बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले का एक ऐसे गांव में जिस गांव के हर घर के लोगों के हाथ में हुनर है. इस गांव के लोग लघु उद्योग का बेहतरीन नमूना पेश कर रहे हैं. इस गांव के लोग अपने पुश्तैनी काम को सहेजने की भरपूर कोशिश करते हैं. मझौलिया प्रखंड के कसेरा टोला में बड़े पैमाने पर पीतल के बर्तन बनाए जाते हैं. इस गांव में बने पीतल के बर्तन व उसकी चमक की डिमांड बिहार ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी है।
मझौलिया प्रखंड के कसेरा टोला इस गांव में बने बर्तन की चमक झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल समेत दूसरे राज्यों में भी देखने को मिलेगा. इस गांव में लगभग 150 से ज्यादा घर है. जिसकी आबादी लगभग 2000 की है. और हर घर में पीतल के बर्तन बनाने का काम होता है. इस गांव के लोग अपने पुश्तैनी विरासत को आगे बढ़ने का काम करते हैं. बेतिया के राजा के द्वारा इन्हें यहां पर रहने के लिए इन्हें जमीन दी गई हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी यह लोग बर्तन बनाने का काम को करते आ रहे हैं. आज यह लोग सरकार से मदद की मांग कर रहे हैं. हालांकि सरकार ने साढे पांच करोड़ की लागत से एक भवन बनवाया है. उसमें यहां के लोगों ने एक भट्टी भी लगा रखी हैं. जहां पर इस गांव के लोग काम करते हैं. लेकिन उस भट्टी में मशीन नहीं लगी हुई है जिसका वहां के लोग कई वर्षों से इंतजार कर रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार ने पैसा तो पास कर दिया लेकिन मशीन अब तक नहीं लगा. स्थानीय लोगों का कहना है कि मशीन अगर जल्द लग जाता तो हमारा काम और तेजी में बढ़ता और हमें बैंक से लोन भी मिलता. हमें बैंक वाले लोन भी नहीं देते ताकि हम कच्चा सामान खरीद सकें ताकि आगे हम लोग आगे बर्तन बनाने का काम कर सके।
मझौलिया के इस कसेरा टोला गांव के लोग हथौड़ी से बर्तन बनाकर अपने पुश्तैनी काम को बचाने और सहेजने की कोशिश में लगे हुए हैं. इस गांव को पीतल नगरी कहा जाता है. दशकों नहीं बल्कि सैकड़ों साल से यहां के लोग पीतल के बर्तन बनाने का काम कर रहे हैं.
मेहनत और हाथ के जादू से यहां के लोग पीतल, तांबा,लोहा, कासा को एक नया रूप देते है. अलग-अलग डिजाइनों के बर्तन बनाते है. कारीगर बर्तन बनाकर उसे बाजार में भी बेचते है. ना कि सिर्फ बिहार में बल्कि उनके बर्तन उत्तर प्रदेश, झारखंड, नेपाल में भी प्रसिद्व है।
कसेरा टोला गांव निवासी ओमप्रकाश साह ने बताया कि उनके यहां बर्तन बनाने की परंपरा पुश्तों से चली आ रही है पूरे गांव में यह काम पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. बेतिया राज के द्वारा हमें यहां पर रहने के लिए जगह दिया गया है. इस गांव में लगभग डेढ़ सौ घर है सभी लोग बर्तन बनाने का काम करते हैं. यहां पर जो बर्तन बनता है वह यूपी, बिहार और दूसरे राज्यों में भी जाता है.
