योगेश्वर दत्त (फाइल फोटो)
- रियो में भारत की आखिरी उम्मीद पहलवान योगेश्वर दत्त हैं.
- दत्त ने लंदन ओलिंपिक में 60 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीता था.
- उनका मुकाबला आखिरी दिन यानि 21 अगस्त को होगा.
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ब्राजील की मेजबानी में चल रहे रियो ओलिंपिक खेलों में भारत को अब तक दो ही मेडल मिले हैं. पहला मेडल पहलवान साक्षी मलिक ने दिलाया, जो दूसरा मेडल सिल्वर के रूप में पीवी सिंधु ने जीता. ओलिंपिक में अब तक के अपने सबसे बड़े दल के साथ उतरे भारत को कई खिलाड़ियों से मेडल की उम्मीद थी, लेकिन अभिनव बिंद्रा, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा और लिएंडर पेस जैसे दिग्गज कुछ नहीं कर पाए. अब भारत की आखिरी उम्मीद पहलवान योगेश्वर दत्त से है...
योगेश्वर दत्त ने लंदन ओलिंपिक में 60 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीता था. इस बार वह 65 किग्रा भारवर्ग में उतरेंगे. उनका मुकाबला आखिरी दिन 21 अगस्त को होगा.
लंदन में ऐसे लहराया था तिरंगा
दत्त भारत की ओर से कुश्ती में मेडल जीतने वाले तीसरे पहलवान हैं. सबसे पहले 1952 के ओलिंपिक खेलों में भारत के खशब जाधव ने ब्रॉन्ज जीता था. फिर 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में पहलवान सुशील कुमार ब्रॉन्ज जीतने में कामयाब रहे थे.
लंदन ओलिंपिक में एक समय ऐसा लग रहा था कि योगश्वर दत्त मेडल नहीं जीत पाएंगे और 60 किग्रा भार वर्ग में अंतिम 8 के मुकाबले में रूस के पहलवान से हार गए थे, लेकिन वह लकी रहे कि उन्हें कुश्ती के एक नियम का फायदा मिला. उन्हें हराने वाला रूसी पहलवान फाइनल में पहुंच गया और दत्त को रेपचेज राउंड में मौका मिल गया. इसमें उन्हें दो मैच खेलने पड़े. सबसे पहले उन्होंने प्यूर्तो रिको के पहलवान को हराया, फिर दूसरे मुकाबले में ईरान के पहलवान को हराकर ब्रॉन्ज पर कब्जा कर लिया.
रियो का कोटा
दत्त ने एशियन क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में 65 किग्राम फ्रीस्टाइल में ओलिंपिक का कोटा हासिल किया था. उन्होंने पहले दौर में कोरिया के जु सोंग किम को 8-1 से हराया था. इसके बाद वियतनाम के जुआन डिंह न्गुयेन को क्वार्टर फाइनल में तकनीकी वर्चस्व के आधार पर हराया. सेमीफाइनल में योगेश्वर ने कोरिया के सेयुंगचुल ली को 7-2 से मात दी थी. इसी के साथ उन्होंने ओलिंपिक में अपनी जगह पक्की कर ली. गौरतलब है कि हर श्रेणी में से शीर्ष दो खिलाड़ियों को ओलिंपिक में जाने का मौका मिलना था, इसी नियम के तहत योगेश्वर को इसका टिकट मिला था.
लंबे समय तक रहे हैं चोटिल
योगेश्वर दत्त को कुश्ती के गुर स्वर्गीय मास्टर सतबीर भैंसवालिया ने सिखाए थे. सतबीर पेशे से पीटीआई थे और रिटायर होने के बाद वह अखाड़ा चलाने लगे थे. योगेश्वर दत्त को अपने करियर को दौरान कई बार चोट लगी है. वास्तव में वह बचपन से ही चोट का शिकार रहे हैं, लेकिन उन्होंने कुश्ती के प्रति अपने लगाव को कम नहीं होने दिया. उन्होंने 8 साल की उम्र से ही कुश्ती से नाता जोड़ लिया था और अब उनकी सफलता से तो हर कोई परिचित ही है. सोनीपत, हरियाणा के योगेश्वर ने अपनी तैयारी किसी और के साथ नहीं बल्कि वर्ल्ड चैंपियनशिप और एशियन गेम्स में मेडल विजेता रहे बजरंग के साथ की है.
बीजिंग में हुए थे फेल
योगी ने सबसे पहले 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में भी भाग लिया था, लेकिन वह क्वार्टरफाइनल में हारकर बाहर हो गए थे. इसकी भरपाई उन्होंने लंदन ओलिंपिक, 2012 में की और 60 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीता. उनके नाम एशियाई खेलों में मेडल हैं. उन्होंने इंचियोन, 2014 में 65 किग्रा भार वर्ग में एशियाई खेलों में गोल्ड जीता था. इससे पहले वह दोहा एशियाई खेल, 2006 में 60 किलो भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीत चुके थे. कॉमनवेल्थ खेलों में योगेश्वर के रिकॉर्ड का भारत में कोई सानी नहीं है. उन्होंने दिल्ली कॉमनवेल्थ खेल, 2010 और ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेल, 2014 में गोल्ड जीता था. योगेश्वर की उलब्धियों को देखते हुए उन्हें 2012 में राजीव गांधी खेल रत्न भी मिल चुका है.
