फाइल फोटो : मुक्केबाज विजेंदर सिंह
नई दिल्ली:
विजेन्दर भारत के पहले प्रोफ़ेशनल बॉक्सर नहीं है। साल 1996 में भारत के धर्मेंद्र सिंह यादव उर्फ़ गोबी, वेंकटेश देवराजन, राजकुमार सांगवान ने प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग का दरवाज़ा खटखटाया। बाद में ओलिंपियन गुरुचरण सिंह, देवराजन के भाई वेंकटेश हरिकृष्ण और प्रदीप सिंह ने भी प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग में हाथ आज़माए।
धर्मेंद्र यादव बताते हैं कि वो सबसे पहले इंग्लैंड पहुंचे और उनके दो महीने बाद देवराजन भी प्रोफ़ेशनल बनने इंग्लैंड आ गए। धर्मेंद्र कहते हैं, "मैंने छह में से छह, देवराजन ने तीन में से दो और राजकुमार सांगवान ने एक प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग जीती, लेकिन मुझे लगता है कि विजेन्दर बहुत ही अच्छे बॉक्सर हैं और वो कोई भी मुकाम हासिल कर सकते हैं। उनके पंच में दम है और वो एक हिम्मती बॉक्सर हैं।"
धर्मेंद्र बताते हैं कि वो 2000 से 2011 तक भारतीय टीम में एक कोच के तौर पर काम करते रहे। उनकी तमन्ना अब एक बॉक्सिंग अकादमी खोलने की है। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाज़ा है। उन्हें अकादमी खोलने के लिए ज़मीन देने का वादा भी किया है, लेकिन अकादमी की ज़मीन देने के नाम पर रवैया बिल्कुल सरकारी है। वो अकादमी के लिए ज़मीन मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं। इस बीच वो कुछ अकादमी में जाकर बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं।
वेंकटेश देवराजन इन दिनों बिसालपुर (छत्तीसगढ़) में रेलवे में नौकरी करते हैं और करीब ढ़ाई सौ बच्चों को बॉक्सिंग और दूसरे खेलों की ट्रेनिंग देते हैं। ओलिंपियन देवराजन ने वर्ष 1994 बैंकॉक में हुई वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में कांस्य पद जीता। मिज़ोरम के पुज़ोराम थांगा के बाद वर्ल्ड कप में पदक जीतने वाले वो दूसरे भारतीय रहे।
चेन्नई के देवराजन को भी विजेन्दर से बहुत उम्मीदें हैं। वो कहते हैं विजेन्दर तीन ओलिंपिक और शायद इतने ही एशियाई खेलों में हिस्सा ले चुके हैं। वो पूछते हैं, "विजेन्दर और कितने ओलिंपिक्स खेलेंगे? उन्हें 2008 के बाद ही पेशेवर बॉक्सिंग को अपना लेना चाहिए था। वो अब तक बहुत पैसा कमा सकते थे।" 1995 में अर्जुन पुरस्कार जीत चुके देवराजन को लगता है कि विजेन्दर के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी, लेकिन उन्हें हरियाणा के स्टार बॉक्सर से बहुत उम्मीदें हैं।
अर्जुन पुरस्कार विजेता राजकुमार सांगवान इन दिनों एक बॉक्सिंग अकादमी चलाते हैं तो सिडनी ओलंपिक्स में पदक के बेहद क़रीब पहुंचकर क्वार्टर फ़ाइनल में मुक़ाबला गंवा देने वाले गुरुचरण सिंह ने पेशेवर बॉक्सिंग का रास्ता अपना लिया। देवराजन के भाई वेंकटेश न्यूज़ीलैंड में प्रदीप सिंह ऑस्ट्रेलिया में प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग में हाथ आज़माते रहे।
