Opinion| ईरान के सामने ट्रंप का सरेंडर? 50 बरस में अमेरिका के लिए क्यों है ये सबसे बड़ी बेइज्जती

हाल के US इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान डील जैसी अपमानजनक शर्तें मानी हों.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान के साथ जंग खत्म करने के समझौते पर दस्तखत करने के ठीक एक हफ्ते बाद अमेरिका ने इस इस्लामिक देश पर लगे तेल प्रतिबंधों को 60 दिनों के लिए हटा दिया है. अब ईरान में पैसा आना शुरू हो जाएगा और वह भी डॉलर्स में. इस कदम ने तेहरान को अलग-थलग करने और उस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की दशकों पुरानी अमेरिकी नीति को पूरी तरह पलट कर रख दिया है. 

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का कहना है कि स्विट्जरलैंड में हुई बातचीत के बाद ईरान परमाणु निरीक्षकों को बुलाने पर राजी हो गया है. हालांकि, इस बातचीत से ईरान उस वक्त कुछ देर के लिए पीछे हट गया था, जब ट्रंप ने ईरानी लीडरशिप पर तीखे तंज कसे थे और देश पर दोबारा बमबारी करने की धमकी दी थी. दूसरी तरफ, तेहरान का दावा है कि उसने अमेरिका से कोई नया वादा नहीं किया है. शनिवार को लेबनान में ईरान के मददगार संगठन हिजबुल्लाह पर इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया.

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यह सब इशारा करता है कि अमेरिका और इजरायल की इस जंग से तेहरान को कितना फायदा पहुंचा है. पिछले हफ्ते फ्रांस के वर्साय में ट्रंप ने जिस समझौते (MoU) पर दस्तखत किए, उसे ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका की नाकामी का दस्तावेज बताया है. ट्रंप के विरोधियों ने पहले ही इसे आत्मसमर्पण का दस्तावेज कहना शुरू कर दिया है. यह उस राष्ट्रपति के लिए बेहद अजीब है जिसने मार्च में ईरान से बिना शर्त सरेंडर की मांग की थी.

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होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने के बदले इस समझौते के तहत अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी हटाने, सभी प्रतिबंधों को माफ करने और विदेशों में फ्रीज उसकी संपत्तियों को बहाल करने के लिए मजबूर हुआ है. इस 14 सूत्रीय दस्तावेज में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण कोष (रिकंस्ट्रक्शन फंड) भी शामिल है. ये एक तरह से हर्जाना ही है. इसके अलावा, अमेरिका अंतिम समझौते के 30 दिनों के भीतर ईरान के आसपास के इलाकों से अपनी फौज हटाने पर भी सहमत हो गया है.

ऐसी फजीहत तो नहीं देखी कभी

हाल के अमेरिकी इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इतनी अपमानजनक शर्तें स्वीकार की हों. अमेरिका की यह रुसवाई तब और बढ़ गई जब ट्रंप ने ईरान को अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का जखीरा रखने की इजाजत देने का बचाव किया, जबकि इन मिसाइलों को तबाह करना ही इस जंग का मुख्य मकसद था. 

पिछले हफ्ते जी-7 शिखर सम्मेलन में बोलते हुए ट्रंप ने कहा, "मेरा मतलब है, उनके पास कुछ मिसाइलें होनी ही चाहिए, क्योंकि दूसरों के पास भी हैं. आपके पास कुछ तो होना चाहिए." उन्होंने आगे कहा, "क्या मैं सऊदी अरब को मिसाइलें रखने दूंगा और उन्हें (ईरान को) मना कर दूंगा?" 

सऊदी अरब हमेशा से अमेरिकी सुरक्षा के भरोसे रहा है. अब वह इस बात से यकीनन खौफ में होगा. ईरान को अब अगले 60 दिनों में होने वाले अंतिम समझौते तक सिर्फ अपने परमाणु कार्यक्रम की मौजूदा स्थिति को बनाए रखना है.