योगेश्वर दत्त ने लंदन ओलिंपिक में 60 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीता था. इस बार वह 65 किग्रा भारवर्ग में उतरेंगे. उनका मुकाबला आखिरी दिन 21 अगस्त को होगा.
लंदन में ऐसे लहराया था तिरंगा
दत्त भारत की ओर से कुश्ती में मेडल जीतने वाले तीसरे पहलवान हैं. सबसे पहले 1952 के ओलिंपिक खेलों में भारत के खशब जाधव ने ब्रॉन्ज जीता था. फिर 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में पहलवान सुशील कुमार ब्रॉन्ज जीतने में कामयाब रहे थे.
लंदन ओलिंपिक में एक समय ऐसा लग रहा था कि योगश्वर दत्त मेडल नहीं जीत पाएंगे और 60 किग्रा भार वर्ग में अंतिम 8 के मुकाबले में रूस के पहलवान से हार गए थे, लेकिन वह लकी रहे कि उन्हें कुश्ती के एक नियम का फायदा मिला. उन्हें हराने वाला रूसी पहलवान फाइनल में पहुंच गया और दत्त को रेपचेज राउंड में मौका मिल गया. इसमें उन्हें दो मैच खेलने पड़े. सबसे पहले उन्होंने प्यूर्तो रिको के पहलवान को हराया, फिर दूसरे मुकाबले में ईरान के पहलवान को हराकर ब्रॉन्ज पर कब्जा कर लिया.
रियो का कोटा
दत्त ने एशियन क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में 65 किग्राम फ्रीस्टाइल में ओलिंपिक का कोटा हासिल किया था. उन्होंने पहले दौर में कोरिया के जु सोंग किम को 8-1 से हराया था. इसके बाद वियतनाम के जुआन डिंह न्गुयेन को क्वार्टर फाइनल में तकनीकी वर्चस्व के आधार पर हराया. सेमीफाइनल में योगेश्वर ने कोरिया के सेयुंगचुल ली को 7-2 से मात दी थी. इसी के साथ उन्होंने ओलिंपिक में अपनी जगह पक्की कर ली. गौरतलब है कि हर श्रेणी में से शीर्ष दो खिलाड़ियों को ओलिंपिक में जाने का मौका मिलना था, इसी नियम के तहत योगेश्वर को इसका टिकट मिला था.
लंबे समय तक रहे हैं चोटिल
योगेश्वर दत्त को कुश्ती के गुर स्वर्गीय मास्टर सतबीर भैंसवालिया ने सिखाए थे. सतबीर पेशे से पीटीआई थे और रिटायर होने के बाद वह अखाड़ा चलाने लगे थे. योगेश्वर दत्त को अपने करियर को दौरान कई बार चोट लगी है. वास्तव में वह बचपन से ही चोट का शिकार रहे हैं, लेकिन उन्होंने कुश्ती के प्रति अपने लगाव को कम नहीं होने दिया. उन्होंने 8 साल की उम्र से ही कुश्ती से नाता जोड़ लिया था और अब उनकी सफलता से तो हर कोई परिचित ही है. सोनीपत, हरियाणा के योगेश्वर ने अपनी तैयारी किसी और के साथ नहीं बल्कि वर्ल्ड चैंपियनशिप और एशियन गेम्स में मेडल विजेता रहे बजरंग के साथ की है.
बीजिंग में हुए थे फेल
योगी ने सबसे पहले 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में भी भाग लिया था, लेकिन वह क्वार्टरफाइनल में हारकर बाहर हो गए थे. इसकी भरपाई उन्होंने लंदन ओलिंपिक, 2012 में की और 60 किग्रा भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीता. उनके नाम एशियाई खेलों में मेडल हैं. उन्होंने इंचियोन, 2014 में 65 किग्रा भार वर्ग में एशियाई खेलों में गोल्ड जीता था. इससे पहले वह दोहा एशियाई खेल, 2006 में 60 किलो भार वर्ग में ब्रॉन्ज जीत चुके थे. कॉमनवेल्थ खेलों में योगेश्वर के रिकॉर्ड का भारत में कोई सानी नहीं है. उन्होंने दिल्ली कॉमनवेल्थ खेल, 2010 और ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेल, 2014 में गोल्ड जीता था. योगेश्वर की उलब्धियों को देखते हुए उन्हें 2012 में राजीव गांधी खेल रत्न भी मिल चुका है.
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