इसलिए ये पहली बार नहीं है कि विजेन्दर के रूप में कोई भारतीय पहली बार पेशेवर बॉक्सिंग में नाम या पैसा कमाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारतीय सिस्टम, ख़ासकर बॉक्सिंग के अधिकारी और बाज़ार इसका फ़ायदा उठाने में नाकाम रहा है, इसलिए एक सकारात्मक चीज़ पर नकारात्मक सवाल उठने लाज़िमी हैं।
धर्मेंद्र यादव बताते हैं कि वो सबसे पहले इंग्लैंड पहुंचे और उनके दो महीने बाद देवराजन भी प्रोफ़ेशनल बनने इंग्लैंड आ गए। धर्मेंद्र कहते हैं, "मैंने छह में से छह, देवराजन ने तीन में से दो और राजकुमार सांगवान ने एक प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग जीती, लेकिन मुझे लगता है कि विजेन्दर बहुत ही अच्छे बॉक्सर हैं और वो कोई भी मुकाम हासिल कर सकते हैं। उनके पंच में दम है और वो एक हिम्मती बॉक्सर हैं।"
धर्मेंद्र बताते हैं कि वो 2000 से 2011 तक भारतीय टीम में एक कोच के तौर पर काम करते रहे। उनकी तमन्ना अब एक बॉक्सिंग अकादमी खोलने की है। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाज़ा है। उन्हें अकादमी खोलने के लिए ज़मीन देने का वादा भी किया है, लेकिन अकादमी की ज़मीन देने के नाम पर रवैया बिल्कुल सरकारी है। वो अकादमी के लिए ज़मीन मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं। इस बीच वो कुछ अकादमी में जाकर बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं।
वेंकटेश देवराजन इन दिनों बिसालपुर (छत्तीसगढ़) में रेलवे में नौकरी करते हैं और करीब ढ़ाई सौ बच्चों को बॉक्सिंग और दूसरे खेलों की ट्रेनिंग देते हैं। ओलिंपियन देवराजन ने वर्ष 1994 बैंकॉक में हुई वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में कांस्य पद जीता। मिज़ोरम के पुज़ोराम थांगा के बाद वर्ल्ड कप में पदक जीतने वाले वो दूसरे भारतीय रहे।
चेन्नई के देवराजन को भी विजेन्दर से बहुत उम्मीदें हैं। वो कहते हैं विजेन्दर तीन ओलिंपिक और शायद इतने ही एशियाई खेलों में हिस्सा ले चुके हैं। वो पूछते हैं, "विजेन्दर और कितने ओलिंपिक्स खेलेंगे? उन्हें 2008 के बाद ही पेशेवर बॉक्सिंग को अपना लेना चाहिए था। वो अब तक बहुत पैसा कमा सकते थे।" 1995 में अर्जुन पुरस्कार जीत चुके देवराजन को लगता है कि विजेन्दर के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी, लेकिन उन्हें हरियाणा के स्टार बॉक्सर से बहुत उम्मीदें हैं।
अर्जुन पुरस्कार विजेता राजकुमार सांगवान इन दिनों एक बॉक्सिंग अकादमी चलाते हैं तो सिडनी ओलंपिक्स में पदक के बेहद क़रीब पहुंचकर क्वार्टर फ़ाइनल में मुक़ाबला गंवा देने वाले गुरुचरण सिंह ने पेशेवर बॉक्सिंग का रास्ता अपना लिया। देवराजन के भाई वेंकटेश न्यूज़ीलैंड में प्रदीप सिंह ऑस्ट्रेलिया में प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग में हाथ आज़माते रहे।
इसलिए ये पहली बार नहीं है कि विजेन्दर के रूप में कोई भारतीय पहली बार पेशेवर बॉक्सिंग में नाम या पैसा कमाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारतीय सिस्टम, ख़ासकर बॉक्सिंग के अधिकारी और बाज़ार इसका फ़ायदा उठाने में नाकाम रहा है, इसलिए एक सकारात्मक चीज़ पर नकारात्मक सवाल उठने लाज़िमी हैं।
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