दूरदर्शन की रामायण के लक्ष्मण ने पिता की आखिरी इच्छा का रखा था मान, फादर्स डे पर कहा- वसीयत में किया था देहदान का जिक्र

दूरदर्शन की 'रामायण' का नाम जब लिया जाता है, तो भगवान राम के साथ लक्ष्मण का चेहरा भी लोगों की आंखों के सामने आ जाता है. इस किरदार को निभाने वाले सुनील लहरी आज भी दर्शकों के दिलों में खास जगह रखते हैं.

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दूरदर्शन की रामायाण के लक्ष्मण ने बताया क्या थी उनके पिता की अंतिम इच्छा
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नई दिल्ली:

दूरदर्शन की 'रामायण' के लक्ष्मण का चेहरा आज भी लोगों की आंखों के सामने आ जाता है. इस किरदार को निभाने वाले सुनील लहरी आज भी दर्शकों के दिलों में खास जगह रखते हैं. लेकिन इस बार वो किसी शो या एक्टिंग की वजह से नहीं, बल्कि अपने पिता से जुड़ी एक ऐसी भावुक कहानी के कारण चर्चा में हैं, जिसने लोगों का दिल छू लिया है. फादर्स डे के मौके पर सुनील लहरी ने एक वीडियो शेयर किया और बताया कि उन्होंने अपने पिता की आखिरी इच्छा को पूरा करने के लिए ऐसा कदम उठाया था, जो आज भी मिसाल माना जाता है.

फादर्स डे पर पिता को किया याद

सुनील लहरी सोशल मीडिया पर अक्सर अपने विचार और जीवन से जुड़े अनुभव साझा करते रहते हैं. फादर्स डे के मौके पर भी उन्होंने एक खास वीडियो पोस्ट किया. वीडियो में उन्होंने अपने पिता के साथ बिताए पलों को याद किया और कहा कि पिता सिर्फ जन्म देने वाले नहीं होते, बल्कि वो अपने बच्चों के पहले गुरु, दोस्त और सबसे बड़े मार्गदर्शक होते हैं. उन्होंने कहा कि एक पिता पूरी जिंदगी अपनी संतान की खुशियों और भविष्य के लिए समर्पित रहता है.

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डॉक्टर थे सुनील लहरी के पिता

सुनील लहरी के पिता डॉ. शिखर चंद्र लहरी पेशे से डॉक्टर थे. मध्य प्रदेश के दमोह जिला अस्पताल में उन्होंने लंबे समय तक सेवाएं दी थीं. चिकित्सा जगत में उनकी अच्छी पहचान थी और समाज सेवा के कामों में भी उनकी गहरी रुचि थी. लोगों की मदद करना उनके स्वभाव का हिस्सा था.

साल 2012 में डॉ. शिखर चंद्र लहरी का निधन हो गया था. हालांकि उन्होंने अपनी आखिरी इच्छा पहले ही वसीयत में लिख दी थी. उनकी चाहत थी कि मृत्यु के बाद उनका शरीर मेडिकल छात्रों की पढ़ाई के काम आए. पिता की इस इच्छा का सम्मान करते हुए सुनील लहरी ने उनकी बॉडी भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज को दान कर दी थी.

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छात्रों की पढ़ाई में करना चाहते थे मदद

बताया जाता है कि डॉ. शिखर चंद्र लहरी मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर भी रह चुके थे. पढ़ाई के दौरान उन्होंने महसूस किया था कि मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की संरचना समझने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं मिल पाते. इसी वजह से उन्होंने देहदान का फैसला लिया. उनका मानना था कि उनकी ये पहल आने वाली पीढ़ी के डॉक्टरों की पढ़ाई में मददगार साबित होगी.

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