जब इस्लाम की सबसे पवित्र जगह 15 दिन के लिए थी हाईजैक, मक्का पर हमले की कोशिश ने याद दिलाया 1979 का अटैक

हूतियों के साथ चल रहे संघर्ष के बीच सऊदी अरब ने पहली बार पवित्र शहर मक्का में हवाई हमले का अलर्ट जारी किया. लेकिन साल 1979 में इस्लाम की सबसे पवित्र जगह पर चरमपंथियों ने अचानक हमला कर दिया था. इसके बाद दो हफ्तों तक ऑपरेशन चला था.

47 साल पहले मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हुआ था हमला (Photo: AFP)

सऊदी सिविल डिफेंस ने मंगलवार को देश के पश्चिमी तट के कई शहरों में अलर्ट जारी किया, जिसमें पवित्र शहर मक्का, जेद्दाह और ताइफ इलाके शामिल हैं. इतिहास में पहली बार मक्का में हवाई हमले का अलर्ट जारी किया गया. ऐसा तब हुआ, जब ईरान समर्थित हूतियों ने सऊदी अरब के मक्का शहर को निशाना बनाने की कोशिश की. सऊदी ने दावा किया कि मक्का पर हमला करने की कोशिश की गई है जबकि हूती इससे इनकार कर रहे हैं. यमन के हूती विद्रोहियों से लड़ रहे सऊदी-नेतृत्व वाले गठबंधन ने बुधवार को कहा कि उसने विद्रोहियों के एक ड्रोन को मार गिराया है, जो मक्का की ओर बढ़ रहा था.

हालांकि, बाद में सऊदी सिविल डिफेंस निदेशालय ने अलर्ट जारी करते हुए कहा, "मक्का शहर में खतरा टल गया है. अपनी सुरक्षा के लिए डिफेंस के निर्देशों का पालन करते रहें और भीड़ लगाने या वीडियो बनाने से बचें. इमरजेंसी वाली स्थिति में 911 पर कॉल करें."

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यह पहली बार नहीं है, जब दुश्मन के द्वारा हमले की कोशिश को लेकर मक्का सुर्खियों में है. 47 साल पहले मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर इस्लामिक चरमपंथियों ने हमला किया था. इसको अल-हरम मस्जिद भी कहा जाता है. दो हफ्ते तक चले उस घेराबंदी के बारे में कई बातें आज भी रहस्य बनी हुई हैं और इसके बारे में अलग-अलग तरह की बातें कही जाती हैं. लेकिन उस हमले ने सऊदी अरब और मिडिल-ईस्ट के बड़े हिस्से को हमेशा के लिए बदल दिया और इसका असर आज भी दुनिया पर दिखता है.
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20 नवंबर, 1979: अल-हरम मस्जिद पर अटैक

इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से उस दिन 1 मुहर्रम 1400 था. 20 नवंबर 1979 की सुबह, दुनिया भर से आए हजारों जायरीन (श्रद्धालु) इस्लाम की सबसे पवित्र शहर, मक्का में पवित्र काबा के चारों ओर बने आंगन में सुबह की नमाज के लिए जमा हुए थे. अचानक गोलियों की आवाज सुनाई दी और मस्जिद के माइक्रोफोन से 'महदी' के आने का ऐलान किया गया.

इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, इमाम महती कयामत के कुछ दिन पहले दुनिया में आएंगे. चरमपंथियों ने इस मान्यता का गलत इस्तेमाल करने की कोशिश की.

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काबा की ग्रैंड मस्जिद में मौजूद लोगों के बीच 200 और लोग भी शामिल थे, जिनका नेतृत्व जुहैमान अल-उतैबी नाम का एक 40 साल का शख्स कर रहा था, जिसे उपदेशक के तौर पर जाना जाता था. यही वो शख्स था, जो हमले का नेतृत्व कर रहा था. 

