पहाड़ दरकते हैं, ग्लेशियर टूटते हैं और फिर नेपाल जैसी त्रासदी... हिमालय रीजन के डैम क्यों बन रहे खतरा?
सवाल यही है कि साफ ऊर्जा के लिए भी बनाए जा रहे प्रोजेक्ट क्या इतने जरूरी हो चुके हैं कि उसके लिए पहाड़ों की संरचना के साथ खिलावाड़ किया जाए या फिर प्रकृति को चुनौती दी जाए?
चीन-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर टूटने की वजह से जो जल प्रलय आई है, उसने नेपाल में तबाही का एक ऐसा मंजर दिखाया है जहां 900 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और 3,000 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं.
नेपाल में आई यह जल प्रलय एक प्राकृतिक आपदा है. ग्लेशियर टूटने की वजह से यह हादसा हुआ है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसके लिए सिर्फ प्रकृति को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इंसानों ने जिस तरह विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन किया है, वह भी इस तरह की आपदाओं के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हो सकता है.
सबसे पहले समझने की कोशिश करते हैं कि हिमालय का पूरा क्षेत्र किस तरह बना हुआ है. हिमालय का इलाका ग्लेशियरों से बनी झीलों, तेज बहने वाली नदियों और खड़ी पहाड़ियों से बना है. यानी यह पूरा क्षेत्र भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है. इसके अलावा भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा भी लगातार बना रहता है.
जलवायु परिवर्तन का असर भी हिमालय क्षेत्र में ज्यादा देखने को मिलता है. 2022 में नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह से हिमालय क्षेत्र पर गंभीर परिणाम देखने को मिल रहे हैं. यह पूरा क्षेत्र अभूतपूर्व गर्मी का भी सामना कर रहा है.
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह से हिमालय क्षेत्र में एक नहीं, बल्कि सैकड़ों अस्थायी झीलें बन चुकी हैं. इन झीलों के अचानक टूटने की वजह से ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. हिमालय क्षेत्र पहले ही काफी संवेदनशील है. इसके ऊपर जब यहां बड़े स्तर पर निर्माण कार्य होता है तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
यह समझने की जरूरत है कि डैम और जलाशय पानी के बहाव को नियंत्रित करने में मदद जरूर करते हैं. इसकी वजह से दूर-दराज के इलाकों तक पानी की सप्लाई होती है और बिजली भी पहुंचती है. लेकिन इन डैम को बनाने में जिस प्रक्रिया का पालन किया जाता है, वही आगे चलकर किसी बड़े खतरे की वजह बन सकती है.
असल में किसी भी डैम को बनाने के लिए बड़े स्तर पर ड्रिलिंग करनी पड़ती है, सुरंगों की खुदाई करनी पड़ती है और यह सब बड़े-बड़े पहाड़ों के बीच किया जाता है. इससे उस क्षेत्र की जमीन और पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना कमजोर हो सकती है. ऐसे में अगर भूकंप आता है तो नुकसान ज्यादा हो सकता है.

इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत से जुड़ी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 के बाद से पूरे तिब्बत क्षेत्र में 193 डैम का निर्माण हो चुका है और कई अलग-अलग चरणों में है. कुछ रिपोर्ट्स में तो यह भी कहा गया है कि असल संख्या 300 से ज्यादा डैम की हो सकती है.
जिस नेपाल में यह त्रासदी आई है, वहां भी इस समय कई ऐसे प्रोजेक्ट चल रहे हैं जो पहाड़ों की नींव को कमजोर कर सकते हैं. नेपाल के हाइड्रोपावर डेटाबेस में 570 से ज्यादा प्रोजेक्ट अलग-अलग चरणों में दर्ज हैं. अब ऐसा नहीं है कि सिर्फ साफ ऊर्जा के लिए ही हिमालय क्षेत्र में डैम का निर्माण हो रहा है.
पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि देशों के बीच एक तरह की प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है, जहां बड़े-बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी ताकत और मौजूदगी के संकेत देने की कोशिश हो रही है.