साथ ही उन्हें अपने रोजगार को नई दिशा देने के लिए सरकार की तरफ से लगभग 5.50 करोड़ रुपए का अनुदान मिला है. इस राशि की मदद से अब गांव में सभी कारीगरों के लिए एक भवन निर्माण कर भट्टी और रोलिंग मशीनों को लगाया गया है।
वहीं राजू साह ने बताया की ने बताया कि सरकार के तरफ से साढे पांच करोड़ रूपए का अनुदान मिला है. जिससे मात्र एक सेड बना हुआ है लेकिन उसमें मशीन अभी तक नहीं लगा है. मशीन का पैसा भी चला गया है. अगर वह मशीन लग जाता तो हमारा काम आगे बढ़ता. हमें बैंक से लोन मिलता और हम अपना काम और आगे बढ़ाते. पैसे की परेशानी से हम कच्चा माल नहीं खरीद पाते हैं।
वहीं कसेरा कम्युनिटी के अध्यक्ष विश्वनाथ शाह ने बताया की बर्तन बनाने का काम कोई पुश्तों से चल रहा है. सरकार की तरफ से 5.50 करोड़ रुपए का अनुदान मिला है, लेकिन सिर्फ एक सेड बना हुआ है. मशीन अब तक नहीं मिला है. बैंक की तरफ से हमें लोन भी नहीं मिल रहा है. अगर मशीन लग जाता तो शायद हम लोग काम अच्छी तरह से कर पाते हैं. हमने मशीन के लिए अधिकारियों से कई बार मुलाकात की. लेकिन अब तक इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
वही नारायण कुमार ने बताया कि हमारे यहां बर्तन कई पीढियों से बन रहा है. गांव में डेढ़ सौ से 200 घर है और हर घर में बर्तन बनाने का काम होता है. सरकार के द्वारा 5:30 करोड़ का अनुदान मिला है. जिससे यह एक सेट बना है. इसमें मशीन भी लगाने की बात हुई थी लेकिन अब तक मशीन नहीं लग पाया. जब मशीन लग जाएगा तो इससे हमारा काम और भी आसान हो जाएगा. हमारा बर्तन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, वेस्ट बंगाल और नेपाल तक जाता है।
वहीं कसेरा गांव के रमेश साह ने बताया कि हम लोगों को मुरादाबाद में बड़े-बड़े बर्तन बनाने की ट्रेनिंग भी दी गई. हमें सर्टिफिकेट भी मिल गया, लेकिन हमारे पास पैसा नहीं है ताकि हम काम को आगे बढ़ा सके. बैंक वाले लोन नहीं दे रहे हैं. ऐसे में सरकार को ध्यान देने की भी जरूरत है कि हम कामगारों को लोन मिल सके. ताकि हम लोग कच्चा माल खरीद के अपने काम को आगे बढ़ा सके।
बता दे रोजाना एक हजार किलो तक पीतल के बर्तन तैयार किए जाते हैं. एक थाली का वजन लगभग 1 किलोग्राम तक होता है. ऐसी 150 से 200 थालियां एक दिन में तैयार की जाती है. ठीक उसी प्रकार लगभग 3 से 4 किलो वजनी 100 से 120 घंटियां तथा 500 ग्राम वजनी लगभग 150 से 200 कलछूल कुशल कारीगर हाथों से तैयार करते हैं. यहां पर तैयार बर्तन पूरे बिहार समेत उत्तर प्रदेश, बंगाल, झारखंड और नेपाल में सप्लाई किया जाता है.
लघु उद्योग का बेहतरीन नमूना पेश करने वाला यह कसेरा टोला गांव पूरे चंपारण में ही नहीं बल्कि पूरे बिहार में अपने हुनर का नमूना पेश कर रहा है. लेकिन सरकार को इनके ऊपर ध्यान देने की जरूरत है. सरकार ने इन्हें आगे बढ़ाने के लिए साढे पांच करोड रुपए की राशि भी पास कर दी है लेकिन काम करने के लिए एक सेड बना हुआ है लेकिन उसे सेड में मशीन नहीं है. मशीन का इंतजार यह गांव वाले कर रहे हैं ताकि इनका लघु उद्योग और आगे बढ़ सके. अगर सरकार उनके इस कार्य में उनका सहयोग करे, तो इस गांव के लोग सुबे और देश के नाम को एक नई ऊंचाई दे सकते हैं।