जैसे ही इमाम ने नमाज पूरी की, जुहैमान और उसके साथियों ने उन्हें एक तरफ धकेल दिया और माइक पर जुहैमान अल-उतैबी और उसके साथियों का कब्जा हो गया था. इसके बाद करीब एक लाख लोगों को बंधक बना लिया गया. 15 दिनों तक घेराबंदी चली, खून-खराबा और मौतें हुईं. आखिरकार सऊदी सरकारी फोर्स ने मस्जिद को वापस अपने कब्जे में ले लिया.

  • यह वो वक्त था, जब सऊदी अरब, पेट्रो-डॉलर की दौलत से मालामाल होकर पश्चिमी दुनिया के साथ घुल-मिल रहा था.
  • महिलाएं काम कर रही थीं, देश में टीवी आए कई साल हो चुके थे और गैर-मुस्लिम भी सऊदी में काम करके पैसे कमा रहे थे.
  • सऊदी आबादी का एक हिस्सा इस बात से खुश नहीं था. उन्हें लगता था कि सऊदी इस्लाम के बताए गए रास्ते से भटक रहा है.
  • इसी के आस-पास पड़ोसी देश ईरान में हाल ही में एक शिया धार्मिक सरकार सत्ता में आई थी.
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हमलावरों का लीडर कौन था?

मक्का पर हमला करने वाला अल-ओतैबी एक जाने-माने परिवार से था और सऊदी सेना में काम कर चुका था. उसका मानना ​​था कि सऊदी शाही परिवार बहुत भ्रष्ट हो गया है और दुनियावी ऐश-ओ-आराम में इतना डूब गया है कि वह इस्लाम की सबसे पवित्र जगह का संरक्षक नहीं रह सकता. अल-ओतैबी के मुताबिक, देश को सही इस्लामिक रास्ते पर वापस लाने का एकमात्र तरीका अल-सऊद परिवार को सत्ता से हटाना था.

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हमला करने वाले चरमपंथी मस्जिद के अंदर ताबूतों में हथियार और गोला-बारूद छिपाकर ले जाए गए थे. आमतौर पर ताबूत में मृतकों के शव अंदर ले जाया जाता हैं और नमाज के बाद जनाजा पढ़ाया जाता है. 

जब उसके उग्रवादियों के गुट ने काबा की पवित्र ग्रैंड मस्जिद पर धावा बोला, तो सरकार के लिए यह सब अचानक हुआ इवेट था. इससे निपटने की कोई तैयारी नहीं थी. बाहरी दुनिया से संपर्क के रास्ते तुरंत काट दिए गए. 

मस्जिद में खून-खराबा करना इस्लाम के मुताबिक, सबसे बड़ा अपवित्र काम था. इसलिए सऊदी सेना के जवान ऐसा करने को तैयार नहीं थे. बड़ी कश्मकश वाली स्थिति बन चुकी थी. इसके बाद, उलेमाओं के साथ एक मीटिंग बुलाई गई और जवाबी हमले के लिए उनकी मंजूरी मांगी गई. इसके बावजूद, मस्जिद के अंदर छिपे उग्रवादियों को बाहर निकालना एक बड़ी चुनौती साबित हुई.

ग्रैंड मस्जिद पर कब्जे के मामले में सऊदी नेतृत्व ने बहुत धीमी प्रतिक्रिया दी. तत्कालीन क्राउन प्रिंस फहद बिन अब्दुलअजीज अल-सऊद ट्यूनीशिया में अरब लीग समिट में थे और नेशनल गार्ड के प्रमुख प्रिंस अब्दुल्ला मोरक्को में थे. ऐसे में, बीमार किंग खालिद और रक्षा मंत्री प्रिंस सुल्तान पर ही जवाबी कार्रवाई के कोऑर्डिनेशन करने की जिम्मेदारी आ गई.

शुरुआत में सऊदी पुलिस समस्या की गंभीरता को समझ नहीं पाई और जांच के लिए कुछ पेट्रोल कारें भेजीं. लेकिन जैसे ही वे ग्रैंड मस्जिद के पास पहुंचीं, उन पर गोलियों की बौछार होने लगी.