उदाहरण के तौर पर, नवंबर 2020 में चीन की सरकारी कंपनी पावर कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन ऑफ चाइना ने यारलुंग त्सांगपो नदी पर एक बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की योजना का ऐलान किया था. इस प्रोजेक्ट की बिजली बनाने की क्षमता 60 गीगावाट तक है. इसके तुरंत बाद भारत ने भी सियांग नदी पर 10 गीगावाट का प्रोजेक्ट बनाने का ऐलान कर दिया.
सियांग, यारलुंग त्सांगपो नदी की मुख्य सहायक नदी है. भारत ने तर्क दिया था कि चीन के हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से पैदा होने वाले संभावित खतरे को कम करने के लिए भारत भी अपने यहां निर्माण कर रहा है.
जानकार मानते हैं कि इस तरह की क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा की वजह से भी हिमालय में ज्यादा से ज्यादा डैम का निर्माण हो रहा है और इसका खतरा पर्यावरण और स्थानीय लोगों पर पड़ रहा है.
पिछले कुछ सालों में भारत ने हिमालय के क्षेत्र में कई बड़े टनल और रेलवे प्रोजेक्ट्स भी शुरू किए हैं. ये प्रोजेक्ट पहाड़ों के बीच से गुजरते हैं. इनके जरिए सेना और दूसरे जरूरी संसाधनों को इस क्षेत्र तक पहुंचाना आसान हो सकता है. इसके अलावा भारत 11,200 मेगावाट की एक बड़ी डैम परियोजना पर भी काम कर रहा है.
जानकार यह भी मानते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से आने वाले समय में बिजली की मांग काफी बढ़ने वाली है. बड़े-बड़े AI डेटा सेंटरों को बहुत ज्यादा बिजली की जरूरत होती है. ऐसे में भविष्य में हिमालय की इन्हीं नदियों से बिजली पैदा करने की कोशिश और तेज हो सकती है. यानी आने वाले समय में पहाड़ी क्षेत्रों में और ज्यादा बड़े-बड़े निर्माण प्रोजेक्ट देखने को मिल सकते हैं.
लेकिन इतिहास में हुई कुछ पुरानी त्रासदियां बताती हैं कि हिमालय क्षेत्र में ज्यादा निर्माण की वजह से कितना बड़ा नुकसान हो सकता है. 2013 में उत्तराखंड में अचानक आई बाढ़ से 5,700 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. उस समय भी सवाल उठाया गया था कि उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ी घाटियों में जिस तरह हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बनाए जा रहे थे, उनकी वजह से बाढ़ का नुकसान ज्यादा व्यापक हुआ.
2013 की त्रासदी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञों की एक समिति बनाई ताकि यह पता लगाया जा सके कि सरकारी नीतियों और फैसलों की इस आपदा में क्या भूमिका रही. समिति ने कहा था कि इस आपदा वाले क्षेत्र में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का निर्माण रोक देना चाहिए क्योंकि इन प्रोजेक्ट्स की वजह से प्राकृतिक आपदाओं का नुकसान काफी बढ़ सकता है.
लेकिन इसके बावजूद अकेले उत्तराखंड में ही दो दर्जन से ज्यादा छोटे-बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर काम जारी है. वैसे इन पहाड़ी क्षेत्रों में डैम बनाने वाले विशेषज्ञ और अधिकारी अपने बचाव में यह तर्क देते हैं कि हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के जरिए बिजली बनाई जाती है और यह कोयला या किसी दूसरी ज्यादा प्रदूषण वाली ऊर्जा के मुकाबले ज्यादा साफ ऊर्जा है. इसके जरिए भारत अपने कार्बन उत्सर्जन को भी कम कर सकता है.
बड़ी बात यह भी है कि हिमालय की नदियों में डैम बनाना भारत की एक राष्ट्रीय योजना का हिस्सा है. इस योजना का मकसद ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करना है.
लेकिन अब सवाल यही है कि साफ ऊर्जा के लिए भी बनाए जा रहे प्रोजेक्ट क्या इतने जरूरी हो चुके हैं कि उसके लिए पहाड़ों की संरचना के साथ खिलावाड़ किया जाए या फिर प्रकृति को चुनौती दी जाए?
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