अपने बचाव में ट्रंप ने कहा कि वह उस आर्थिक तबाही से बचना चाहते थे जो जंग जारी रहने पर आ सकती थी. उन्होंने कहा कि वह अपनी तुलना हरबर्ट हूवर से नहीं कराना चाहते, जो 1929 के मार्केट क्रैश के दौरान राष्ट्रपति थे, जिसके बाद दुनिया में ग्रेट डिप्रेशन आई थी. अमेरिका की दक्षिणपंथी वेबसाइट 'द बुल्वार्क' ने दलील दी कि ट्रंप ने असल में यह मान लिया है कि उन्हें ईरान के सामने घुटने टेकने या आर्थिक तबाही में से किसी एक को चुनना था.

पिछले पांच सालों में यह दूसरी बार है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को किसी विदेशी जंग से इतनी हड़बड़ी और शर्मिंदगी के साथ पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा है. 2021 में जो बाइडेन ने भी ऐसा ही किया था, जब उन्होंने अफगानिस्तान से फौज हटा ली थी और मुल्क को कट्टर तालिबानियों के हाथों में छोड़ दिया था. लेकिन ट्रंप का यह फैसला बाइडेन के फैसले से कहीं ज्यादा बुरा और अपमानजनक है और इसकी तुलना 1973 में वियतनाम से अमेरिकी फौज की वापसी से की जा सकती है.

ईरान और वियतनाम जंग की समानताएं

हालांकि ट्रंप की ईरान जंग और वियतनाम जंग के बीच कोई सीधी तुलना नहीं है, क्योंकि वियतनाम युद्ध दशकों तक चला था, जिसमें 58,000 अमेरिकी जानें गईं और युद्ध के दौरान कई राष्ट्रपति बदले. लेकिन अगर हम दोनों संघर्षों के अंतिम दौर और उनके खत्म होने के तरीके को देखें, तो कुछ समानताएं साफ नजर आती हैं. रिचर्ड निक्सन 1969 में अमेरिकी राष्ट्रपति बने, जब अमेरिकी जनता वियतनाम जंग से थक चुकी थी. निक्सन और उनके कद्दावर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर दक्षिण वियतनाम को बेसहारा नहीं छोड़ना चाहते थे.

वियतनाम जंग के दौरान अमेरिकी फौज

वियतनाम जंग के दौरान अमेरिकी फौज
Photo Credit: US Army

उन्होंने पहले उत्तरी वियतनाम पर बमबारी बढ़ाने की कोशिश की, नई धमकियां और अल्टीमेटम दिए, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ. ठीक वैसे ही जैसे ईरान के मामले में हुआ. सोवियत संघ अमेरिका की इस बेबसी का मजा ले रहा था, जैसा कि ईरान विवाद के दौरान चीन और रूस ने किया. इसके बाद निक्सन ने दक्षिण वियतनाम से अमेरिकी सेना हटाने का फैसला किया. उन्होंने 1973 में युद्ध समाप्त करने के लिए उत्तरी वियतनाम के साथ एक समझौता किया. दो साल बाद, उत्तरी वियतनाम के सैनिकों ने दक्षिण वियतनाम की राजधानी साइगॉन पर कब्जा कर लिया. ये अमेरिका की करारी हार का प्रतीक बना.

निक्सन की तरह ट्रंप ने भी ईरान को बमबारी और धमकियों से झुकाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. 1968 में उत्तरी वियतनाम के तरीके से सबक लेते हुए, ईरानियों ने इस संघर्ष को पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैला दिया. ईरान के इस पैंतरे और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने ट्रंप को ईरान की शर्तों पर समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया. जिस तरह निक्सन को इस अलोकप्रिय जंग को खत्म करने के लिए दक्षिण वियतनाम के अहम सवाल को छोड़ना पड़ा था, उसी तरह ट्रंप को ईरान के परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे को बाद की बातचीत के लिए टालना पड़ा.

अमेरिका के दबदबे का नुकसान

विदेशी युद्धों में अमेरिकी दखल के खिलाफ अभियान चलाने के बाद ट्रंप को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के साथ इस विनाशकारी जंग में झोंक दिया. इजरायली नेता ने ट्रंप को यकीन दिलाया था कि इस्लामिक सरकार इस वक्त दशकों में सबसे कमजोर स्थिति में है और अमेरिका-इजरायल का संयुक्त हमला एक त्वरित और पूर्ण जीत दिलाएगा. ये भी यकीन दिलाया गया कि इस हमले में ईरान की सरकार का तख्तापलट भी शामिल होगा. इससे नेतन्याहू को अक्टूबर के चुनावों में बड़ा फायदा मिलता और ट्रंप का नाम इतिहास के सबसे ताकतवर अमेरिकी नेताओं में शुमार हो जाता. लेकिन हजारों जानों के नुकसान और अपने सैन्य -नागरिक बुनियादी ढांचे की भारी तबाही के बावजूद ईरान मजबूती से डटा रहा.

