरे मामले में 'पाकिस्तान फैक्टर' ही सबसे बड़ी रुकावट है. हालांकि, इजरायल आज भी भारत के मिलिट्री एविएशन और रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में एक बेहतरीन साझेदार बना हुआ है.
ऐसे में भारत के पास एक ही रास्ता है कि वह अपनी फौजी ताकत को इतनी मजबूत करे कि दुश्मन हमला करने की हिम्मत ही न जुटा पाए. भारत को चाहिए कि वह पश्चिम एशिया और पूर्वी भूमध्य सागर में अपनी साझेदारियां और मजबूत करे और तब तक इंतजार करे जब तक ट्रंप के मिजाज का यह दौर गुजर न जाए.
(लेखक एक रिटायर्ड एयर मार्शल हैं)
डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.
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