इसके बाद यह साफ हो गया कि विद्रोहियों ने अपने हमले की योजना बहुत बारीकी से बनाई थी और उन्हें वहां से हटाना आसान नहीं होगा. ग्रैंड मॉस्क के चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाया गया और स्पेशल फोर्स, पैराट्रूपर्स और बख्तरबंद यूनिट्स को बुलाया गया.

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ग्रैंड मस्जिद एक बड़ी इमारत है, जो मुख्य रूप से गैलरी और गलियारों से बनी है. ये गलियारे सैकड़ों मीटर लंबे हैं, काबा के आंगन को घेरे हुए हैं और कई मंजिलों में बने हैं. अगले दो दिनों तक, सऊदी टुकड़ियों ने अंदर घुसने की कोशिश में सीधे हमले किए, लेकिन विद्रोहियों ने उन्हें नाकाम कर दिया.

जब स्थिति की गंभीरता साफ़ हो गई, तो नेशनल गार्ड की टुकड़ियों ने मस्जिद पर दोबारा कब्ज़ा करने के लिए जल्दबाज़ी में कोशिश शुरू की।

सऊदी ने फ्रांस से मांगी मदद

हमलावरों को जिंदा पकड़ने और घेराबंदी तोड़ने के लिए सऊदी सरकार को मदद की जरूरत थी. ऐसे में उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति वैलेरी जिस्कार्ड डी'एस्टैंग से मदद मांगी. ऐसे मुश्किल वक्त में सऊदी की मदद करने के लिए फ्रांस आगे आया. 

फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने आतंकवाद-रोधी यूनिट 'नेशनल जेंडरमेरी इंटरवेंशन ग्रुप' (GIGN) से तीन सलाहकारों को भेजा. फ्रांसीसी टीम का हेडक्वार्टर पास के शहर ताइफ के एक होटल में बनाया गया था, जहां से उन्होंने विद्रोहियों को बाहर निकालने की योजना बनाई. बेसमेंट में गैस भरी जानी थी, जिससे हमलवारों को सांस लेना मुश्किल हो जाए. फ्रांस की योजना सफल रही. आखिरकार, मस्जिद पर हमले के दो हफ्तों के बाद उस जगह को वापस कब्जे में ले लिया गया.

जुहैमान अल-उतैबी को कैमरों के सामने लाया गया और उसके एक महीने से कुछ ज्यादा वक्त बाद, सऊदी अरब के आठ शहरों में 63 चरमपंथियों को सबके सामने मौत की सजा दी गई. सबसे पहले जुहैमान को मौत के फंदे पर लटकाया गया.

किसने भेजे थे हमलावर?

शुरुआत में माना गया था कि यह हमला ईरान ने किया था. अयातुल्ला खुमैनी ने इन आरोपों का कड़ा खंडन करते हुए दावा किया कि हमले के पीछे अमेरिका और इजरायल का हाथ था. इसके बाद पाकिस्तान में अमेरिकी दूतावास को जला दिया गया, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी.

हमले के बाद सऊदी में क्या बदला?

अल-हरम मस्जिद में हुई इस घटना के बाद सऊदी शाही परिवार को एहसास हो गया कि अपनी सत्ता को मजबूत करने का एकमात्र तरीका खुद को धर्म के सबसे बड़े रक्षक के तौर पर पेश करना है. तब से शासकों ने उलेमाओं को शासन-व्यवस्था में शामिल किया है, सामाजिक सुधारों को वापस ले लिया गया है और इस्लामिक 'मोरल पुलिस' का देश के जनजीवन पर बहुत ज्यादा दबदबा है. सऊदी अरब के द्वारा दूसरे देशों में भी इस्लाम को फैलाने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए जाने की रिपोर्ट्स भी सामने आती हैं.

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