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Photo Credit: US Army

पिछले अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने जंग शुरू करने की नेतन्याहू की दलीलों को हमेशा खारिज किया था. ओबामा ने राजनयिक रास्ता चुना और 2015 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बहुपक्षीय समझौता (JCPOA) किया. ओबामा और अन्य राष्ट्रपतियों ने ईरान के खिलाफ सैन्य ताकत के इस्तेमाल की धमकी को हमेशा रिजर्व में रखा, लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं किया क्योंकि उनके सलाहकारों ने आगाह किया था कि यह बहुत जोखिम भरा होगा. ट्रंप ने उन सभी की अनदेखी की. एक बार जब सैन्य ताकत का इस्तेमाल नाकाम हो जाता है, तो उसे दोहराने की धमकी भी काम नहीं करती. ईरान के साथ यही हुआ है.

इजरायल के लिए बुरे सपने जैसा

इजरायल की जंग में शामिल होने के ट्रंप के फैसले की वजह से ईरान अब और ज्यादा ताकतवर हो गया है. अब वहां इजरायल और उसके खाड़ी पड़ोसियों के लिए अधिक कट्टर और खतरनाक हुकूमत है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी के मुताबिक, उसके पास अभी भी मिसाइलों और लॉन्चर्स का बड़ा जखीरा है. ट्रंप के इस समझौते ने लेबनान में ईरान के मददगार हिजबुल्लाह को एक राजनीतिक ढाल दे दी है. नतीजतन, इजरायल अब कम सुरक्षित है, नेतन्याहू राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर हो चुके हैं और ट्रंप का नाम इतिहास की किताबों में एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में दर्ज हो सकता है जिसने एक गलत जंग से खुद को निकालने के लिए घुटने टेक दिए.

इजरायल में डर इस बात का है कि शह पाया हुआ ईरान अब परमाणु बातचीत को 60 दिनों की अवधि से भी आगे खींचता रहेगा, क्योंकि अब उस पर अमेरिकी प्रतिबंधों का कोई दबाव नहीं है. कई लोग इस बदहाली के लिए नेतन्याहू को जिम्मेदार ठहराते हैं, क्योंकि उन्होंने ही JCPOA के खिलाफ मुहिम चलाई थी और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के दौरान दो बार ईरान के साथ युद्ध की स्थिति पैदा की. इस जंग में मिली बढ़त के बाद, ईरान अब क्षेत्र की महाशक्ति के तौर पर इजरायल के वजूद को चुनौती दे सकता है.

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वियतनाम के बाद किसी और जंग ने अमेरिका की बेबसी को इस कदर उजागर नहीं किया है जितना कि ईरान के साथ हुए इस टकराव ने किया है. यह वियतनाम युद्ध के बाद से इस सुपरपावर की सबसे बड़ी हार है. ये उसके पतन का एक और संकेत है. इराक और अफगानिस्तान में हुई दूसरी जंगों ने भी तबाही के निशान छोड़े थे और क्षेत्र के लिए नई मुश्किलें खड़ी करने के लिए उनकी आलोचना हुई थी. लेकिन तब भी अमेरिका की छवि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के रूप में बनी हुई थी. ऐसी ताकत जो वक्त का रुख बदलने का कुवत रखती थी.

ईरान की इस नाकामी ने अमेरिका को राजनयिक तौर से कमजोर और सैन्य रूप से लाचार बना दिया है. ट्रंप की बदौलत ईरान को होर्मुज स्ट्रेट के रूप में एक नया हथियार मिल गया है. इसका इस्तेमाल वह जब चाहे आर्थिक तबाही मचाने के लिए कर सकता है और अमेरिका इसमें कुछ खास नहीं कर पाएगा.

(नरेश कौशिक एसोसिएटेड प्रेस और बीबीसी न्यूज के पूर्व संपादक हैं और लंदन में रहते हैं)

डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.